विष्णु नागर का व्यंग्यः सीना हो या मुंह, फुलाने से बचना चाहिए, फट गया तो हिंदुत्व के काम का भी नहीं रहेगा!

वैसे मोदी जी के जीवन की अब सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा, झोला लेकर चल देने की ही रह गई है। इसी जन्म में उसे पूरा कर लें, इससे बेहतर क्या हो सकता है! इस मामूली काम के लिए उन्हें पुनर्जन्म लेना पड़े, यह उनके और देश के लिए घातक है!

फाइल फोटोः सोशल मीडिया
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विष्णु नागर

मातृभूमि पर गर्व करना उनका पेशा है, मगर उन्हें सबसे अधिक गर्व अपने आप पर है। अपनी घड़ी, अपने चश्मे, अपनी पोशाक, अपनी सूरत, अपनी दाढ़ी पर है। अपुष्ट खबर है कि उन्हें आजकल अपनी नाक, कान, आंख, दांत पर भी गर्व रहने लगा है। जुकाम, खांसी, मैल पर भी रहने लगा है। उनका बस चले, तो वह अपने टूथब्रश से भी कहें कि ऐ तुम भी मुझ पर गर्व किया करो!

उनका सीना गर्व से इतना फूला रहता है कि किसी दिन उसके फटने का डर है, जबकि सीना ही उनकी आन, बान, शान और जान है! सीना ही उनका 'मन' है 'मन की बात' है। मेरी तो उन्हें सलाह है कि अपने छप्पन इंच के सीने के हितार्थ अब इसे फुलाना वह बंद कर दें। सीना हो या मुंह हर समझदार इनसान को फुलाने से बचना चाहिए। मैं जानता हूं कि आपमें से कई 'दुष्ट' कहेंगे कि आपने उन्हें कब से 'समझदार' मानना आरंभ कर दिया। लगता है आपका भी पतन हो गया है!

इसी पतन के कारण ही मैं चिंतित रहने लगा हूं कि मान लो, उनका सीना फट गया और रिपेयर के काबिल नहीं रहा तो फिर मोदी जी भी, मोदी जी नहीं रहेंगे। हिंदुत्व के काम के नहीं रहेंगे।आडवाणी-गति को प्राप्त होंगे। उधर मोदी जी के बाद सैकड़ों लोग सोचने लगे हैं कि अगर मोदी जी प्रधानमंत्री हो सकते हैं तो हममें क्या अयोग्यता है! अभिनय करना और हिम्मत से झूठ बोलना ही तो आना चाहिए!

बस वह सीने फुलाने के दुष्परिणामों को देखने के बाद सावधान हो जाएगा। गर्व से सीना फुलाने की आदत पड़ चुकी होगी तो एक झटके में छोड़ देगा क्योंकि सीने से ज्यादा सबको कुर्सी प्यारी होती है। वह पहले ही दिन से गर्व-गर्व की घर्र-घर्र बंद कर देगा। मोदी जी के सीने पर मूंग दलते हुए वह राज करता रहेगा। एक दिन इनके भक्त, उसके भक्त हो जाएंगे। भक्त को तो भगवान चाहिए। राम हो या कृष्ण, शिव हों या हनुमान!


मेरी तो उन्हें सलाह है कि अब वह गर्व की बजाय अपने सात सालों पर शर्म करना सीख लें। इससे फटने को तैयार सीना धीरे-धीरे बैंलेस में आ जाएगा. मगर सीना फुलाना उन्होंने जारी रखा तो गच्चा खाने की जो शुरुआत पश्चिम बंगाल से हुई है, वह उत्तर प्रदेश को लपेट में लेते-लेते 2024 तक चली आएगी। अभी दूसरे दल हार का आत्मविश्लेषण करते हैं, यह भार फिर उनके कमजोर पड़ चुके कंधों पर आ पड़ेगा। एक बार आत्मविश्लेषण शुरू होता है तो मुश्किल से थम पाता है!

हर चुनाव के बाद आत्मविश्लेषण करने वाले पार्टी फंड से चाय-समोसे का लाभ प्राप्त करके रह जाते हैं। फिर घर आकर वे विश्लेषण करते हैं कि अब इस पार्टी में रहें या झोला लेकर किसी और पार्टी में चल दें! सबसे बड़ा नेता ही आफत में फंसा रहता है। वह जाए तो जाए कहां! झोला उठा कर वह जहन्नुम जाना चाहे तो भी पार्टी के लोग उसे जाने नहीं देते! चुपचाप रात में खिसक लेना चाहे तो पता चलता है कि उसका झोला छिपा दिया गया है। झोला मिल जाए तो पार्टी के लोगों में इतनी हिम्मत आ जाती है कि कहने लगते हैं कि ओय, अब तू कहां चला! जाना था तो पहले चला जाता। हमारी यह गत तो न होती! अब बड़ा आया है- झोला लेकर चल देनेवाला। बैठ इधर। खबरदार, जो एक इंच भी हिला तो!

वैसे मोदी जी के जीवन की अब सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा, झोला लेकर चल देने की ही रह गई है। इसी जन्म में उसे पूरा कर लें, इससे बेहतर क्या हो सकता है! इस मामूली काम के लिए उन्हें पुनर्जन्म लेना पड़े, यह उनके और देश के लिए घातक है! इस बार हो सकता है कि सिलसिला चाय बेचने से शुरू हो और उसके बाद सीधे फकीरी झोला आ जाए। बीच के सारे स्टैप गायब हो जाएं! और कोई पूछे भी नहीं कि दाढ़ी वाले बाबा, तुम इसे लेकर सब्जी लेने जा रहे हो या हिमालय पर तपस्या करने! वैसे झोला तो ये बहुत सुंदर है। ससुराल से मिला था या किसी का चुपचाप मार दिया!

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