मोदी सरकार की समझ से कहीं गहरी है चीन की घुसपैठ, गंभीरता से नहीं लेने के कारण राजनयिक चुनौतियों से घिरा देश

तीन महीने से ज्यादा लंबी कशमकश के बाद भी कोई नहीं कह सकता कि चीनी सेना की वापसी हो चुकी है। जो बातें सामने आ रही हैं, उनसे साफ है कि चीन ने लंबा जाल फेंका है। तमाम ओपन इंटेलिजेंस रिपोर्ट और मीडिया विश्लेषणों में एक ही बात कही जा रही है कि चीन की घुसपैठ गहरी है।

फोटोः सोशल मीडिया
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प्रमोद जोशी

प्रधानमंत्री से लेकर रक्षा मंत्री तक ने कहा है कि देश की एक इंच जमीन पर भी कब्जा होने नहीं दिया जाएगा। पर तीन महीने से ज्यादा लंबी कशमकश के बाद कोई नहीं कह सकता कि चीनी सेना की वापसी हो चुकी है। जो बातें सामने आ रही हैं, उनसे लगता है कि चीन ने लंबा जाल फेंका है। भारत सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी। इस घुसपैठ के समांतर कई परिघटनाएं हुई हैं जिनका राजनयिक महत्व है। नेपाल तो था ही, अब भूटान और बांग्लादेश के साथ रिश्तों में खलिश पैदा करने की कोशिश भी हुई है।

भारत के नागरिकता कानून में संशोधन के कारण बांग्लादेश सरकार पर विरोधियों का दबाव पहले से था। अब 5 अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर के भूमि-पूजन कार्यक्रम से यह दबाव बढ़ेगा। हाल में इमरान खान ने अचानक शेख हसीना को फोन करके इस बात का संकेत दे दिया है कि पाकिस्तान मौके का फायदा जरूर उठाना चाहेगा। इस दबाव के पीछे पाकिस्तान-चीन गठजोड़ काम कर रहा है। परिस्थितियां तो उनके मनोनुकूल हैं ही।

बहरहाल, लद्दाख पर वापस चलें। सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल वाईके जोशी ने कहा है कि यह बताना मुश्किल है कि समस्या का समाधान कब तक हो पाएगा। उन्होंने यह भी कहा है कि हम शांति-स्थापना के लिए पूरी शिद्दत के साथ काम कर रहे हैं, साथ ही किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार हैं। ऐसे में दो सवाल पैदा होते हैंः पहला, यह विवाद क्यों नहीं सुलझ पा रहा है? और सुलझा नहीं तो क्या होगा?

चीन क्या लड़ाई चाहता है?

तमाम ओपन इंटेलिजेंस रिपोर्टों और मीडिया विश्लेषणों में एक बात कही जा रही है कि चीन की घुसपैठ गहरी है। वह उससे ज्यादा जगहों पर काबिज है, जितनी जगह सरकार ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार की है। दोनों देशों के बीच कथित बफर जोन दरअसल भारतीय जमीन है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच बातचीत के दो सप्ताह बाद अखबार ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन एक प्रमुख पेट्रोलिंग पॉइंट से हटा नहीं है। जहां उसकी सेना है, वह जगह भारतीय क्षेत्र में 1.5 किलोमीटर भीतर है।

पैंगांग झील के उत्तरी किनारे पर चीन जिस भारतीय जमीन पर काबिज है, वह उस रेखा से भी भीतर है, जिस पर चीन ने 1960 में दावा किया था। ‘हिंदू’ ने अमेरिका के इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म स्ट्रैटफर के हवाले से खबर दी है कि चीन ने 50 नए आधार कैंप, हेलीपैड और संरचनाओं का निर्माण कर लिया है। अनुमान है कि चीन सर्दियों का इंतजार करेगा क्योंकि बर्फ पड़ने के कारण इस क्षेत्र की निगहबानी मुश्किल हो जाएगी और उसकी आड़ में चीन अपनी तरफ के इंफ्रास्ट्रक्चर को और पुष्ट कर लेगा।

क्या चीन लंबी लड़ाई की तैयारी करके आया है? विशेषज्ञों की मानें, तो जवाब है- नहीं। लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) डीएस हुड्डा का कहना है कि चीनी सेना का जो संख्या बल है, वह लंबी लड़ाई के लिए पर्याप्त नहीं है। लंबी लड़ाई के लिए उसे वर्तमान संख्या से दोगुनी या तिगुनी संख्या में सैन्य बल की जरूरत होगी। तो क्या यह मानसिक खेल है?

विशेषज्ञों का कहना है कि चीन भारत और दुनिया को जताना चाहता है कि हमारी ताकत को स्वीकार करो। इसके पहले चीन किसी एक इलाके में हरकत करता था। इस बार एक साथ कई इलाकों में उसने घुसपैठ की है। दूसरा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान भी इस योजना का भागीदार है? विशेषज्ञ मानते हैं कि भले ही अभी ऐसा नजर नहीं आ रहा है, पर यदि यह वृहत योजना है, तो पाकिस्तान की भागीदारी निश्चित रूप से है।

तब होगा क्या?

चीनी सेना पीछे नहीं हटी, तो क्या होगा? इस सवाल का जवाब फिलहाल कोई नहीं देगा। दोनों देश अपने वक्तव्यों में बहुत सावधानी बरत रहे हैं। बातचीत भी चल ही रही है, इसलिए उम्मीदें कायम हैं। पर चीन का अपनी अड़ पर कायम रहना चिंताजनक है। शायद चीन भारत के माध्यम से अमेरिका को भी कोई संदेश दे रहा है। लद्दाख विवाद का दायरा बढ़ गया है और यह अमेरिका-चीन के बीच शीतयुद्ध केंद्रीय विषय बन गया है। इसमें दक्षिण चीन सागर की परिस्थितियां भी जुड़ गई हैं।

इस दौरान अमेरिकी नौसेना के सबसे बड़े विमानवाहक पोत यूएसएस निमित्ज ने हिंद महासागर का दौरा किया और भारतीय नौसेना के साथ युद्धाभ्यास किया। यह अभ्यास गत 20 जुलाई को अंडमान निकोबार द्वीप समूह के पास किया गया। निमित्ज ने अपने साथी विमानवाहक पोत रेगन के साथ पिछले सप्ताह दक्षिण चीन सागर में नौसैनिक अभ्यास किया था, जिस पर चीन ने कड़ी नाराजगी जाहिर की थी। पिछले महीने के अंत में मलक्का जलडमरूमध्य के संकीर्ण मार्ग के पास भारत और जापान के नौसैनिक पोतों ने साझा युद्धाभ्यास किया था।

चीनी कमजोरियां

चीनी सेना ने घुसपैठ जरूर की है, पर इस घुसपैठ को फौजी ताकत के सहारे बनाए रखना भी चीन की सामर्थ्य में भी नहीं है। पश्चिमी विशेषज्ञों का अनुमान है कि तमाम दिक्कतों के बावजूद भारतीय सेना चीन पर भारी पड़ेगी। हारवर्ड कैनेडी स्कूल के बैल्फर सेंटर फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल अफेयर्स के एक अध्ययन के अनुसार, इस क्षेत्र में संख्या बल में भारतीय सेना ज्यादा नहीं, तो बराबरी पर जरूर है। पर चीन को रूसी सीमा भी देखनी है और शिनजियांग तथा तिब्बत में विद्रोहियों से निपटना भी है। भारतीय सेना को केवल चीनी सीमा को देखना है। कश्मीर और पाकिस्तानी सीमा के लिए व्यवस्था अलग है। चीनी सैनिक सीमा से दूर हैं जबकि भारतीय सेना अब सीमा के काफी करीब है।

बैल्फर सेंटर की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जमीन से ज्यादा महत्वपूर्ण हवाई युद्ध होगा। हालांकि, चीन की वायुसेना का आकार काफी बड़ा है, पर उसके पश्चिमी थिएटर पर जो लड़ाकू विमान तैनात हैं, उनके मुकाबले भारतीय विमान ज्यादा आधुनिक और बेहतर स्थिति में हैं। चीनी वायुसेना के हवाई अड्डे सीमा से दूर और काफी ऊंचाई पर हैं जिसके कारण वे अपनी क्षमता से आधे शस्त्रास्त्र ही उठा पाएंगे।

चीन को मिड-एयर रिफ्यूलिंग का भी सहारा लेना होगा, जिसके लिए उसके पास टैंकर अपर्याप्त संख्या में हैं। भारतीय वायुसेना के पास सीमा के काफी करीब हवाई अड्डे हैं और वह आसानी से होतान, ल्हासा/गोंगार, एंगारी-गुंसा और शिगाजे हवाई अड्डों पर धावे बोल सकती है। इन सब बातों के अलावा चीनी वायुसेना के हाल के युद्धाभ्यासों में ट्रेनिंग से जुड़ी खामियां भी सामने आई हैं।

राजनयिक चुनौतियां

निष्कर्ष यह कि चीन के पास दिखाने के लिए बड़ी सेना है, पर काफी बड़ी सीमा की रक्षा का भार होने के कारण पश्चिमी थिएटर का संचालन आसान नहीं। भारत के सामने राजनयिक चुनौतियां ज्यादा बड़ी हैं। चीन ने भारत के पड़ोस को अपने बस में कर रखा है। पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका पहले से चीनी प्रभाव में हैं। वह भूटान पर भी डोरे डाल रहा है। भूटान के वैदेशिक मामले भारत देखता है, पर पिछले कुछ समय से भूटान चाहता है कि वह स्वयं अपने विदेशी मामलों का संचालन करे।

चीन की दिलचस्पी डोकलाम को पूरी तरह अपने कब्जे में करने की है। इसके बदले में वह भूटान को कहीं और जमीन देने को तैयार है। लद्दाख विवाद के साथ ही चीन ने भूटान में अपनी दिलचस्पी दिखाकर चिंता पैदा की है। अब बांग्लादेश के अखबार ‘भोरेर कागोज’ ने लिखा है कि भारतीय उच्चायुक्त रीवा गांगुली दास को प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मुलाकात के लिए चार महीने से समय नहीं दिया है। उधर, इमरान खान ने अचानक 22 जुलाई को शेख हसीना से फोन पर बातचीत की और कश्मीर पर उनका समर्थन मांगा। शेख हसीना ने कश्मीर को लेकर कोई ऐसी बात नहीं कही, पर अचानक शुरू हुई इन गतिविधियों के तार आपस में जुड़े हुए हैं।

भारत सरकार ने लद्दाख पर चीनी पेशकदमी को या तो हल्के में लिया था या उसकी गंभीरता पर विचार नहीं किया था। सरकार को तथ्यों में हेरफेर करने के बजाय वस्तुस्थिति को स्पष्ट करते हुए चुनौती को खुलकर स्वीकार करना चाहिए। पूरा देश उसके साथ है। इस बात को याद रखना चाहिए कि सुरक्षा के लिए केवल मजबूत सरकार काफी नहीं होती, एक मजबूत देश की जरूरत होती है।

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