विष्णु नागर का व्यंग्यः सम्मानित पेशा है चौकीदारी, उसके सहयोग के बगैर चोरी के धंधे में संपूर्ण सफलता असंभव

वैसे चौकीदारी तो हमेशा से सम्मानित पेशा रहा है और जब चौकीदार खुद चोर से अपनी निगरानी में चोरी करवाता है तो इस पेशे का सम्मान इतना अधिक बढ़ जाता है कि ऐसे आदमी को अगर रत्न-पुरस्कार मिल जाएं तो भी आश्चर्य नहीं, प्रसन्नता व्यक्त करनी चाहिए।

फोटोः सोशल मीडिया
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विष्णु नागर

मैं समझता हूं कि चोरी अब एक 'सम्मानित पेशा' बन चुका है। इस बारे में हमें ही नहीं, चोरों को भी अपने पुराने खयालातों को बदलना चाहिए और इसे सम्मानित पेशे का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष करना चाहिए। चोरों को अगर चोर कहा जाए तो इसे अपना निरादर नहीं, सम्मान मानना चाहिए।इसे विनम्रतापूर्वक, मुस्कुराकर सम्मानपत्र या अभिनंदन ग्रंथ की तरह ग्रहण करना चाहिए और इसके लिए इस सम्मान से नवाजने वालों का आभार मानना चाहिए।

इस विशेषण से संबोधित करने वालों से न तो चिढ़ना चाहिए, न उनके विरुद्ध विषवमन करना चाहिए, न दूसरों को चोर बताकर यह सिद्ध करने की कोशिश करनी चाहिए कि वह नहीं, उनके विरोधी चोर हैंं। ऐसा करना सम्मानित बन चुके पेशे का स्वयं द्वारा अपमान है। मेरे मित्रों का तो सुझाव है कि अगर संविधान संशोधन की जरूरत पड़े तो करके इस पेशे की बेकद्री करने वालों को राष्ट्रविरोधी घोषित कर देने की हद तक जाना चाहिए।

अच्छा चलिए, मैं तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बात को समझाने की कोशिश करता हूं। जिसे समझ में आ जाए उसका भी भला और जिसे समझ में न आए, उसका भी भला।

हां तो जो स्वयंसिद्ध है, उसे भी सिद्ध करके मुझे यह बताना है कि चोरी क्यों अब एक 'सम्मानित पेशा' है? वैसे मैं विद्यार्थी कभी अच्छा नहीं रहा, इतिहास और समाजशास्त्र का तो बिल्कुल नहीं, इसलिए पहले के जमाने में इस पेशे को किस रूप में देखा जाता था, इसकी विशेष जानकारी मुझे नहीं है मगर मेरा अनुमान है कि इसे सम्मान की नजरों से देखा नहीं जाता होगा।

कारण यह है कि मैं जब छोटा था और फिर युवा हुआ, तब तक भी इस पेशे के प्रति सम्मान का भाव नहीं था। चोर को तब पुलिस मुस्तैदी से पकड़ा करती थी और उसे पकड़वाने में जनता भी मदद करती थी। इससे बचपन से ही मेरी यह समझ बनी कि चोरी करना पाप है और सबकुछ करना चाहिए मगर चोरी नहींं करना चाहिए। चोर को हम तब बहुत गलीज इनसान समझा करते थे बल्कि उसे इनसान समझते थे, इसमें शक है।

लेकिन आज समय बदला है, सदी बदली है, ट्रेंड बदला है। अब चोर को पकड़ने की बजाय चोर और चौकीदार दोनों से लोगों को डरना पड़ता है। पुलिस चोरी की एफआईआर दर्ज करने वाले को ही अक्सर धर लिया करती है और चोर को सलाह देती है कि तू भी इसके खिलाफ एक एफआईआर दर्ज कर दे, इसके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा भी दायर कर दे। फिर देखना, हमने इसके बारह नहीं बजा दिए तो कसम से अपनी मूंछ मुड़वाकर जेब में रख लेंगे। और ऊपर से हरी झंडी मिल गई- जो कि मिल ही जाती है, तो फिर तो हम इसकी बारह, तेरह, चौदह, क्या पंद्रह, सोलह, सत्रह सब बजा देंगे।

इसी बीच बड़े से बड़े नेता का फोन भी पुलिस के पास पहुंच जाता है कि ‘ओए, देखना भई, ये हमारा अपना खास बंदा है, इसका खूब ख्याल रखना। इसे किसी किस्म की परेशानी नहीं होनी चाहिए और हुई तो तुझे कमाई की जगह से हटवा कर ऐसी जगह पटकवा देंगे कि जहां तू लहरेंं गिनकर भी एक धेला नहीं कमा पाएगा। तेरी ये ऊपरी कमाई से आई जो चमाचम कार है न, इसे कबाड़ी भी हमारे डर से नहीं खरीदेगा। महंगे स्कूल-कालेज में तेरे बेटे-बेटी की जो पढ़ाई चल रही है, वह धरी की धरी रह जाएगी और तू जो ये मस्ती मार रहा है न आजकल, सब हवा हो जाएगी। तुझे ऐसा जोरदार सबक सिखाऊंगा कि तेरी चार पीढ़ियां तक याद रखेंगी। समझा न, अभी तो हिंदी में ही समझा रहा हूं वरना अंग्रेज़ी में समझाना शुरू किया तो तू इधर-उधर भागता नजर आएगा और कहीं कोई ठिकाना नहीं मिलेगा।’

तो भाइयों-बहनों, सीन अब तेजी से बदल रहा है। अब चोर वह नहींं, जो घर में सेंध लगाता है या पर्स या मोबाइल चुराकर भाग जाता है। ये तो अब निम्न कोटि के क्षम्य अपराध हैं बल्कि ये काम हैं, अनौपचारिक क्षेत्र के रोजगार की श्रेणी में आते हैं। लोग एफआईआर महज इसलिए करवाते हैं ताकि नया एटीएम कार्ड या डेबिट-क्रेडिट कार्ड या आधार कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस बिना किसी झंझट के बन जाए। यह सोचकर लोग रिपोर्ट नहीं करवाते हैं कि इससे उनका खोया हुआ सामान मिल जाएगा। इस बात को पुलिस भी अच्छी तरह जानती है और जनता भी।

तो चोर तो वह होता है, जिसके पास इतनी दौलत होती है, जिसका इतना रसूख होता है कि उसे चोर कहना अपनी ऐसी-तैसी करवाना है। अगर किसी ने उसे गलती से चोर कह दिया तो चोर, उसकी इधर से उधर तक, ऊपर से नीचे तक, दांए से बांए तक ऐसी-तैसी कर और करवा देगा कि वह भागता ही फिरेगा।

दरअसल ऐसा चोर देश या प्रदेश के संविधान सम्मत चौकीदार का घनिष्ठतम मित्र होता है, जिसे चौकीदार ‘भाई’ के संबोधन से संबोधित करता है। उदाहरण के लिए- मेहुल भाई। असली चौकीदार चोर का इतना घनघोर मित्र और हितैषी होता है कि उसे नेक सलाह देता है कि “ऐसा कर भैया जब तक मैं ड्यूटी पर हूं, तू सम्मानपूर्वक इस देश-प्रदेश से जो भी, जहां भी ले जाना हो, खुशी-खुशी ले जा, मैं सब निबट-समझ लूंगा। और जहां तक चोरी के माल के आपसी बंटवारे का प्रश्न है, तो अपन बाद में इसे प्रेमपूर्ववक, भाईचारे के वातावरण में निबटा लेंंगे। तुझे भाई कहा है तो भाई का कर्तव्य भी निबाहना होगा न! तूने चौकीदार पद पर मेरी नियुक्ति के समय साथ दिया था तो अब पगले, तुझे भूल थोड़े ही जाऊंगा।”

या फिर ये कहता है, “भाई, सुना है, आजकल तू ‘घाटे’ में चल रहा है, यह तो बड़े दुख की बात है। कल रात यह खबर सुनकर मुझे नींद नहीं आई थी कि मेरा भाई इतनी मुसीबत में है! खैैर,अब तू ऐसा कर उस घाटेवाली कंपनी को अच्छे से डुबो दे, दिवालिया हो जा और फिर मैं तुझे युद्धक विमान के पुर्जे बनाने का कारखाना खुलवा दूंगा। फिर सरकारी माल डकार कर उसे भी डुबा देना। तेरे जैसे भाइयं-बहनों की सेवा के लिए ही तो हमने इतने सरकारी बैंक खुलवा रखे हैं। लो दनादन कर्ज, खुद भी खाओ और हमें भी खिलाओ। मैं चौकीदार हूं तो देश का प्रधानसेवक भी तो हूं। मुझे देश का विकास भी तो करना है, इसलिए तू ऐसा कर कि इंपोर्ट-एक्सपोर्ट कर,फर्जी बिल पर बिल बनवाता जा और इस तरह देश सेवा में मेरा सहयोगी बना रह। ये देश अपना है भई, इसे पराया मत समझ!”

निष्कर्ष यह कि उसे चोरी कहो, डकैती कहो, आजकल अत्यंत सम्मानित नागरिकों का पेशा बन चुका है। इस पेशे में चोर भी चाहिए और चौकीदार का सहयोग भी। चौकीदार के संपूर्ण सहयोग के बगैर इस धंधे में संपूर्ण सफलता मिलना नामुमकिन है। ऐसा भी होता है, जैसा आजकल हो रहा है कि चौकीदार चोरी करवाता भी है और खुद भी करता है। इसलिए मैं देशवासियों से अपील करता हूं कि पुराने माइंडसेट से निकलकर चोरी को सम्मानित पेशे का स्थान देंं और चोर भी अपने दिमाग से यह बात निकाल देंं कि यह कोई घटिया काम है और चोर को चोर कहना उस फलती-फूलती बिरादरी का अपमान है। वैसे चौकीदारी तो हमेशा से सम्मानित पेशा रहा है और जब चौकीदार खुद चोर से अपनी निगरानी में चोरी करवाता है तो इस पेशे का सम्मान इतना अधिक बढ़ जाता है कि ऐसे आदमी को अगर रत्न-पुरस्कार मिल जाए तो भी आश्चर्य नहीं, प्रसन्नता व्यक्त करनी चाहिए।

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