जलवायु आपातकाल! दुनिया की 40 प्रतिशत से अधिक जमीन हो चुकी है बंजर

संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजरटीफिकेशन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट, ग्लोबल लैंड आउटलुक 2, के अनुसार दुनिया की 40 प्रतिशत से अधिक जमीन बंजर हो चुकी है और इससे दुनिया की आधी से अधिक आबादी प्रभावित हो रही है।

फोटो: सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजरटीफिकेशन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट, ग्लोबल लैंड आउटलुक 2, के अनुसार दुनिया की 40 प्रतिशत से अधिक जमीन बंजर हो चुकी है और इससे दुनिया की आधी से अधिक आबादी प्रभावित हो रही है। इसका मुख्य कारण सघन खेती का लगातार बढ़ता दायरा है। भूमि के बंजर होने का सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ रहा है। यह सब केवल शुष्क क्षेत्र में ही नहीं हो रहा है बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का विनाश, भूमि उत्पादकता में कमी, पानी की कमी और बृक्षों सहित जैव-विविधता के विनाश के कारण हरेक जगह जमीन बंजर होती जा रही है। दुनिया में जिस गति से सघन खेती का क्षेत्र बढ़ता जा रहा है, उसी गति से भूमि बंजर भी हो रही है। तापमान बृद्धि और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से भूमि के बंजर होने की दर बढ़ती जा रही है।

इन इलाकों में खेती पहले से अधिक महंगी हो गयी है क्योंकि भूमि की उत्पादकता में कमी आ रही है। यह समस्या गरीब देशों में अधिक है, पर इसका मूल कारण अमीर देशों का उपभोक्तावादी रवैया है। अमीर देशों में फ़ास्ट फैशन की मांग के लिए गरीब देशों में कपास उगाया जा रहा है और मांस की आपूर्ति के लिए सोयाबीन की खेती की जा रही है। यदि भूमि का उपयोग इसी तरह किया जाता रहा तो अगले तीस वर्षों में पूरे दक्षिण अमेरिका के क्षेत्रफल के बराबर जमीन और बंजर हो जायेगी।


दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रतिवर्ष लगभग 93 खरब डॉलर है, इसमें से भूमि के बंजर होने के कारण आधी अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। यदि भूमि को बंजर होने से बचाने की पहल की जाए तब दुनिया की अर्थव्यवस्था में 125 से 140 खरब डॉलर प्रतिवर्ष की बृद्धि होगी, यह राशि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक है। कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजरटीफिकेशन के एग्जीक्यूटिव सेक्रेटरी इब्राहीम थियन के अनुसार आधुनिक कृषि ने जिस तरह से पृथ्वी को प्रभावित किया है, वैसा व्यापक असर किसी और गतिविधि का नहीं है। प्रतिवर्ष जितने जंगल कटते हैं उनमें से 80 प्रतिशत का कारण आधुनिक कृषि का विस्तार है, कुल जल उपयोग में से अकेले कृषि में 70 प्रतिशत की खपत होती है और जैव-विविधता के विनाश का मुख्य कारण कृषि है। इसके कारण भूमि भी बंजर होती जा रही है, जिसके कारण खाद्यान्न उत्पादन, कार्बन भंडारण, जैव-विविधता, सकल घरेलू उत्पाद, स्वास्थ्य, और साफ़ पानी का संकट गहरा होता जा रहा है और दुनिया के अधिकतर हिस्से सूखे की चपेट में हैं। वर्तमान में जीवाश्म इंधनों और खेती के नाम पर दुनिया में प्रतिवर्ष 700 अरब डॉलर की सब्सिडी दी जा रही है, जिससे पर्यावरण को गंभीर नुकसान हो रहा है। सब्सिडी के कारण ही सघन खेती का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, और भूमि बंजर होती जा रही है। यदि दुनिया पूरे अगले दशक में भूमि संरक्षण के लिए 1.6 ख़राब डॉलर खर्च करे तो एक अरब हेक्टेयर भूमि को बंजर होने से बचाया जा सकता है। अनुमान है कि भूमि संरक्षण के लिए 1 डॉलर खर्च करने पर इसका लाभ 7 से 30 डॉलर तक मिलता है।

इन्टर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के अनुसार तापमान बृद्धि के साथ-साथ जीवन को संभालने की पृथ्वी के क्षमता ख़त्म होती जा रही है। तापमान बृद्धि से सूखा, मिट्टी के हटने (मृदा अपरदन) और जंगलों में आग के कारण कहीं कृषि उत्पादों का उत्पादन कम हो रहा है तो कहीं भूमि पर जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है। इन सबसे भूख बढ़ेगी, लोग विस्थापित होंगे, युद्ध की संभावनाएं बढेंगी और जंगलों को नुकसान पहुंचेगा। भूमि का विनाश एक चक्र की तरह असर करता है– जितना विनाश होता है उतना ही कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बढ़ता है और वायुमंडल को पहले से अधिक गर्म करता जाता है। आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार भूमि और जंगलों को स्वतः पनपने का मौका दिया जाना चाहिए, जिससे अधिक मात्रा में कार्बन को वायुमंडल में मिलने से रोका जा सके, मांसहार के बदले लोगों को शाकाहार अपनाना चाहिए और भोजन को नष्ट नहीं करना चाहिए। इन सबसे मनुष्य का स्वास्थ्य सुधरेगा, गरीबी कम होगी और जंगलों की आग पर काबू पाया जा सकेगा।


यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग के प्रोफ़ेसर डेव रे के अनुसार पृथ्वी का क्षेत्र वही है पर निर्बाध गति से जनसँख्या बढ़ती जा रही है और दूसरी तरफ इसके चारों तरफ का वायुमंडल घुटन भरा हो गया है। कुल मिलाकर ऐसी स्थिति है जिसे जलवायु आपातकाल कहा जा सकता है। हालत ऐसे हैं कि पृथ्वी भी अब छोटी पड़ने लगी है और इसका पारिस्थितिकी तंत्र और वातावरण कभी इतने खतरे में नहीं था।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ लीड्स के प्रोफ़ेसर पिएर्स फोरस्टर के अनुसार आईपीसीसी की रिपोर्ट से स्पष्ट है की पृथ्वी पर वनों का क्षेत्र बढ़ाना पड़ेगा और चारागाहों का क्षेत्र कम करना पड़ेगा। आईपीसीसी की रिपोर्ट के एक लेखक प्रोफ़ेसर जिम स्केया के अनुसार पृथ्वी पहले से ही संकट में थी पर जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को कई गुना अधिक बढ़ा दिया है। पृथ्वी के तीन-चौथाई से अधिक क्षेत्र में मानव की गहन गतिविधियाँ चल रहीं हैं। अवैज्ञानिक भूमि-उपयोग, जंगलों का नष्ट होना, अनगिनत पालतू मवेशियों का बोझ और रासायनिक उर्वरकों के अनियंत्रित उपयोग के कारण वायुमंडल में मिलाने वाले कुल कार्बन डाइऑक्साइड में से एक-चौथाई का योगदान है। पृथ्वी के 72 प्रतिशत क्षेत्र में सघन मानव-जनित गतिविधियाँ चल रहीं हैं और केवल 28 प्रतिशत भू-भाग ऐसा है जिसे प्राकृतिक कहा जा सकता है। इसमें से 37 प्रतिशत क्षेत्र में घास का मैदान या चारागाह है, 22 प्रतिशत पर जंगल हैं, 12 प्रतिशत भूमि पर खेती होती है और केवल एक प्रतिशत भूमि का उपयोग बस्तियों के तौर पर किया जाता है। पर, पृथ्वी के केवल एक प्रतिशत क्षेत्र में बसने वाला मनुष्य पूरी पृथ्वी, महासागरों और वायुमंडल को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है।


भूमि की सबसे उपजाऊ परत, जो सबसे ऊपर का हिस्सा होता है, वह एक साल में जितना बन पाता है उससे 100 गुना तेजी से उसका नाश हो रहा है। मांस और दूध उद्योग के लिए मवेशियों की इतनी बड़ी संख्या हो गयी है कि चारागाह के चलते बड़े वन क्षेत्र नष्ट कर दिए गए हैं। आईपीसीसी के वरिष्ठ लेखक डेविड विनर के अनुसार भूमि जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण है और हमें सतत भविष्य के लिए इसकी देखभाल करनी ही पड़ेगी।

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