किसानों की हालत मनरेगा मजदूरों से भी बदतर हुई, पीएम मोदी के दावे खोखले, एक भाषण से दूसरे तक बदल जाते हैं

खेती एक ऐसा काम है जहां सारे श्रम, पूंजी और रखवाली के बाद भी उपज या पूंजीवादी शब्दावली में उत्पाद की कोई गारंटी नहीं है। फिर भी करोड़ों किसानों का जीवट ही है जो उन्हें खेती करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

फाइल फोटोः पीटीआई
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महेन्द्र पांडे

हमारे प्रधानमंत्री बार-बार अगले वर्ष तक किसानों की आय को दोगुना करने की बात करते हैं, किसानों के हित की बात का दिखावा करते हैं, अलीगढ समेत हरेक जगह गर्व से किसानों को सब्जबाग दिखाते हैं, फिर भी किसान असंतुष्ट हैं और लम्बे समय से आन्दोलन करते जा रहे हैं और लगातार आन्दोलन में धार पैदा करते जा रहे हैं। सरकार बार-बार प्रचारित कर रही है कि जो आन्दोलन कर रहे हैं वे उग्रवादी हैं, राष्ट्रद्रोही हैं, आतंकवादी हैं, बस किसान नहीं हैं। जाहिर है प्रधानमंत्री बताना चाहते है कि सरकार ने किसानों को इतनी सुविधाएं दी हैं कि उन्हें कोई कष्ट नहीं है और वे फिर आन्दोलन क्यों करेंगें? दरअसल प्रधानमंत्री हों या उनकी सरकार का कोई भी मंत्री, किसी को जनता से मतलब ही नहीं है- किसानों से भी नहीं।

अलीगढ में प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें छोटे किसानों की बड़ी फिक्र है और इन किसानों के लिए उन्होंने अनेक कदम उठाए हैं। इस मामले में अपने आप को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के समकक्ष खड़ा कर लिया। मोदी जी ने कहा देश के 10 में से 8 किसान के पास 2 हेक्टेयर से छोटा खेत है और इन किसानों के लिए उन्होंने लगातार काम किया है। प्रधानमंत्री जब किसानों के बारे में बात करते हैं, तब अजीब सा लगता है, क्योंकि उन्होंने और उनकी सरकार ने किसानों के बारे में संसद से लेकर सभाओं तक हर जगह कृषि कानूनों के बारे में झूठ ही बोला है और इस पर किसानों से बात करने के बदले इस कानूनी झूठ को फैलाने के लिए अपने मंत्री-संतरी तक को सड़कों पर उतार दिया था।

इन सबके बीच एक सरकारी रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि किसानों की खेती से दैनिक आय मनरेगा के मजदूरों से भी कई गुना कम है। यहां इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि ग्रामीण परिवेश में अब तक मनरेगा के मजदूरों को आर्थिक तौर पर सबसे निचले दर्जे का माना जाता था। पर हमारे बड़बोले प्रधानमंत्री के राज में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर खेती करने वाले किसान पहुंच गए हैं। इसी महीने भारत सरकार के नेशनल स्टैटिस्टिकल आर्गेनाईजेशन द्वारा जुलाई 2018 से जून 2019 तक किसानों का विस्तृत अध्ययन कर सिचुएशन असेसमेंट रिपोर्ट प्रकाशित की गई है, जिसके अनुसार खेती से जुड़े किसानों की कृषि उत्पादन के सन्दर्भ में आय महज 27 रुपये प्रतिदिन है, जबकि मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों को 180 रुपये रोज मिलते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों की 42.5 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर करती है, पर अब यह आबादी खेती से नहीं बल्कि मजदूरी कर या फिर नौकरी कर अपना पेट भर रही है। हमारे देश में किसान उसे माना जाता है जो अपने खेत में प्रतिवर्ष 4000 रुपये तक की फसल उगाता है, या फिर फल और सब्जी बेचता है, या मवेशियों से संबंधित कारोबार करता है। यह परिभाषा ही साबित करती है कि समाज में इससे नीचे के आर्थिक पायदान पर और कोई नहीं होगा। रिपोर्ट के अनुसार देश के ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 9.31 करोड़ परिवार खेतिहर के तौर पर परिभाषित हैं, इनमें से महज 38 प्रतिशत की आय कृषि उत्पादन पर आधारित है, जबकि इससे अधिक संख्या में यानि 40 प्रतिशत की आय का साधन रोजगार या नौकरी है।


जाहिर है, खेती एक ऐसा पेशा है, जिसमें आय है ही नहीं। इससे जुड़ने वाले लोग भी यह पेशा छोड़ते जा रहे हैं और जब मनरेगा में भी काम नहीं मिलता तभी खेतों की तरफ कदम बढाते हैं। वर्ष 2020 में जब लॉकडाउन के कारण शहरों से श्रमिकों और कामगारों का पलायन अपने गांव की तरफ हो गया था, तब पहली बार खेतों में काम करने वालों की संख्या बढ़ी थी। कृषि उत्पादन से अपना गुजारा करने वालों की संख्या वर्ष 2012-2013 में 48 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2019 तक घट कर 38 प्रतिशत ही रह गई।

प्रधानमंत्री के खोखले दावों की पोल लगातार केंद्र सरकार की संस्थाएं ही खोलती हैं, पर पीएम इन आंकड़ों का उपयोग नहीं करते, उनके आंकड़े मनगढ़ंत होते हैं और तभी एक भाषण से दूसरे भाषण के बीच बदल जाते हैं। प्रधानमंत्री एक काम जरूर करते हैं कि ऐसी हरेक रिपोर्ट को जनता की नजरों से दूर कर देते हैं और संसद के पटल तक पहुंचने नहीं देते। हालांकि इन सरकारी आंकड़ों में भी अर्ध्यसत्य ही जाहिर होता है।

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012-2013 की तुलना में वर्ष 2019 तक किसानों की आय में 60 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है, पर इस आकलन में मुद्रास्फीति की दर को गायब कर दिया गया है। मुद्रास्फीति की दर का आकलन करने के बाद आय में वृद्धि महज 21 फीसद रह जाती है। इस सरकार के दौर में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था किस तरह पिछड़ रही है, इसका उदाहरण है– 2012-2013 से 2019 के बीच कृषि क्षेत्र में महज 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई पर इसी अवधि में देश का सकल घरेलु उत्पाद 52 प्रतिशत बढ़ गया। किसानों द्वारा लिए गए लोन में 16.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

किसानों की त्रासदी केवल सरकार और बीजेपी तक सीमित नहीं है, बल्कि जो समाज उन्हें अन्नदाता घोषित करता है, उसी समाज का मीडिया और सोशल मीडिया उन्हें बदनाम करने पर तुला है। किसान चाहते हैं कि फसलों के एमएसपी के अनिवार्यता के लिए एक नया कानून बनाया जाए, पर मीडिया और सोशल मीडिया पर बार-बार बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने स्वयं कह दिया है कि एमएसपी नहीं हटेगा, किसानों को और क्या गारंटी चाहिए? मीडिया और सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के वचनों को ब्रह्मवाक्य और देश का कानून बताकर किसानों को बहकाने में प्रयासरत बीजेपी कार्यकर्ता, मीडिया से जुड़े लोगों और अंधभक्तों को सबसे पहले नोटबंदी के समय महान प्रधानमंत्री के वचनों और वादों की समीक्षा करनी चाहिए।


दरअसल हकीकत तो यही है कि प्रधानमंत्री जो कहते हैं ठीक उसका उल्टा होता है। नोटबंदी के समय भी प्रधानमंत्री सबसे पिछड़े तबके का विकास चाहते थे, पर अडानी-अंबानी और अमीर हो गए और पिछड़े अति-पिछड़े में तब्दील हो गए। नए कृषि कानूनों के बारे में फिर से प्रधानमंत्री सबसे पिछले लोगों के भले की बात कर रहे हैं, जाहिर है नोटबंदी वाला परिणाम फिर सामने आएगा। प्रधानमंत्री जी बताते हैं कि सरकारी मंडियां वहीं रहेंगी, पर मंडियों के बारे में बात करते हुए भूल जाते हैं कि नए कृषि कानूनों का सबसे मुखर विरोध उन राज्यों के किसान ही कर रहे हैं जहां जीवंत सरकारी मंडियां हैं।

समाज में भी किसानों की चर्चा उनकी आत्महत्याओं या फिर आन्दोलनों के समय ही उठती है| दरअसल उपभोक्ता और पूंजीवादी बाजार ने किसानों और समाज के बीच गहरी खाई पैदा कर दी है। एक दौर था जब अनाज दूकानों में बोरियों में रखा जाता था और इसे खरीदने वाले अनाज के साथ ही किसानों के बारे में भी सोचते थे। आज का दौर अनाज का नहीं है, बल्कि पैकेटबंद सामानों का है। इन पैकेटबंद सामानों को हम वैसे ही खरीदते हैं, जिस तरह किसी औद्योगिक उत्पाद को खरीदते हैं और इनके उपभोग के समय ध्यान उद्योगों का रहता है, न कि खेतों का। हरित क्रान्ति के बाद से भले ही कुपोषण की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही हो, पर्यावरण का संकट गहरा होता जा रहा हो, भूजल लगातार और गहराई में जा रहा हो, पर अनाज से संबंधित उत्पादों की कमी खत्म हो गई है। पहले जो अकाल का डर था वह मस्तिष्क से ओझल हो चुका है और इसके साथ ही किसान भी समाज के हाशिये पर पहुंच गए।

सरकारें भी पिछले कुछ वर्षों से किसानों की समस्याओं के प्रति उदासीन हो चुकी हैं। आज के दौर में हालत यह है कि खेती को भी पूंजीवाद के चश्में से देखा जा रहा है और एक उद्योग की तरह चलाने की कोशिश की जा रही है। खेती से जुड़ी सबसे बड़ी हकीकत यह है कि बहुत बड़े पैमाने पर किये जाने वाले श्रम में कुछ भी निश्चित नहीं है। इसमें किसान का श्रम और पूंजी ही बस निश्चित होती है, आजकल बिजली और पानी भी अधिकतर जगहों पर उपलब्ध है- इतने के बाद भी एक बुरे मौसम की मार सबकुछ खत्म कर देती है। खेती एक ऐसा काम है जहां सारे श्रम, पूंजी और रखवाली के बाद भी उपज या पूंजीवादी शब्दावली में उत्पाद की कोई गारंटी नहीं है। फिर भी करोड़ों किसानों का जीवट ही है जो उन्हें खेती करने के लिए प्रोत्साहित करता है। यदि सबकुछ ठीक रहा और अनुमान के मुताबिक उपज भी रही, तब भी लागत मूल्य भी बाजार से वापस होगा या नहीं, इसका भी पता नहीं होता।


अब सरकार पूरी कृषि व्यवस्था को डिजिटल स्वरुप देने और एग्रीस्टैक के नाम पर किसानों की व्यक्तिगत जानकारी जुटाने के प्रयास में है तो दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर कृषि के क्षेत्र को निजी कंपनियों के हाथों में देने की फिराक में है। इस काम के लिए जिन पांच डिजिटल कंपनियों से करार किया गया है उनमें सिस्को नामक अमेरिकी कंपनी भी है, जबकि हमारे प्रधानमंत्री लगातार भारत को आत्मनिर्भर बनाने के प्रवचन देते रहे हैं। इसमें अंबानी की जियो भी शामिल है, जाहिर है जल्दी ही अंबानी बड़े पैमाने पर कृषि क्षेत्र में नजर आएंगे।

जाहिर है, खेती अब एक ऐसी गतिविधि बन गई है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आर्थिक बोझ बन गई है। अब यह कोई आय का साधन नहीं रह गई है। दोगुनी आय का सपना दिखा कर सरकार ने उनको भुखमरी के कगार पर ला खड़ा किया है, जिनकी मिहनत से हमारी थाली में खाना सजता है।

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