खरी-खरी: उदयपुर शिविर में तय रणनीति को कार्यकर्ता तक पहुंचाने का एक्शन प्लान भी बनाना होगा कांग्रेस को

इस समय सांप्रदायिकता का जो संकट हिन्दुत्व राजनीति के रूप में देश पर मंडरा रहा है, उदयपुर शिविर में उस संकट से निबटने के लिए नई रणनीति तैयार करने के साथ ही उसे कार्यकर्ता तक पहुंचाने का एक्शन प्लान भी पार्टी को बनाना होगा।


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ज़फ़र आग़ा

कांग्रेस चली उदयपुर। यह सफर बहुत पहले हो जाना चाहिए था। लेकिन देर आए, दुरुस्त आए। कांग्रेस पार्टी के लिए चिंतन अब आवश्यक हो चुका है। हमें यह बात अच्छी लगे या बुरी, तथ्य यह है कि नरेंद्र मोदी और संघ ने मिलकर वैचारिक स्तर पर एक ‘न्यू इंडिया’ बना दिया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह सिद्ध कर दिया कि जनता अब केवल गवर्नेंस (शासन प्रणाली) के आधार पर वोट नहीं डाल रही है। वहां तो योगी की बुलडोजर राजनीति पर जनता ने वोट डाला। उत्तर प्रदेश का ‘बुलडोजर मॉडल’ चुनाव जीतने का ऐसा तरीका बन गया है कि सभी बीजेपी शासित राज्य अपने यहां उसी मॉडल को लागू कर चुनाव जीतने की तैयारी कर रहे हैं। देश की गहराती आर्थिक दुर्दशा एवं बेरोजगारी के बढ़ते सैलाब में केवल बुलडोजर मॉडल ही जनता को भ्रमित कर उसे ‘हिन्दू’ गौरव पर गौरवान्वित कर बीजेपी वोट ले सकती है। यह एक सफल चुनावी फार्मूला सिद्ध हो रहा है जिसका प्रयोग अब बीजेपी पूरे देश में कर रही है। लेकिन वैचारिक स्तर पर यह कांग्रेस जैसी पार्टी के लिए एक अत्यंत गंभीर स्थिति है क्योंकि बुलडोजर मॉडल कांग्रेस के वैचारिक अस्तित्व पर एक गहरा प्रहार है। इसलिए कांग्रेस को यह तय करना है कि वह किस तरह की वैचारिक धारा अपनाए जिसके आधार पर वह चुनाव भी जीत सके।

यह कांग्रेस पार्टी के लिए एक गंभीर राजनीतिक सवाल है जिसका उत्तर उसको उदयपुर चिंतन शिविर में खोज ही निकालना होगा। यह तो पार्टी ही तय करेगी कि कैसा रास्ता अपनाए। लेकिन इन स्थितियों में पार्टी के सामने केवल दो ही रास्ते हैं। एक, कांग्रेस भी मौजूदा स्थिति में हिन्दुत्व विचारधारा के आगे घुटने टेक दे और चुनाव जीतने के लिए ‘साफ्ट हिन्दुत्व’ की लाइन ले। दूसरा रास्ता यह है कि पार्टी खुलकर वैचारिक स्तर पर हिन्दुत्व का विरोध करे। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी में एक वर्ग ऐसा है जो साफ्ट हिन्दुत्व के रास्ते को पसंद करता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या साफ्ट हिन्दुत्व बीजेपी के ‘हार्ड हिन्दुत्व’ की वैचारिक काट हो सकता है। यह संभव ही नहीं है।

पार्टी ने 1980 के दशक में एक चुनाव में यह प्रयोग किया और वह सन 1989 का चुनाव हार गई। इसलिए उदयपुर में पार्टी नेतृत्व को सबसे पहले इस भ्रम को दूर करना होगा। कांग्रेस कांग्रेस है। वह बीजेपी की बी टीम बनकर सफल नहीं हो सकती है। इसलिए वैचारिक स्तर पर पार्टी को नेहरू और गांधी की विचारधारा पर अटल होकर अपने लिए एक नया रास्ता चुनना होगा। उसको किस प्रकार व्यवहार में लाया जाए, यह बात उदयपुर में तय हो जानी चाहिए। गांधी परिवार इसी विचारधारा पर मजबूती से टिका हुआ है। अब आवश्यकता यह है कि ऊपर से नीचे तक पार्टी को भी इस बात के लिए तैयार कर लिया जाए। हर स्तर पर यह बात साफ हो जानी चाहिए कि पार्टी का रास्ता संविधान का रास्ता है। वह चुनाव भी इसी विचारधारा के साथ ही लड़ेगी।


दूसरा अहम मुद्दा है पार्टी संगठन का। यह एक जटिल मुद्दा है। किसी भी पार्टी में संगठन बनाना सरल नहीं होता है। इसलिए यह सोच लेना कि 2024 तक कांग्रेस पार्टी के तमाम संगठनात्मक मुद्दे हल हो जाएंगे, सही नहीं होगा। कांग्रेस को यह समस्या हल करने के लिए एक दूरगामी रणनीति अपनानी होगी। इस समस्या के साथ-साथ सन 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने की क्या रणनीति हो, यह तो पार्टी के उदयपुर चिंतन शिविर में तय करना ही होगा। कांग्रेस पार्टी इस समस्या का समाधान पहले ही खोज चुकी है। 2004 के लोकसभा चुनाव से पूर्व शिमला कांग्रेस अधिवेशन में पार्टी ने जो रास्ता अपनाया था, उसी रास्ते को फिर से अपनाने की आवश्यकता है। वह रास्ता था विपक्षी एकता का। यह बात विपक्ष की ओर से भी फिर उठ रही है। बीजेपी विरोधी वोट को विपक्ष आपस में बांटकर देश की विपक्षी पार्टियां आपसी गठबंधन से बीजेपी को हराएं, यह उदयपुर में तय करना ही होगा। जिस प्रकार 2004 में चुनाव से पूर्व इसी रणनीति के तहत कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष यूपीए प्लेटफार्म पर एकत्रित हुआ था, वैसे ही पार्टी को फिर विपक्ष का एक नया प्लेटफार्म बनना है। मौजूदा परिस्थितियों में ममता बनर्जी और शरद पवार जैसे क्षेत्रीय नेताओं का कद ऊंचा होने के कारण इस रास्ते में थोड़ी कठिनाइयां हैं। लेकिन यह सब समझते हैं कि कांग्रेस के बिना देशव्यापी विपक्षी एकता संभव नहीं है। इसलिए ममता और पवार जैसे क्षेत्रीय नेताओं को समझा-बुझाकर विपक्षी एकजुटता संभव है। यह काम उदयपुर से शुरू हो जाना चाहिए।

अब रहा नेतृत्व का सवाल। यह मुद्दा भी तय हो जाना चाहिए। राहुल गांधी पार्टी की कमान संभालेंगे या नहीं, पार्टी को यह भ्रम समाप्त करना चाहिए। पार्टी को एक युवा और ऊर्जावान नेता की आवश्यकता है। राहुल गांधी पिछले चुनाव में पार्टी के लिए कठिन परिश्रम कर चुके हैं। उनको ही पार्टी की कमान फिर सौंपनी चाहिए। उदयपुर से यह संदेश साफ तौर पर जाना चाहिए ताकि पार्टी में नेतृत्व का भ्रम टूटे और उदयपुर में यह भ्रम दूर हो सकता है।

अब रहा सवाल कि नेतृत्व किस प्रकार काम करे। इसका मॉडल स्वयं इंदिरा गांधी के 1977-1980 की कार्यशैली में मौजूद है। इंदिरा गांधी इस देश में केवल एक सफल प्रधानमंत्री के रूप में याद की जाती हैं। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि वह इस देश की सर्वश्रेष्ठ विपक्षी नेता भी रही हैं। उन्होंने ही 1977 की हार के बाद कांग्रेस को संकट से उबारा था। केवल तीन वर्षों 1977-80 के बीच में कांग्रेस को इंदिरा गांधी ने फिर जनता पार्टी को हराकर सत्ता में बैठा दिया था। यह कोई सरल काम नहीं था। 1977 की हार के बाद स्वयं इंदिरा गांधी और कांग्रेस की साख एवं लोकप्रियता बिल्कुल घट चुकी थी। पार्टी के सामने अस्तित्व का सवाल था। ऐसे संकट के समय में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को न केवल पुनर्जीवित किया बल्कि जनता पार्टी जैसी लोकप्रिय सरकार को केवल तीन वर्षों में सत्ता से बाहर कर कांग्रेस को फिर सत्ता तक पहुंचा दिया। यह कोई आसान काम नहीं था। इसके लिए स्वयं इंदिरा गांधी उन तीन वर्षों में दिल्ली छोड़ सारे देश के भ्रमण पर रहीं। इससे भी बड़ी बात यह कि वह चिकमगलूर से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद लोकसभा में भी मुश्किल से जाती थीं। उन तीन वर्षों में वह भारत भ्रमण कर हर समय जनता के संपर्क में रहीं। इस कठिन परिश्रम का नतीजा था कि 1980 में कांग्रेस को फिर सत्ता में पहुंचा दिया।


इसमें कोई शक नहीं कि आज राजनीतिक परिस्थितियां बहुत बदल चुकी हैं। लेकिन राजनीति में सफलता का रास्ता कठिन परिश्रम से ही निकलता है। यही इंदिरा गांधी की विपक्षी राजनीति का रहस्य था और इसी ने इंदिरा को फिर इंदिरा बना दिया था। इसलिए कांग्रेस नेतृत्व को इंदिरा गांधी के विपक्ष के दौरे से सबक लेकर उसी कठिन परिश्रम से राजनीति करनी होगी।

कांग्रेस ने उदयपुर में देश के सभी ज्वलंत मुद्दों पर चिंतन करने का फैसला किया है। पार्टी के नेतागण किसान समस्या से लेकर बेरोजगारी और आर्थिक संकट तक तमाम मुद्दों पर एक नई रणनीति बनाने की कोशिश करेंगे। कांग्रेस को उदयपुर से एक नए संकल्प के साथ उतरना होगा। इतिहास गवाह है कि हर संकट में कांग्रेस ने ही देश को संकट से बचाया है। इस समय सांप्रदायिकता का जो संकट हिन्दुत्व राजनीति के रूप में देश पर मंडरा रहा है, उसका निवारण कांग्रेस को ही करना होगा। लेकिन अब समय बहुत कम बचा है। उदयपुर का पड़ाव उस संकट से निबटने के लिए एक नई रणनीति तैयार करने का है। लेकिन एक बार यह रणनीति तैयार हो जाए, तो फिर चिंतन का समय समाप्त और कार्रवाई का समय तुरंत शुरू हो जाएगा। अर्थात उदयपुर के बाद तुरंत एक कांग्रेस अधिवेशन होना चाहिए जिसमें उदयपुर में तय की गई रणनीति को कांग्रेस कार्यकर्ता तक पहुंचाने का काम पूरा हो जाए। इसी अधिवेशन में पार्टी के नए अध्यक्ष की नियुक्ति हो जाए। बस, इसके तुरंत बाद विपक्षी एकजुटता की दिशा में तेजी से जुटकर एक नए यूपीए का गठन हो सके ताकि एकजुट विपक्ष 2024 के चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व में विपक्ष बीजेपी के दांत खट्टे कर सके।

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