स्कूली शिक्षा पर मोदी सरकार की कंजूसी, आखिर कैसे पढ़ेगा इंडिया

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के आम बजट में स्कूली शिक्षा के लिए आवंटन में लगातार कटौती देखने को मिल रही है। सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि संसाधनों की कमी में स्कूली शिक्षा कैसे बेहतर होगी।

फोटोः सर्व शिक्षा अभियान
फोटोः सर्व शिक्षा अभियान

भारत डोगरा

सरकारी स्तर पर स्कूली शिक्षा को बेहतर करने के वायदे बार-बार किए जाते हैं, लेकिन इन वायदों को पूरा करने के लिए जरूरी संसाधन नहीं उपलब्ध हो पा रहे हैं। साल 2014-15 में केंद्र सरकार के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने 45722 करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन अगले दो वर्ष का वास्तविक खर्च क्रमशः 41800 करोड़ रुपये और 42989 करोड़ रुपये रहा। दूसरे शब्दों में 2 वर्षों तक लगातार वर्ष 2014-15 की तुलना में स्कूली शिक्षा का खर्च कम हुआ। यदि महंगाई को ध्यान में रखा जाए, तो खर्च में यह कमी इन आंकड़ों से भी अधिक थी। इसके बाद आंकड़े केवल बजट आवंटन के ही उपलब्ध हैं, वास्तविक खर्च के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

इस वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि जहां 2013-14 में जीडीपी का 3.1 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा (स्कूल शिक्षा व उच्च शिक्षा दोनों मिलाकर) पर खर्च हुआ, वहीं 2017-18 में जीडीपी का मात्र 2.7 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च हुआ। अगर हम जीडीपी के हिस्से के रूप में केवल केंद्र सरकार के शिक्षा पर खर्च को देखें तो 2014-15 में यह हिस्सा 0.55 प्रतिशत था (वास्तविक खर्च) जबकि वर्ष 2018-19 के बजट अनुमान में यह सिमट कर 0.45 प्रतिशत तक पहंच गया है।

केवल केंद्र सरकार के शिक्षा पर खर्च को केंद्र सरकार के बजट के प्रतिशत के रूप में देखा जाए तो 2014-15 के वास्तविक खर्च में यह हिस्सा 4.1 प्रतिशत था, जबकि 2018-19के बजट आवंटन में यह 3.6 प्रतिशत तक सिमट गया।

सर्व शिक्षा अभियान पर वर्ष 2014-15 में 24097 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि अगले वर्ष यह खर्च 2015-16 में 21661 करोड़ तक और वर्ष 2016-17 में 21685 करोड़ रुपए तक सिमट गया। 2017-18 के लिए संशोधित अनुमान 23500 करोड़ रुपए भी 2014-15 के खर्च से कम है। इसके लिए 2018-19 के बजट में 26129 करोड़ रुपए का प्रावधान है।

अब यदि हम अध्यापकों के प्रशिक्षण और वयस्क शिक्षा को देखें, तो यहां भी खर्च में कमी सामने आती है। वर्ष 2014-15 में इस मद पर 1158 करोड़ रुपए खर्च किए गए जबकि अगले वर्ष यह खर्च 916 करोड़ रुपए पर सिमट गया और उसके अगले वर्ष और भी कम होकर 817 करोड़ रुपए तक सिमट कर रह गया। 2017-18 के बजट में शिक्षक प्रशिक्षण और व्यस्क शिक्षा के लिए 926 करोड़ रुपए का प्रावधान था, जिसे संशोधित अनुमान में और कम कर 841 करोड़ रुपए तक समेट दिया गया। वर्ष 2018-19 में इस मद में 871 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है।

मिड-डे मील के लिए 2014-15 में 10523 करोड़ रुपए खर्च किए गए। यह खर्च अगले वर्ष 9145 करोड़ रुपए तक कम हुआ और फिर उसके अगले वर्ष 2016-17 में 9475 करोड़ रुपए रहा। 2017-18 में इसके लिए 10000 करोड़ रुपए का आवंटन था और 2018-19 में यह आवंटन 10500 करोड़ रुपए रखा गया है। यानी इस बार भी 2014-15 के वास्तविक खर्च से कम का बजट आवंटन किया गया है।

माध्यमिक शिक्षा में लड़कियों को प्रोत्साहित करने की राष्ट्रीय स्कीम के लिए 2017-18 के बजट में 320 करोड़ का प्रावधान था, जिसे 2018-19 में कम कर मात्र 256 करोड़ रुपए तक समेट दिया गया है।

स्पष्ट है कि स्कूल शिक्षा के लिए संसाधनों को जहां बढ़ाना जरूरी है, वहीं केंद्र सरकार के बजट में इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के लिए संसाधन कम होने की प्रवृत्ति नजर आ रही है। अतः इस ओर समुचित ध्यान देकर स्कूली शिक्षा के लिए संसाधनों को बढ़ाना जरूरी है।

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