आकार पटेल का लेख: ठंडे बस्ते में तो जा चुके हैं कृषि कानून, बस '56 इंच सीने' की मजबूती दिखाने के लिए नहीं ले रही सरकार वापस

आखिर सरकार क्यों किसान आंदोलन को चलने दे रही है, विवादित कृषि कानूनों को रद्द क्यों नहीं कर देती?संभवत: सिर्फ इसलिए कि अगर ऐसा किया तो फिर 56 इंच छाती की मजबूती कैसे दिखेगी!

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आकार पटेल

संयुक्त किसान मोर्चा ने कृषि कानूनों को निरस्त करनी मांग दोहराते हुए इस महीने के अंत में, 26 सितंबर को भारत बंद का आह्वान किया है। सवाल यह है कि पिछले साल शुरू हुआ धरना अब भी जारी क्यों है? इस पूरे मामले की पड़ताल करना काफी दिलचस्प है।

किसान आंदोलन जब शुरु हुआ था तो किसानों ने केंद्र सरकार के सामने आठ मांगें रखी थीं। सबसे पहली मांग थी कि, उस कानून को निरस्त किया जाए जिसमें विनियमित मंडियों के बाहर कृषि उपज के टैक्स फ्री की अनुमति दी गई है, कॉर्पोरेट्स को कृषि क्षेत्र में प्रवेश से रोका जाए और न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी दी जाए। दूसरी मांग थी कि अनुबंध खेती की अनुमति देने वाले कानून को निरस्त करना। तीसरी मांग थी आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करने वाले कानून को निरस्त करना और कृषि उपज की जमाखोरी को अपराध से मुक्त करना। चौथा मांग थी विद्युत अध्यादेश 2020 में प्रस्तावित संशोधनों को वापस लेना, जो बिजली सब्सिडी को समाप्त करता और उन्हें नकद सब्सिडी के साथ बदल देगा। पांचवीं मांग थी पेट्रोल और डीजल की कीमत को अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के अनुसार तय करते हुए ईंधन पर करों को समाप्त करना। छठीं मांग थी पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण पर आए अध्यादेश 2020 को निरस्त करना जिसमें पराली जलाने को अपराध माना गया है। सातवीं मांग थी राज्यों के अधिकार क्षेत्र में संघ के विधायी अतिक्रमण को रोकना क्योंकि कृषि एक राज्य का विषय है न कि केंद्र का। और आखिरी और आठवीं मांग थी भीमा कोरेगांव मामले में और सीएए विरोध के लिए जेल में बंद लोगों को बिना शर्त रिहा करना।

पिछले साल 30 दिसंबर को मोदी सरकार ने किसानों की चौथी मांग जो बिजली अध्यादेश से जुड़ी थी और छठी मांग जो पराली जलाने को अपराध ठहराती थी, उसे मान लिया और किसानों को पराली जलाने से होने वाले जुर्माने से छूट दे दी।

इस साल 12 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानून लागू करने पर रोक लगा दी। इसमें पहली तीन मांगों को शामिल किया गया। इसके बाद कोर्ट ने चार सदस्यों की एक कमेटी बना दी और कहा कि वे किसानों से और सरकार से बात करके अपनी सिफारिशें देंगे। कमेटी के एक सदस्य भूपिंदर सिंह मान ने यह कहते हुए खुद को कमेटी से अलग कर लिया था कि वे किसानों के साथ हैं। बाकी जो तीन सदस्य बचे उनमें से दो ऐसे कृषि अर्थशास्त्री हैं जो सरकार के पक्ष में खुलकर लिखते रहे हैं। किसान यूनियनों ने समिति के सदस्यों से मिलने से इनकार कर दिया और समिति ने 6 महीने पहले मार्च में अपनी सिफारिशें कोर्ट को एक बंद लिफाफे में दे दीं।

अभी कुछ महीने पहले, 4 जुलाई को, उपभोक्ता मामलों के मंत्री पीयूष गोयल ने भंडारण की सीमा तयकर दी। इसमें होलसेल में सीमा 200 टन और रिटेल यानी खुदरा में 5 टन की सीमा तय कर दी गई। यह सीमा सिवाए मूंग के बाकी दालों पर लागू नहीं होगी। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि दालों के दाम तेजी से ऊपर जा रहे थे। लेकिन भंडारण की सीमा तय करने से साफ हो गया कि सरकार खुद भी आवश्यक वस्तु अधिनियम को खत्म करने खिलाफ है।


पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति के सदस्यों ने इस बात पर निराशा जाहिर की कि उनकी रिपोर्ट अभी तक सीलबंद लिफाफे में ही पड़ी हुई है। समिति के सदस्य ने कहा कि सरकार और कोर्ट दोनों को कानून व्यवस्था की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए क्योंकि अगर रिपोर्ट रिलीज हो गई तो स्थितियां ऐसी हो सकती हैं। मानाजा रहा है कि कमेटी ने कृषि कानून रद्द करने की बात नहीं कही है, लेकिन समिति के सदस्य अनिल घनावत के मुताबिक इन कानूनों में बहुत सारी खामियां हैं जिन्हें दूर किया जाना चाहिए।

तो कुल मिकालकर उन मांगों की स्थिति यह जिनके लिए किसान अभी तक आंदोलन कर रहे हैं। इनकी कुछ मांगे पहले ही पूरी हो चुकी हैं, कुछ पर रोक लगा दी गई है और एक मामले में सरकार ने बिना कानून रद्द किए ही उस कानून को रद्द न करने का संकेत दे दिया है। इसी साल सरकार ने कहा था कि वह इन कृषि कानूनों को 18 महीने के लिए लागू न करने पर विचार कर सकती है। ऐसे में सवाल है कि आखिर सरकार ने ऐसा किया क्यों नहीं। और अगर कानून लागू ही नहीं करने हैं तो फिर इन्हें रद्द ही क्यों न कर दिया जाए। ये कानून पिछले साल जून में अध्यादेश के जरिए लाए गए और उन्हें आत्मनिर्भर भारत पैकेज का हिस्सा बताकर पास कर दिया गया। इन्हें पास करने के लिए राज्यसभा में बिना मतदान के मंजूर कर दिया गया, जिसके बाद विश्व का अब तक का सबसे लंबा चलने वाला जनांदोलन और विरोध शुरु हुआ।

किसान आंदोलन में अब तक करीब 600 किसानों की मौत हो चुकी है। ऐसा कोई समूह नहीं है जो कानूनों को लागू करने की मांग कर रहा हो, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। कानून को लागू करने के लिए सरकार पर कोई दबाव भी नहीं है। सरकार ने तो महज इन कानूनों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है और किसान आंदोलन की इस उम्मीद में अनदेखी कर रही है कि किसान थक कर और निराश होकर अपने आप आंदोलन तोड़ देंगे। हालांकि ऐसा होता नहीं दिख रहा है और इसी बीच भारत बंद का आह्वान किया गया है।

ऐसे में आखिर सरकार क्यों आंदोलन को चलने दे रही है, बजाए इसके कि वह कानूनों को रद्द कर दे? इसका जवाब तो यही हो सकता है कि यह सिर्फ 56 इंच छाती की मजबूती दिखाने के लिए किया जा रहा है। उम्मीद करें कि यह कारण न हो,क्योंकि ऐसा कहना देश के नेतृत्व के बारे में अच्छा कहना नहीं होगा। लेकिन और क्या क्या कह सकते हैं, यह भी तो मुश्किल है।

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