मृणाल पाण्डे का लेखः कोरोना संकट और विभाजनकारी रेखाओं से बंटा राज-समाज

कोरोना से लड़ने के नाम पर हम जिस तरह अपरिपक्व बच्चों की तरह तमाम बेसिरपैर के अवैज्ञानिक टोटकों के लिए हुमक रहे हैं, उससे साफ है कि अधिकांश भारत को लोकतंत्र रास नहीं आता। उसे 2020 में भी एक माई-बाप सरकार ही चाहिए जो बच्चे के रोने पर चुसनी या झुनझुना थमा दे।

रेखाचित्रः अतुल वर्धन
रेखाचित्रः अतुल वर्धन
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मृणाल पाण्डे

महामारी विशेषज्ञों के बीच एक कहावत है, अगर तुमने एक महामारी देखी है, तो तुमने बस एक ही महामारी देखी है। सीधा मतलब यह कि हर नई महामारी अपने साथ आक्रामकता और संकरण के नए अंदाज़ ले कर आती है। लिहाजा एक महामारी से गुजरने के बाद विशेषज्ञों के लिए महज उस अनुभव के उजास में नई महामारी के बारे में किसी फैसले पर पहुंच पाना और उसका स्थायी निदान तुरंत खोज लेना असंभव होता है।

कोरोना की महामारी भी अपवाद नहीं। इतिहासज्ञ बारबारा तुशमन ने 14वीं सदी के यूरोप में प्लेग की महामारी की बाबत लिखा है कि महामारी से जूझने की क्षमता और उपचार के तरीके अंतत: हर देश के तत्कालीन राज-समाज से जुड़े हुए होते हैं। इसलिए नई महामारी से जूझते हुए यह बात याद रखनी चाहिए कि इलाज की सफलता इस पर निर्भर करती है कि देश की राजनीतिक परंपरा और आर्थिक प्राथमिकताओं ने वहां किस तरह का समाज गढ़ रखा है।

19वीं सदी तक दुनिया में उपनिवेशवादी फैलाव के कारण यूरोप का एशियाई देशों से गहरा नाता बन गया था। इसलिए वहां के संक्रामक रोग जब यूरोप में भी आने लगे तो सब अचकचा गए। उस समय के जर्मनी में जब व्यापारिक केंद्र हैमबर्ग नगर से दो महामारियां- तपेदिक और चेचक, फैलीं तो मशहूर रोग विशेषज्ञ डॉ. राबर्ट कोच उनके स्रोत जानने के लिए भारत और मिस्र गए।

वापस लौटकर उन जानकारियों में उन्होंने अन्य वैज्ञानिकों के साथ जर्मनी के संक्रमित शहरों के जल-मल व्ययन और सामाजिक आदान-प्रदान सहित वहां के अमीर-गरीब इलाकों में अलग-अलग तरह के रहन-सहन पर कई जानकारियां जोड़ीं। इसके बाद वह उनके निरोधक टीके ईजाद कर सके और शहरी प्रशासन ने उनकी दीर्घकालिक रोकथाम के उपाय खोजे थे।

डॉ. कोच की वापसी से कुछ ही पहले जर्मनी के अन्य शहर अलटोना में अन्य एशियाई महामारी हैजा भी फैल गया था। हैमबर्ग के रसायनविद् और साफ-सफाई विशेषज्ञ वैज्ञानिक मैक्स पैटेनकोफर के हिसाब से इस संक्रमण के मूल स्रोत थे शहरों के जलस्रोत, हैंडपंपों से पीने के पानी का प्रदूषण और गरीब इलाकों की गंदी नालियां जिनकी सफाई सारे शहर में गरीब मजदूर हाथ से करते थे। उनके घरों में काम करने वाले सदस्यों से यह अमीर घरों तक जा पहुंचा।

तब यह खुलासा हुआ कि स्थानीय प्रशासन लंबे समय से शहरों की जल-मल व्ययन व्यवस्था पर वाजिब खर्चे में कंजूसी करता आया था और गरीबों की बस्तियों में हाथों से चलाए जाने वाले हैंडपंपों के हत्थे कभी भी कीटाणुरहित बनाने की कोशिश नहीं की गई थी। सारे वैज्ञानिकों के समवेत विचार करने से निष्कर्ष यह निकला कि अगर शहरों के रहन-सहन का काम केंद्रीकृत बाबूशाही को सौंप दिया जाता है, तो वे अपनी धंधई प्राथमिकताओं के दबाव और बड़े नेताओं- व्यापारियों को खुश रखने के लिए हमेशा शस्त्रास्त्रों और सरकारी भवन निर्माण और उसके बाद अमीर बस्तियों के ऊपरी सौंदर्यीकरण को ही तरजीह देंगे। यह सचाई आज भारत पर भी लागू होती है।

बीसवीं सदी समाप्त होते-होते अमीर मुल्कों ने जरूरी माल के उत्पादन का जलवायु प्रदूषक काम पहले चीन या कोरिया सरीखे कठोर शासकों वाले देशों को सौंप दिया, जहां से चाबुक की मदद से सस्ते मजदूरों की मदद से उनका माल बहुत सस्ते में बनवाया जा सकता था। उसी समय नवशिक्षित युवाओं से भरा भारत आईटी का नया हब बना, कॉल सेंटर खुले और बस मध्यवर्गीय युवाओं के सपनों को पंख लग गए। जब माल का आयात-निर्यात बढ़ा तो सेवा क्षेत्र में थाइलैंड और वियतनाम की नकल में पर्यटन को नई कामधेनु बनाया गया। घरेलू विदेशी पर्यटन बढ़ा तो नए राजमार्ग होटल, पब और बार खुले। जिसका गहरा असर हिमालयीन क्षेत्र से सुदूर केरल के तट तक कुदरती संसाधनों और सामाजिक आचरण पर पड़ा।

पिछले दशक से विकासशील देशों के अनुभवी स्वास्थ्य विशेषज्ञ हमको चेता रहे थे कि ग्लोबलाइजेशन से माल का उत्पादन और उपभोग और पर्यटन भले बढ़ा हो, हमारा अपना मध्यवर्ग कितना ही शाहखर्च बना हो, लेकिन इससे कई तरह के नए संक्रामक विषाणु पनप रहे हैं। देशीय सीमाओं को लांघ कर वे कभी भी तेजी से सारी दुनिया में फैल सकते हैं। बेकाबू कोरोना महामारी वही फल है जिसका पहली महामारियों की तरह पुराने तरीकों से सिर्फ ब्लीच डाल कर या छिड़काव से हल नहीं होगा।

20वीं सदी तक माइक्रो बायलॉजी ने पुराने रोगों के निरोध की राह बनाई थी। आज विज्ञान की तरक्की से किसी नए बैक्टीरिया की सारी जन्मकुंडली मिनटों में बना ली जाती है, पर इसके उपचार का एक जैसा मॉडल बनाना असंभव है। इन नए वायरसों के अब अनगिनत कुल-गोत्र हैं और वे कब किस तरह से फैलेंगे अभी इसकी भविष्यवाणी करना असंभव है।

जब चीन के वुहान में दावानल भड़का हुआ था, तब भी जनवरी से अब तक लाखों भारतीय और अभारतीय हवाई या जमीनी मार्गों से चीन या चीन से जुड़े देशों से आए गए। उनकी कोई जांच नहीं हुई। पहले पहल जयपुर में तेजी से फैलने वाला यह नया वायरस विदेशी पर्यटकों की मार्फत पहुंचा। और जहां-जहां धर्म या सामाजिक परंपरा के तहत जमावड़े हुए उनसे यह भड़का। भारत में तबलीग के हजारों लोगों की बैठक से, एक हिंदू परिवार के मृत्यु भोज में 1200 लोगों के जाने से लाखों लोग तुरंत संक्रमित हुए।

कुल मिलाकर इस अनुभव के बाद सामाजिकता के तौर-तरीकों में सारी दुनिया को बदलाव करना होगा। पर यह आसान नहीं। मनुष्य एक सामाजिक जीव है और परिवार या मित्रों से स्काइप या वीडियो कांफ्रेंसिंग कभी भी सहज मिल-बैठकर विमर्श करने का पर्याय नहीं बन सकते। यह भी कोई राज नहीं कि हमारे देश में दो समांतर देश हैं। हमारा सुविधा संपन्न मध्यवर्ग चिड़चिड़ाते हुए भी अपने घर से कंप्यूटर की मार्फत दफ्तरी काम निपटा सकता है, उनके बच्चे एप से शिक्षकों से संपर्क बना सकते हैं और उनकी घरवालियां ऑनलाइन आर्डर देकर जरूरी सामग्री मंगवा सकती हैं।

शिक्षा और कार्यक्षेत्र का जो उद्दे्श्य समाज के वर्गों को साथ लाना और उनके सोच तथा जीवन शैलियों की बाबत जानना होता था, वह हम कब का पीछे छोड़ आए हैं। इसलिए तालाबंदी से गरीबों और उनके बच्चों पर उनकी शिक्षा-दीक्षा पर लंबे समय तक बहुत घातक असर पड़ेंगे। पहले ही हमारा राज-समाज विभाजनकारी रेखाओं से विभाजित है। कोरोना ने दरारें और बढ़ाकर मानो किसी समुद्र के आरपार दो द्वीप रच लिए हैं: एक वह जहां घर भीतर चिड़चिड़ाते लोग जो जीवन की बुनियादी सुख सुविधाओं से संपन्न हैं, राजनेता के आह्वान पर पुलकित होकर हर एक-दो हफ्ते में बालकनी से थाली-ताली बजाते, दीए जलाते दिख जाते हैं।

पर शेष देश उनकी और उनके नेताओं की आंखों से गायब है, जहां भूख से गरीबों के मरने, अनाज मंडियों की तालाबंदी से बेतरह चिंतित हताश किसानों और हस्पताली सुविधा के अभाव में मरते बच्चे और बीमारों की खबरें हैं। हमारे शीर्ष नेता राजनीतिक सामाजिक विभाजन के लाभ पहचान चुके हैं। इसलिए अगर 2014 में भ्रष्टाचार उन्मूलन और 2019 में सीमा सुरक्षा के नारों से वोटरों को जाति, धर्म, वर्ग के भेदभाव भुलाकर सफलता से सत्तावानों के पक्ष में एकजुट किया गया तो आज नकारात्मकता त्याग कर कोविड-19 के खिलाफ थाली-ताली पीट कर, दीए जलाकर लड़ने को कहा जा रहा है।

जबकि बहुत बड़ी तादाद में जरूरी रक्षक उपकरणों के अभाव में हमारे स्वास्थ्यकर्मी संक्रमण के शिकार हो रहे हैं और अमेरिका भारत से कई स्वास्थ्य रक्षक दवाएं धमकी देकर छीन रहा है। जनता को इसकी खबर कौन दे? मीडिया से कहा जा चुका है कि वह महामारी की बाबत सिर्फ सरकारी स्रोतों से ही रोज़ाना की खबरें ले और दे, वरना नतीजे भुगते। विदेशी मीडिया जो यह खबरें दे रहा है उसे भारत का दुशमन और हमारी सफलता (?) से कुढ़ने वाला बताया जा रहा है।

वैज्ञानिक सही कहते हैं कि महामारी से कोई देश किस तरह निबटता है यह उसके मौजूदा राज-समाज का आईना होता है। शासन के हकु्म पर कोविड से लड़ने के नाम पर हम जिस तरह अपरिपक्व बच्चों की तरह तमाम बेसिर-पैर के अवैज्ञानिक टोटकों के लिए हमक रहे हैं, उससे जाहिर है कि अधिकांश भारत को लोकतंत्र रास नहीं आता। उसे 2020 में भी एक माई-बाप सरकार ही चाहिए जो बच्चे के रोने पर चुसनी या झुनझुना थमा दे।

एक स्वस्थ लोकतंत्र में वयस्क जनता खुद की चुनी सरकार का माई-बाप होती है। उस सरकार को क्या दूर से दर्शन देकर लक्ष्मण रेखा और जीवन के कुछ सप्ताह समर्पित करवाने की मांग की बजाय देश को ठप्प और अर्थ जगत को तबाह करने वाली इस महामारी की रोकथाम के ठोस प्रबंधन और खर्चे पानी का पारदर्शी हिसाब नहीं देना चाहिए? कांग्रेस कितनी ही बुरी थी, पर उसके कुशासन के बीच वे लोकतांत्रिक संस्थान, योजना आयोग, बड़े सार्वजनिक चिकित्सा शोध संस्थान और मेडिकल कॉलेज बने जिनका लाभ देश का सामान्य जन आज भी उठा रहा है।

सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और चिदंबरम को जितना कोसें, पर ईमान से कहिए वे आपके-हमारे ही जीवनकाल में देश मनरेगा और तमाम तरह के आर्थिक समझौतों, सुधारों से क्या बेहतर नहीं चलाते रहे? कभी-कभार इस महामारी के बहाने हमारी 2014 से पहले की राष्ट्रीय उत्पाद दर, आर्थिक संस्थानों तथा सरकार को सलाह देने वाले विश्वस्तरीय वैज्ञानिकों, आर्थिक विशेषज्ञों की सक्षम सेना पर भी ईमानदारी से सोचिए।

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