`पीएम केयर में आखिर ऐसा क्या है बेसबब, जिसकी पर्दादारी है...

`कोरोना संकट में लोगों को राहत देने के लिए स्थापित पीएम केयर फंड से पहली बार किसी मद में एक रकम दी गई है। लेकिन इस फंड लेकर उठ रहे सवाल अब भी वांछित हैं कि आखिर इस फंड में क्या है ऐसा बेसबब जिसकी पर्दादारी है

फोटो: सोशल मीडिया
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नैसर्गिक न्याय का मूलभूत सिद्धान्त है, "न्याय न सिर्फ होना चाहिए अपितु न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए।" कहते हैं न्याय की देवी ने अपनी आँखों पर इसलिए पट्टी बांध रखी है क्योंकि उन्हें विश्वास है कि शासन तंत्र की आँखे खुली है। न्यायतंत्र की आँखे खुली है। आज सम्पूर्ण विश्व कोरोना वायरस नामक वैश्विक महामारी का सामना कर रहा है। मानवता अपने अस्तित्व के रक्षार्थ संघर्षरत है। भारतीय गणतंत्र की स्वर्ण जयंती के अवसर पर तत्कालीन सरकार द्वारा न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एम. एन. वेंकटचलैया की अध्यक्षता में वर्ष 2000 में गठित 10 सदस्यीय संविधान समीक्षा आयोग पर टिप्पणी करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. के. आर. नारायणन ने कहा था, 'यह गंभीर विमर्श का विषय है कि विगत आधी शताब्दी में संविधान ने हमें असफल किया है या फिर स्वयं हमने संविधान को असफल किया है!' उक्त प्रसंग के 20 वर्ष बाद 2020 में तथाकथित 20 लाख करोड़ रुपये के कोरोना राहत पैकेज की घोषणा के उपरांत भी यक्ष प्रश्न आज भी कायम है। विचारणीय प्रश्न है : 'किसने असफल किया है भारत माता के श्रमवीरों को, अन्नदाताओं को, अंतिम आदमी को?'

बहरहाल, आज का विषय शासन की जिम्मेदारी, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, नैतिकता एवं लोक आस्था से जुड़ा हुआ है। 28 मार्च 2020 को भारत सरकार ने पीएम केयर्स फंड नाम से एक नए ट्रस्ट का गठन किया है। प्रधानमंत्री इस ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं जबकि रक्षा, गृह एवं वित्त मंत्री ट्रस्टी बनाए गए हैं। इस ट्रस्ट में कोई भी व्यक्ति, संस्था, सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्था, लोक उपक्रम इत्यादि आर्थिक रूप से अपना योगदान कर सकता है। योगदान की न्यूनतम राशि 10 रुपये निर्धारित है। अर्थात यह ट्रस्ट पूर्णतया जनता एवं संस्थाओं से प्राप्त राशि पर आधारित है।

सरकार द्वारा घोषणा की गई है कि 30 जून 2020 से पहले इस कोष में योगदान देने वालों को आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80 G के तहत आयकर में छूट प्रदान की जाएगी। पीएम केयर्स फंड के गठन का उद्देश्य बतलाया गया है: 'इस कोष में प्राप्त राशि का उपयोग कोरोना वायरस एवं भविष्य में आशंकित महामारी से रक्षा, बचाव एवं राहत प्रदान करने में किया जाएगा।'

चूंकि पीएम केयर्स फण्ड एक राष्ट्रीय निधि है एवं भारत सरकार द्वारा लगातार सार्वजनिक संचार माध्यमों के द्वारा लोगों से योगदान की अपील की जा रही है। ऐसे में राष्ट्रहित के उद्देश्य से स्वभावतः कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं: इस प्रकार के अलग ट्रस्ट की आवश्यकता क्यों पड़ी ! किन प्रावधानों एवं परिस्थितियों के मद्देनजर नागरिक समाज अथवा विपक्ष के किसी व्यक्ति को ट्रस्टी नियुक्त नहीं किया गया है !

विडम्बना है कि जिस भारतीय रेल मंत्रालय ने इस कोष में 151 करोड़ रुपये का अंशदान किया है वही रेलवे अपने देश के अंतिम जन, गरीब-गुरबों को उन्हें उनके गंतव्य तक ससम्मान पहुँचाने में असमर्थ साबित हो रहा है। विपदा की इस घड़ी में स्पेशल चार्ज सहित मोटी रकम वसूल रहा है।

ध्यान रहे कि प्राकृतिक एवं मानवजनित दोनों प्रकार की आपदाओं से निबटने के लिए देश में पहले से ही 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय आपदा कोष' है, जिसका गठन प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा जनवरी 1948 में किया गया था। प्रधानमंत्री इस कोष का पदेन अध्यक्ष होते हैं। सरकार का एक संयुक्त सचिव प्रधानमंत्री की निगरानी में इस कोष का कामकाज देखते हैं। इस कोष के अंतर्गत संग्रहित तमाम राशि अनुसूचित व्यवसायिक बैंकों में जमा की जाती है। इस कोष के द्वारा लाभार्थियों का चयन, परीक्षण, मूल्यांकन प्रधानमंत्री करते हैं।

यह भी ध्यान रहे कि भारत सरकार को समस्त स्रोतों से प्राप्त राशि के रख-रखाव हेतु भारत के संविधान के भाग 12 के अंतर्गत तीन प्रकार की निधि (कोष) की व्यवस्था की गई है। केंद्रीय विधायिका यानी संसद के अनुमोदन के बाद कार्यपालिका द्वारा इस राशि का व्यय किया जाता है। ये तीन निधि हैं -

1. संचित निधि ; अनुच्छेद 266 (1) : कर एवं गैर-कर से प्राप्त राजस्व।

2. लोक लेखा निधि; अनुच्छेद 266 (2) : संचित निधि के अलावा समस्त सार्वजनिक राशि।

3. आकस्मिक निधि; अनुच्छेद 267 (1) : 500 करोड़ रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट राशि।

पीएम केयर्स फंड को लेकर आशंका प्रकट होने का सबसे प्रबल आधार यह है कि भारत सरकार द्वारा इस कोष का अंकेक्षण यानी ऑडिट भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से कराए जाने से इंकार किया गया है। यह निर्णय 'सूचना का अधिकार' कानून के युग में अत्यंत ही अपारदर्शी एवं हास्यास्पद प्रतीत हो रहा है। आखिर सरकार क्यों गाहे-बगाहे औपनिवेशिक ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट,1923 को बढ़ावा देने पर तुली है! विडम्बना तो यह है कि वित्त मंत्रालय के अंतर्गत राजस्व विभाग द्वारा अपने सभी कर्मचारियों को कहा गया है कि वे आगामी मार्च 2021 तक प्रति महीने अपने 1 दिन का वेतन स्वेच्छापूर्वक पी एम. केयर्स फण्ड में जमा कराने की संतुति प्रदान करें। साथ ही ऐसा करने से अनिच्छुक कर्मियों से लिखित आवेदन आमंत्रित किया गया है। क्या ऐसा किया जाना किसी भी दृष्टिकोण से प्रजातांत्रिक कहा जा सकता है !

इस बीच भूपेश बघेल के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की काँग्रेस सरकार द्वारा कोरोना काल के अभी तक के लगभग डेढ़ महीने ( 24 मार्च- 7 मई, 2020) की अवधि में 'मुख्यमंत्री राहत कोष' में प्राप्त कुल 56 करोड़ 4 लाख 38 हज़ार 815 रुपये की राशि का बिंदुवार ब्यौरा सार्वजनिक करके एक नजीर पेश की गई है। आगामी समय में यह कदम प्रशासनिक दक्षता का प्रतिमान साबित हो सकता है। अब प्रश्न है कि यही काम भारत सरकार क्यों नहीं कर सकती !

ग्रामीण पत्रकारिता के पुरोधा रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार पी साईंनाथ ने अपनी किताब 'तीसरी फसल' (Every one loves a good drought) में स्पष्ट वर्णित किया है कि खरीफ और रबी फसल के साथ-साथ अपने देश में प्राकृतिक आपदाएं - बाढ़, सुखाड़, चक्रवात, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि आदि - नामक एक तीसरी फसल भी पुष्पित, पल्लवित होती है। जिसका इंतजार सत्ता प्रतिष्ठान पर बैठे हुक्मरान से लेकर नीचे की कड़ी तक मौजूद नियंताओं को होता है। ऐसे में अपनी टीम इंडिया में विश्वास बहाली के उद्देश्य से प्रधानमंत्री द्वारा तत्काल प्रभाव से पीएम केयर्स फंड में पारदर्शिता स्थापित करने का आदेश दिया जाना चाहिए। जिससे कि भविष्य में सभी प्रकार के विकास कार्यों में सामाजिक अंकेक्षण का मार्ग प्रशस्त हो सके।

ग्राम-पंचायत के प्रधान से लेकर भारत के प्रधान तक के इक़बाल को बुलंद करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री का प्रत्येक निर्णय सीसा की तरह पारदर्शी होना चाहिए। प्रधानमंत्री स्वयं कहा करते हैं, जनता-जनार्दन अपने प्रधान सेवक से पाई-पाई का हिसाब लेने का अधिकारी है। विनीत नारायण बनाम भारत संघ वाद में 18 दिसंबर 1997 के अपने ऐतिहासिक निर्णय में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस वर्मा की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने स्पष्ट कहा था कि सार्वजनिक पदों पर विद्यमान लोगों को अक्षत ईमानदार होना चाहिए। उनकी निष्ठा सुई की नोंक बराबर भी संदिग्ध नहीं होनी चाहिए। ना संदिग्ध दिखनी चाहिए।

इस प्रकार, ब्रिटिश विधिवेत्ता ए वी डायसी द्वारा प्रदत्त 'विधि के नियम' - "आप कितने भी बड़े क्यों न हो, विधि सदैव आपसे बड़ा होता है। अपितु विधि शासकों का शासक है" - की भावना को अंगीकार करते हुए पी. एम. केयर्स फण्ड का विधिसम्मत परीक्षण किया जाना चाहिए।

(ये लेखक के विचार हैं। लेखक अमरीश रंजन पाण्डेय, इंडियन यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और मीडिया प्रभारी और सह प्रवक्ता हैं तथा रौशन शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग में शोधार्थी हैं। नवजीवन का इनके विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है)

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