राम पुनियानी का लेखः कोरोना संकट से हांफता देश और आस्था-राजनीति के नाम पर सार्वजनिक स्वास्थ्य का उड़ता मखौल

इस समय चिकित्सक और वैज्ञानिक समुदाय कोरोना के इलाज की खोज में लगे हैं। हमें उम्मीद है कि उन्हें सफलता मिलेगी। हमें यह भी उम्मीद है कि राजनैतिक और धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजक भीड़ जुटाने से बाज आएंगे और श्रद्धा के सौदागर बेसिरपैर के दावे करने बचेंगे।

फोटोः विपिन
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राम पुनियानी

कोविड-19 की दूसरी और कहीं अधिक खतरनाक लहर पूरे देश में छा चुकी है। जहां मरीज और उनके परिजन बिस्तरों, ऑक्सीजन और आवश्यक दवाओं की कमी से जूझ रहे हैं, वहीं कोविड योद्धा इस कठिन समय में समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। लोगों की भोजन और अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आईं हैं। इस महामारी ने एक ओर मानवता का चेहरा हमारे सामने लाया है, वहीं हमारे शासकों के कई निर्णय काफी चौंकाने वाले हैं।

पांच राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल में विशाल रैलीयां आयोजित की गईं। चुनाव आयोग ने बंगाल में चुनाव आठ चरणों में करवाने का निर्णय क्यों लिया, यह तो वही जाने, परन्तु इसमें कोई शक नहीं कि महामारी के बीच यह चुनाव काफी कष्टकारी सिद्ध हुआ है। कोरोना के ग्राफ के खतरनाक ढंग से बढ़ना शुरू करने के बाद राहुल गांधी ने बंगाल में रैलीयां न करने का फैसला लिया, ताकि इनमें जुटने वाली भीड़ रोग के फैलाव में सहायक न बने। इसकी प्रतिक्रिया में बीजेपी के अमित शाह ने कहा कि रैलीयों का कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ रहा है और यह इससे स्पष्ट है कि बंगाल में कोरोना मरीजों की संख्या महाराष्ट्र से कम है।

यह अजीब सा तर्क है। हम सब जानते हैं कि भीड़ से यह बीमारी और फैलती है। अमित शाह ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी ने लाखों मास्क वितरित किये हैं। परन्तु रैलीयों के वीडियो और चित्रों में कोई मास्क पहने नहीं दिखता। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का मखौल है। यह संतोष का विषय है कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस, सरकार को रचनात्मक सुझाव दे रही है, जैसा कि डॉ मनमोहन सिंह द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे पत्र से साफ है।

इसके साथ ही हमारे देश का सबसे बड़ा धार्मिक समागम कुम्भ उत्तराखंड में जोरशोर से चल रहा है। कुंभ लोगों की धार्मिक आस्था का प्रकटीकरण है, जहां जीवनदायिनी नदियां और श्रद्धालु आध्यामिक दृष्टि से एक हो जाते हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कुंभ में बड़ी संख्या में लोगों के भाग लेने को प्रोत्साहित किया। उनका मानना था कि मां गंगा देश को कोरोना से मुक्त कर देंगी।

लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। लाखों लोगों ने बिना मास्क और शरीर पर कम से कम कपड़ों के साथ नदी में डुबकियां लगाईं। दो शाही स्नान भी हुए। नतीजे में वहां कोरोना तेजी से फैलने लगा। अनेक साधुओं में इस रोग के लक्षण उभरने लगे। निर्वाणी अखाड़ा के प्रमुख कपिल देव दास (65) की कोरोना से मौत हो गयी। इसके बाद निरंजनी अखाड़े ने मेला छोड़ देने का निर्णय लिया। अखाड़े के प्रवक्ता ने कहा, "हरिद्वार में हमारे डेरे में अखाड़े के कई सदस्यों में कोविड-19 के लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं।"

इसके बाद प्रधानमंत्री, जो पूरे देश और विशेषकर पश्चिमम बंगाल में रैलीयां करते घूम रहे थे, ने कुंभ को प्रतीकात्मक बनाने की अपील की। उन्होंने काफी देर कर दी। वे तब बोले जब कुंभ में भाग लेने वालों में से कई कोरोना से ग्रस्त हो चुके थे। ये लोग अब इस वायरस को अपने-अपने शहरों में ले जाएंगे।

मीडिया ने भी इस संभावित त्रासदी को रोकने के लिए कुछ नहीं किया। अगले कुछ हफ़्तों में हमें पता चलेगा कि चुनाव और कुंभ मेले के कारण कोरोना के फैलाव पर क्या प्रभाव पड़ा। इनके दुष्प्रभावों को कम करके बताने के प्रयास हो रहे हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का कहना है कि कुंभ और तबलीगी जमात के मरकज़ की तुलना नहीं हो सकती। उनके अनुसार, तबलीगी जमात का कार्यक्रम बंद कमरों में हुआ था, जबकि कुंभ खुले में हो रहा है, इसलिए उससे नुकसान नहीं होगा। यह पूर्णतः सम्प्रदायवादी सोच है, जिसका तार्किकता से कोई लेना-देना नहीं है। कोरोना संक्रमित व्यक्ति के मुंह से निकलने वाली लार की बूंदों से फैलता है और ये बूंदें खुली जगह में भी वही काम करती हैं जो बंद जगह में।

हम सबको याद है कि तबलीगी जमात के कार्यक्रम में भाग लेने वालों के साथ कैसा व्यवहार किया गया था। वह भी तब जब उन्हें इस बीमारी के बारे में अधिक पता नहीं था, क्योंकि तब इस महामारी का प्रसार शुरू ही हुआ था। मरकज़ के आयोजन की योजना काफी पहले बनी थी और मार्च 2020 में सरकार की अनुमति से लोग इकठ्ठा हुए थे। सरकार और फिर मीडिया ने मरकज़ निजामुद्दीन में 13 से 15 मार्च तक आयोजित तबलीगी जमात के कार्यक्रम को कोरोना के प्रसार के लिए दोषी ठहराया।

निश्चित रूप से इसके आयोजन में कुछ गलतियां रही होंगी। वैसे भी, महामारी के समय बड़ा कार्यक्रम आयोजित करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। कई तबलीगियों को गिरफ्तार किया गया। उन्हें दोषमुक्त घोषित करते हुए, अदालतों ने कम से कम दो निर्णयों में कहा कि पुलिस ने उन्हें बलि का बकरा बनाया। तबलीगी मामले में जो कुछ हुआ वह हमारे समाज के साम्प्रदायिकीकरण का प्रमाण है।

गोदी मीडिया इस आयोजन पर टूट पड़ा। बात कोरोना जिहाद और कोरोना बम तक गयी। हमारा सांप्रदायिक मीडिया किस हद तक गिर सकता है, इसका प्रमाण यह है कि उसके जहरीले प्रचार के चलते कई हाउसिंग सोसाइटीज में मुसलमानों का प्रवेश बंद कर दिया गया और सब्जी बेचने वाले गरीब मुसलमानों का बहिष्कार किया गया। क्योंकि वे तथाकथित रूप से कोरोना फैला रहे थे। मीडिया का वह रुख, पूर्वाग्रहों के पेशेवराना कर्तव्यों पर हावी हो जाने का यह एक अच्छा उदाहरण है।

महामारी से पैदा मुसीबतों को और बढ़ा रहे हैं अर्धशिक्षित बाबा। योग व्यापारी बाबा रामदेव ने दावा किया कि उन्होंने कोरोना की दवाई खोज निकाली है। उन्होंने वैज्ञानिक शोध की भाषा के कुछ शब्दों का इस्तेमाल करते हुए यह दावा भी किया कि उनकी दवा को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता मिल गई है। यह अच्छा है कि उन्होंने जल्दी ही अपना दावा वापस ले लिया और अपने आप को शर्मिंदगी से बचा लिया।

इस समय चिकित्सक और वैज्ञानिक समुदाय, कोरोना के इलाज की खोज में लगा है। हमें उम्मीद है कि उन्हें सफलता मिलेगी। हमें यह भी उम्मीद है कि राजनैतिक और धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजक भीड़ जुटाने से बाज आएंगे और श्रद्धा के सौदागर बेसिरपैर दावे करने बचेंगे।

(लेख का अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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