राम पुनियानी का लेखः गाय-गोमांस की राजनीति, आखिरकार हम फिर वहीं पहुंच गए
जहां अल्पसंख्यक पीड़ा और अभाव के बीच छटपटा रहे हैं वहीं सांप्रदायिक राजनीति करने वाले नेता माछ-भात और झालमूड़ी का आनंद ले रहे हैं, और साथ ही हिंसक प्रवृत्तियों और खान-पान की आदतों के बीच बेतुका संबंध कायम करने का प्रोपेगेंडा कर रहे हैं।

चुनाव आयोग की चालबाजियों और न्यायपालिका की अनदेखी के चलते बीजेपी, पश्चिम बंगाल में सत्ता पर काबिज होने में कामयाब रही। इससे राज्य के मुस्लिम अल्पसंख्यक जबरदस्त दहशत में हैं। सरकार ने हर जिले में नजरबंदी केन्द्रों का निर्माण प्रारंभ कर दिया है जिनमें बांग्लादेश के कथित घुसपैठियों को रखा जाएगा और अन्य कई बातों के अतिरिक्त, छत्रपति शिवाजी महाराज के एक विशाल स्मारक के निर्माण की बात कही है।
जिस मुद्दे पर राज्य की हिन्दू आबादी अत्यंत बेचैन है वह है गाय-गोमांस के नाम पर मुसलमानों की लिंचिंग का अभियान। ईद नजदीक आने के साथ ही हिन्दू अपने गाय-बैलों को बेचने के लिए बाजार में लेकर पहुंचे किंतु यह देखकर उन्हें बहुत निराशा हुई कि वहां गोवंश का एक भी खरीददार नहीं था। मुसलमानों ने सामूहिक रूप से यह फैसला ले लिया था कि वे ईद पर इन पशुओं की कुर्बानी नहीं देंगे। जमात-ए-इस्लामी-ए-हिन्द के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी से लेकर असादुदीन ओवैसी जैसे राजनीतिज्ञों तक, मुस्लिम समुदाय के ज्यादातर नेताओं ने मांग की है कि गाय को बाघ की जगह राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए।
बाजारों में गोवंश के पशुओं को बेचने आए हिन्दुओं से मुसलमान कह रहे हैं कि ये तुम्हारी मां हैं और इन्हें तुम अपने घर पर रखो। कई गरीब किसान इन जानवरों को ईद के अवसर पर बेचने के लिए पालते हैं ताकि उन्हें इनकी अच्छी कीमत मिल सके और इस आमदनी से उन्हें अपना जीवनयापन करने में सहायता मिले। वे हताश हैं क्योंकि उस आमदनी का इस्तेमाल करने की जो भी योजना उन्होंने बना रखी थी, वह मिट्टी में मिलती नजर आ रही है।
मुस्लिम समुदाय और मुस्लिम संगठनों ने गाय-गोमांस के बहाने बड़े पैमाने पर मुसलमानों की लिंचिंग की घटनाएं देखी हैं, खासतौर से पिछले 12 सालों के दौरान। मोहम्मद अखलाक से लेकर मोहम्मद जुनैद तक, पिछले कुछ सालों में 100 से अधिक लिचिंग की घटनाएं हुई हैं। इंडियास्पेन्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि 2014 से 2018 के बीच गाय से जुड़ी हिंसा में 46 मुसलमान और दलित मारे गए।
हमें याद है कि गुजरात के ऊना में मृत गायों को उनकी खाल उतारने के लिए ले जा रहे चार दलितों को बेरहमी से पीटा गया था। इसके बाद युवा दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने गायों की खरीद-फरोख्त को रोकने का अभियान चलाया और दलितों को भूमि आवंटित किए जाने की मांग की। गौरक्षकों द्वारा बनाया गया यह माहौल, जिसे सत्ताधारियों का संरक्षण और संघ परिवार की वैचारिक सहमति हासिल है, अत्यंत भयावह है। कई आचार्यों ने यह तक कहा कि एक गाय के जीवन का मूल्य कई मनुष्यों के जीवन से ज्यादा है। बाबा रामदेव ने गाय से जुड़े उत्पादों को बढ़ावा दिया और गौमूत्र तक बेचकर अच्छी-खासी रकम कमाई। संबित पात्रा, जो बीजेपी के प्रमुख प्रवक्ता हैं, ने दावा किया कि गाय का गोबर हीरे से अधिक मूल्यवान है। उल्लेखनीय है कि वे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं।
गुजरात के एक अन्य प्राध्यापक ने बेजोड़ शोध कर बताया कि गौमूत्र में सोना होता है। सोने की आसमान छूती कीमतों के बीच यह कितनी राहत पहुंचाने वाली बात है! मुस्लिम समुदाय के सामूहिक फैसले पर वापिस आएं, तो इससे पहचान की राजनीति का नतीजा गरीब किसानों को भुगतना पड़ रहा है। देखना होगा कि हिन्दुत्ववादी सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का पवित्र निर्णय लेती है या नहीं। ऐसा होने से बहुत से उन गैर-मुस्लिम व्यापारियों को नुकसान झेलना पड़ेगा जो गोमांस के निर्यात से जुड़े हुए हैं।
गोमांस के प्रमुख निर्यातक हिंदू और जैन समुदायों के अभिजात वर्ग के हैं। अल कबीर एक्सपोर्ट्स प्राईवेट लिमिटेड भारत में मांस और गोमांस के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक हैं। इनका तेलंगाना में बहुत बड़ा बूचड़खाना है। कई सूचनाओं के मुताबिक इस इकाई का मालिक सबरवाल परिवार है। अरेबियन एक्सपोर्ट्स प्राईवेट लिमिटेड बंबई का एक बड़ा मांस निर्यातक है। कई पीढ़ियों से सुनील कपूर परिवार इसका स्वामी भी है और प्रबंधन भी करता आ रहा है। एम. के. आर. फ्रोजन फुड एक्सपोर्ट्स प्राईवेट लिमिटेड, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है, के पंजाब में कई पशुवध गृह हैं। इस कंपनी का प्रबंधन मदन एबोट प्राईवेट लिमिटेड करता है जिसका मुख्यालय चंडीगढ़ में है और इसके मालिकों में अन्यों के अलावा ए. एस. बिन्द्रा परिवार भी है।
इसके अलावा मांसाहार को भी बुरा बताया जा रहा है। हम जानते हैं कि गोवा, उत्तर-पूर्व और केरल में गोमांस का सेवन बड़े पैमाने पर किया जाता है। भारत में लगभग 77 प्रतिशत जनता मांसाहारी है (83.4 प्रतिशत पुरुष और 70.6 प्रतिशत महिलाएं) जो नियमित रूप से मांस, मछली या मुर्गा खाती है। तटीय इलाकों में मछली और अन्य स्थानों पर मुर्गा और मटन आदि खाया जाता है। कई लोगों का दावा है कि ब्राम्हण मांसाहारी नहीं होते। कश्मीरी पंडित मटन के व्यंजनों का सेवन मजे से करते हैं। कश्मीरी व्यंजनों का सरताज रोगन जोश मटन का अत्यंत खुशबूदार व्यंजन है। बिहार में भी मैथिली ब्राम्हण अन्य मांसहारी व्यंजनों के अतिरिक्त खासतौर से मटन का सेवन करते हैं।
जानबूझकर फैलाई जाने वाली इन बातों, जिन्होंने आम धारणाओं का रूप ले लिया है, से सच्चाई बहुत अलग है। ये बातें इसलिए फैलाई जाती हैं ताकि यह कुतर्क दिया जा सके कि मुसलमान मुख्यतः मांसहारी होते हैं और इसी वजह से इतने हिंसक होते हैं। बंगाल में चुनावों के दौरान, जिसमें बीजेपी और ममता बनर्जी के बीच मुख्य मुकाबला था, ममता ने कहा था कि यदि बीजेपी सत्ता में आई तो माछ-भात जो पसंदीदा बंगाली व्यंजन है, मिलना मुश्किल हो जाएगा।
इसके जवाब में ‘गोली मारो‘ वाले नारे के लिए कुख्यात पूर्व केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने माछ-भात खाते हुए अपना वीडियो जारी किया और कहा कि बीजेपी के राज में मांसाहार पर कोई पाबंदी नहीं लगाई जाती। खानपान एक चुनावी मुद्दा बन गया है, यह तब एक बार फिर साबित हुआ जब हमारे नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री ने बंगाल के लोगों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए झालमूड़ी (मुख्यतः चावल से बनने वाला एक स्थानीय नाश्ता) खाया।
हम अपने राजनैतिक अभियानों में इतने नीचे गिर गए हैं कि हम असहाय अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल के उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि सांप्रदायिक राजनीतिज्ञ चुनाव जीतने के लिए कितनी ज्यादा नीचता पर उतारू हो सकते हैं। न केवल चुनाव आयोग बल्कि व्यापक सामाजिक सोच भी बहुत विकृत हो चुकी है। जहां अल्पसंख्यक पीड़ा और अभाव के बीच छटपटा रहे हैं वहीं सांप्रदायिक राजनीति करने वाले नेता माछ-भात और झालमूड़ी का आनंद ले रहे हैं, और साथ ही हिंसक प्रवृत्तियों और खान-पान की आदतों के बीच बेतुका संबंध कायम करने का प्रोपेगेंडा कर रहे हैं। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि मानव जाति के इतिहास में सबसे बड़ा नरसंहार करने वाला एडोल्फ हिटलर अपने जीवन के उत्तरार्ध में शाकाहारी बन गया था।
बड़े पैमाने पर की गई हेराफेरी के माध्यम से हासिल की गई इन चुनावी जीतों के शोरगुल के बीच ये हिन्दुत्ववादी नेता यह भी भूल जाते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका (शेक्सपियर क्लब, पासाडेना, केलीर्फोनिया, यूएसए, 2 फरवरी 1900) में 'बौद्ध भारत‘ विषय पर दिए गए अपने व्याख्यान में कहा था "यदि मैं आपको बताऊं तो आप भौचक्के रह जाएंगे कि प्राचीन परंपराओं के अनुसार वह व्यक्ति एक अच्छा हिंदू नहीं है जो गोमांस का सेवन नहीं करता। कुछ विशिष्ट अवसरों पर उसे बैल की बलि देनी ही चाहिए और उसका सेवन करना चाहिए‘‘ {विवेकानंद, द कम्पलीट वर्क्स ऑफ़ स्वामी विवेकानंद, खंड 3 (कलकत्ताः अद्वैत आश्रम, 1997) पृष्ठ 563}।
इस सबसे बढ़कर, हिन्दू राष्ट्रवाद के जनक, विनायक दामोदर सावरकर ने कहा था कि गाय एक पवित्र पशु नहीं है बल्कि एक उपयोगी पशु है!
(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)
