खरी-खरी: देश बचाने के लिए सीपीएम को कांग्रेस और अन्य दलों के साथ मिलकर हराना होगा बीजेपी की फासीवादी राजनीति को

देश में वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के इस समय में सीरपीएम को कांग्रेस के साथ संबंधों में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। इस समय देश फासीवादी राजनीति का सामना कर रहा है और देश की तमाम लोकतांत्रिक परम्पराओं को खतरे में हैं।

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ज़फ़र आग़ा

भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों का कांग्रेस पार्टी के साथ कभी मुहब्बत तो कभी नफरत का रिश्ता रहा है। कम्युनिस्टों का मानना है कि उनके संगठन देश की जमीनी और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर अपनी राजनीतिक लाइनें तय करते हैं। इसी नीति के परिप्रेक्ष्य में अभी अक्तूबर के आखिरी हफ्ते में दिल्ली में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की बैठक में कांग्रेस के साथ संबंधों को लेकर एक बार फिर पार्टी का वही कांग्रेस से प्रेम और घृणा के संबंध की समस्या उभरकर सामने आ गई। समाचार पत्रों के अनुसार, केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने बैठक में खुलकर कहा कि कांग्रेस पार्टी देश में भारतीय जनता पार्टी का विकल्प नहीं हो सकती है। विजयन केवल अपने ही विचार नहीं बल्किसीपीए की केरल ईकाई एवं अपने नेता प्रकाश करात के मन की बात कर रहे थे। मार्क्सवादी पार्टी पर निगाह रखने वाले इस बात से अवगत हैं कि पार्टी में दो गुट हैं। एक गुट पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी का है, तो दूसरा गुट प्रकाश करात का। येचुरी गुट को बंगाल यूनिट का समर्थन है जबकि पूर्व महासचिव करात को केरल यूनिट का समर्थन हासिल है।

बैठक में येचुरी और करात के बीच चली आ रही पुरानी रस्साकशी तो पुनः उभरकर सामने आई ही लेकिन इसमें मार्क्सवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के प्रति पुरानी प्रेम-घृणा की समस्या भी निहित थी। लेकिन मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार, देश में वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार इस समय पार्टी को कांग्रेस के साथ संबंधों में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। इस समय देश फासीवादी राजनीति का सामना कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने 2014 से अब तक देश की तमाम लोकतांत्रिक परम्पराओं को खतरे में डाल दिया है। हद तो यह है कि स्वयं देश का संविधान ही खतरे में है। कहने को देश में आंतरिक आपातकाल लागू नहीं है लेकिन परिस्थितियां उससे भी बदतर हैं। यदि आप सरकार का विरोध करते हैं, तो आपके साथ भीमा कोरेगांव के एक्टिविस्टों जैसा सुलूक होगा। यदि आप किसानों के समान जन आंदोलन करने का साहस करते हैं, तो आपको लखीमपुर खीरी के किसानों की तरह कुचल कर मरने के लिए तैयार रहनाचाहिए। देश के अल्पसंख्यकों को लगभग हर प्रकार के अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। देश की तमाम संस्थाएं सरकार के आगे नतमस्तक हैं। लब्बोलुआब यह है कि संघ की मनमानी के अतिरिक्त अब कुछ बचा नहीं है।

ऐसी परिस्थितियों में मार्क्सवादियों के पास कांग्रेस सहित संपूर्ण विपक्ष के साथ हाथ मिलाकर चलने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह जिन स्टालिन का दम भरती है, उन्होंने यूरोप में हिटलर के फासीवाद के खिलाफ चर्चिल-जैसे घोर साम्राज्यवादी के साथ हाथ मिलाया था। परंतु करात गुट को यह ऐतिहासिक बात समझ में नहीं आती। यह आश्चर्यजनक बात है। बात सीधी है और वह यह है कि इस प्रकार की गुटबंदी के पीछे ‘सर्वहारा हित’ नहीं बल्कि स्वयं सत्ता का मोह है। निश्चय ही यही कारण है कि इस गुटबंदी के चलते भारत में कम्युनिस्ट पार्टियां लगभग सिमट ही गईं और सर्वहारा आंदोलन भी लगभग तितर-बितर हो गया। लेकिन प्रकाश करात-जैसे नेताओं को इसकी चिंता कम है और सीताराम येचुरी को पार्टी के सर्वोच्च पद से बाहर करने की चिंता अधिक है। वह तो कहिए कि केन्द्रीय समिति की बैठक में कांग्रेस विरोध की ‘करात लाइन’ पिट गई और अब अगले वर्ष कन्नूर (केरल) में जो पार्टी कांग्रेस होगी, उसमें भाजपा विरोध के लिए कांग्रेस के साथ मिलाने की ‘येचुरी लाइन’ ही तय होगी।


घृणा के प्रचार का माध्यम बनता फेसबुक

क्या आप सोशल मीडिया प्रेमी हैं? भला आज के संसार में कोई फेसबुक एवं व्हाट्सएप- जैसे सोशल मीडिया मंचों के बिना जीवन की कल्पना कर सकता है? लेकिन यह याद रखिए कि सोशल मीडिया अब एक खतरनाक माध्यम होता जा रहा है। कम-से-कम भारत में तो फेसबुक घृणा के प्रचार में आगे-आगे है। यह हम नहीं कह रहे हैं। इस बात को फेसबुक ने अपनी एक रिपोर्ट में स्वीकार किया है। ऐसा हुआ कि फेसबुक के एक कर्मचारी ने कुछ महीनों पहले कंपनी को सचेत किया कि भारत में फेसबुक घृणा के प्रचार का माध्यम बनता जा रहा है। कंपनी ने इस बात का पता लगाने के लिए एक रिसर्च ग्रुप बना दिया। इस ग्रुप के एक व्यक्ति ने फेसबुक पर केरल में अपना अकाउंट खोला और तीन सप्ताह तक फेसबुक पर चलने वाले वीडियो और पृष्ठों को देखा। उसके अनुसार, उसको तीन सप्ताह तक समुदायों के खिलाफ घृणा का प्रचार एवं तरह-तरह का आतंक देखना पड़ा। फेसबुक के इस रिसर्च ग्रुप ने यह भी माना कि पिछले वर्ष फरवरी में फेसबुक पर घृणा का यह प्रचार इतना बढ़ गया था कि इसके कारण दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी।

लीजिए, जिस फेसबुक पर हम और आप अपनी एवं अपने परिवार को फोटो पोस्ट कर खुश होते थे, पता चला कि वही फेसबुक अब घृणा के प्रचार एवं दंगे भड़काने का भी माध्यम बनता जा रहा है। यह अत्यन्त चिंताजनक बात है। क्योंकि सोशल मीडिया अब एक प्रकार से ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ होता जा रहा है। फेसबुक पर पोस्ट होने वाला एक वीडियो अथवा फोटो को मिनटों में करोड़ों लोग देख सकते हैं। यदि उसकी विषय-वस्तु (कन्टेंट) घृणात्मक हो तो वह देखने वाले करोड़ों लोगों के मन में किसी व्यक्ति विशेष अथवा सामाजिक एवं धार्मिक समूह के खिलाफ समाज में यकायक घृणा उत्पन्न कर सकता है। और इसके नतीजे में भीषण दंगे भी भड़क सकते हैं।

अब बताइए, आप जिस फेसबुक प्लेटफॉर्म पर अपनी फोटो लगाकर प्रसन्नचित रहते थे, वहां तो कुछ और ही हो रहा है। अब आप करें, तो करें क्या! जाहिर है कि यह आपका दायित्व नहीं कि इस समस्या का हल ढूंढे। यह तो कंपनी की जिम्मेदारी है कि वह इस प्रकार के घृणात्मक प्रोपगेंडा सामग्री को प्रचारित होने से रोके। परंतु फेसबुक ने अभी तक इस संबंध में कोई कार्र्वाई नहीं की है। और मुझे आशा नहीं कि आगे भी इस संबंध में कोई कड़ा कदम उठाया जाएगा कि फेसबुक पर चलने वाला नफरत का प्रोपेगेंडा बिल्कुल बंद हो जाए क्योंकि कंपनी तो मुख्यतः पैसा कमाने का माध्यम है। यदि कोई फेसबुक पर एक घृणात्मक वीडियो डालता है और फेसबुक को उसे पुश करने को पैसा देता है तो भला फेसबुक उसको रोकेगा क्यों! यदि चुनाव के समय भाजपा घृणात्मक प्रोपेगेंडा पर चुनाव जीत सकती है और वह इसके लिए हजारों करोड़ खर्च करने को तैयार है, तो फिर फेसबुक अपना आर्थिक हित देखेगा या इस बात की चिंता करेगा कि समाज में उसका प्रभाव क्या पड़ेगा!

फेसबुक-जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियां आर्थिक हित के लिए बनती हैं, न कि सामाजिक क्रांति रचने के लिए। अब आप ही सोच सकते हैं कि आगे फेसबुक-जैसे सोशल मीडिया मंच समाज में क्या गुल खिलाने वाले हैं! वाट्सएप पर संघ विचारधारा पहले से ही छाई हुई थी। अब फेसबुक भी गया।


कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी

क्या आप मुसलमान हैं और गलती से शाह रुख खान की तरह सफल और चर्चित हैं, तो अब आपको अपनी सफलता की कीमत चुकानी पड़ेगी। और शाहरुख-जैसी सफलता तो जाने दीजिए, यदि आप मोहम्मद शमी-जैसे क्रिकेटर हैं तो आपको मुसलमान के रूप में आंका जाएगा। अभी पाकिस्तान के खिलाफ जब भारतीय क्रिकेट टीम दुबई में मैच हार गई तो शमी के खिलाफ सोशल मीडिया पर जो हंगामा मचा, उससे आप भलीभांति परिचित हैं। यदि आप आम मुसलमान हैं तो लिंचिंग-जैसी और यदि शाहरुख एवं शमी-जैसे खास मुसलमान हों तो भी, कीमत तो चुकानी पड़ेगी।

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