दिल्ली में वायु प्रदूषण पर हंगामा एक वार्षिक ड्रामा, अभिनय में तमाम सरकारें, संस्थाएं, कोर्ट और मीडिया तक शामिल

सूत्रधार पूरे 5 महीने नाटक के मंच पर सक्रिय नजर आता है, जबकि प्रदूषण नियंत्रण संस्थान के खर्राटों की आवाज ऑडिटोरियम से बाहर भी सुनाई देती है, कोर्ट बीच-बीच में जब नींद में खलल पड़ती है तब आर्डर-आर्डर की आवाज लगाकर हथौड़ा पीट लेती है और मीडिया के भौंकने की आवाज बहरा बना देती है।

फोटोः विपिन
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महेन्द्र पांडे

दिल्ली और आसपास के शहरों में वायु प्रदूषण एक वार्षिक नाटक है, जिसका मंचन हरेक वर्ष अक्टूबर के बाद से दिल्ली के मंच पर किया जाता है। इस नाटक के नेपथ्य में हांफते-कांपते दर्शक और जनता है। इस नाटक का सूत्रधार वायु प्रदूषण है और कलाकार तमाम संस्थान जिन्हें प्रदूषण नियंत्रण का काम सौपा गया है- केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय, तमाम दूसरे संस्थान और वैज्ञानिक संस्थाएं जो वायु प्रदूषण के दम पर फल-फूल रही हैं, तमाम न्यायालय और विशेष कलाकारों में अब देश का मेनस्ट्रीम मीडिया भी जुड़ गया है।

सूत्रधार पूरे 5 महीने नाटक के मंच पर सक्रिय नजर आता है, जबकि तथाकथित प्रदूषण नियंत्रण संस्थान के खर्राटों की आवाज ऑडिटोरियम से बाहर भी सुनाई देती है, न्यायालय बीच-बीच में जब नींद में खलल पड़ती है तब आर्डर-आर्डर की आवाज लगाकर हथौड़ा पीट लेते हैं और मीडिया के भौंकने की आवाज बहरा बना देती है। वायु प्रदूषण के मुख्य किरदार– वाहन, उद्योग, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं– सभी ग्रीन रूम से कभी बाहर आते ही नहीं, वे सरकारी संरक्षण में अन्दर ही सजे-संवरे बैठे रहते हैं।

दिल्ली में वायु प्रदूषण पर हंगामा एक वार्षिक ड्रामा, अभिनय में तमाम सरकारें, संस्थाएं, कोर्ट और मीडिया तक शामिल
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नाटक का अंत मार्च में होता है, जब हवा की गति तेज होती है– हवा आती है, प्रदूषण का स्तर कुछ कम करती है फिर नाटक के अंतिम दृश्य में सभी किरदार प्रदूषण कम करने का श्रेय लेने के चक्कर में एक दूसरे से हाथापाई करते रहते हैं और हवा धीरे से मुस्कराकर गायब हो जाती है। इसके बाद मंच का पर्दा गिर जाता है, जो अक्टूबर में ही उठता है।

यह एक वार्षिक नाटक है, जिसका मंचन वर्षों से दिल्ली के मंच पर सफलतापूर्वक किया जा रहा है, लेकिन कलाकार अब तक थके नहीं हैं| एक रात की दिवाली के बाद प्रदूषण नियंत्रण वाले संस्थानों और सरकारों को अगले दस दिन का प्रदूषण का कारण मिल जाता है। फिर सरकारें, संस्थान और मीडिया सभी एक सुर में गाने लगते हैं। दस दिनों बाद पराली को कारण बताया जाने लगता है, जो सदियों से खेतों में जलाई जा रही है, पर इसका चमत्कारिक प्रभाव हाल में ही पता चला है। खेतों में पराली तो मुश्किल से 20 दिन जलती है, पर सरकारों और मीडिया के लिए यह अगले चार महीने तक प्रदूषण का कारण बना रहता है।

दिल्ली में वायु प्रदूषण पर हंगामा एक वार्षिक ड्रामा, अभिनय में तमाम सरकारें, संस्थाएं, कोर्ट और मीडिया तक शामिल
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हमारे देश में पिछले कुछ वर्षों में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है, वह है हरेक आपदा का इवेंट मैनेजमेंट। प्रदूषण भी अब एक इवेंट मैनेजमेंट बन गया है। इस दौर में गुमराह करने का काम इवेंट मैनेजमेंट द्वारा किया जाता है, इसके माध्यम से सबसे आगे वाले को धक्का मारकर सबसे पीछे और सबसे पीछे वाले को सबसे आगे किया जा सकता है। अब तो प्रदूषण नियंत्रण भी एक विज्ञापनों और होर्डिंग्स का विषय रह गया है, जिसपर लटके नेता मुस्कराते हुए दिनरात गुबार में पड़े रहते हैं।

पब्लिक के लिए भले ही वायु प्रदूषण ट्रेजिक हो, हमारी सरकार और नेता इसे कॉमेडी में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सरकारें विरोधियों पर हमले के समय वायु प्रदूषण का कारण कुछ और बताती हैं, मीडिया में कुछ और बताती हैं, संसद में कुछ और बताती हैं और न्यायालय में कुछ और कहती हैं। दूसरी तरफ मीडिया कुछ और खबर गढ़ कर महीनों दिखाता रहता है। न्यायालय हरेक साल बस फटकार लगाता है, मीडिया और सोशल मीडिया पर खबरें चलती हैं, फिर दो-तीन सुनवाई के बाद मार्च-अप्रैल का महीना आ जाता है और न्यायालय का काम भी पूरा हो जाता है।

दिल्ली में वायु प्रदूषण पर हंगामा एक वार्षिक ड्रामा, अभिनय में तमाम सरकारें, संस्थाएं, कोर्ट और मीडिया तक शामिल
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कॉमेडी इस कदर है कि वैज्ञानिकों के अनुसार तथाकथित पराली जलाने से कुल 4 से 7 प्रतिशत प्रदूषण होता है, पर सरकारें इसी भरोसे पूरा साल निकाल देती हैं। कुछ वर्ष पहले जब महान पर्यावरण और स्वास्थ्य विनाशक डॉ हर्षवर्धन पर्यावरण मंत्री थे, तब मंत्री जी, भारतीय मौसम विभाग के प्रवक्ता, दूसरी सरकारी संस्थाएं, मीडिया और दिल्ली सरकार लगातार पराली जलाने को दिल्ली और आसपास वायु प्रदूषण का कारण बताते रहे, पर इसी बीच में डॉ हर्षवर्धन ने दिल्ली में वायु प्रदूषण का कारण अरब देशों से उड़ती रेतों को बता दिया। इसी तरह इस वर्ष भी पराली के शोर के बीच यह पता चला कि इसका तो योगदान ही लगभग नगण्य है।

दिल्ली दुनिया में अकेला ऐसा शहर है जहां वायु प्रदूषण के लिए हवा की गति को जिम्मेदार ठहराया जाता है। इसके लिए कोई संस्थान या फिर सरकार कभी जिम्मेदार नहीं होती। दो वर्ष पहले ओड-इवन की समयावधि ख़त्म होने के बाद जब मुख्यमंत्री केजरीवाल वक्तव्य दे रहे थे तब उन्होंने कहा था, अगले कुछ दिनों में हवा के कुछ तेज चलने का अनुमान है तब प्रदूषण कम रहेगा। केंद्र सरकार का मौसम विभाग भी समय-समय पर ऐसा ही बताता है कि हवा धीमे है इसलिए प्रदूषण का स्तर अधिक है। इस तरह के वक्तव्य केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तरफ से भी आते हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण के नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल हवा की है। संभव है आने वाले वर्षों में किसी न्यायालय में हवा के विरुद्ध किसी पीआईएल की सुनवाई चल रही हो।


तीन वर्ष पहले सर्वोच्च न्यायालय में दिल्ली के वायु प्रदूषण से सम्बंधित मुकदमे की सुनवाई के दौरान किसी न्यायाधीश ने कहा था, अब इस मामले में जिम्मेदारी तय करने का समय आ गया है। इसका सीधा सा मतलब है कि वायु प्रदूषण से भले ही लोग मरते और बीमार पड़ते हों पर इसके नियंत्रण की जिम्मेदारी किसी की नहीं है। यदि जिम्मेदारी ही नहीं है, तो फिर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और हरेक राज्य में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे संस्थान खड़े ही क्यों किये गए हैं। बिना किसी जिम्मेदारी वाले ऐसे संस्थान क्या जनता की मेहनत की कमाई पर डाका नहीं हैं? जाहिर है जब तक किसी संस्थान की जिम्मेदारी इस मामले में तय नहीं की जाती, दिल्ली वाले साल-दर-साल ऐसे ही प्रदूषण से जूझते रहेंगे और जनता एक वार्षिक नाटक देखती रहेगी।

वर्ष 1981 में वायु अधिनियम के कुछ वर्ष बाद दिल्ली को एयर पोल्यूशन कंट्रोल एरिया घोषित कर दिया गया था, पर कोई योजना नहीं बनाई गई। इसके बाद देश भर में कुछ क्षेत्र या शहर को गंभीर तौर पर प्रदूषित क्षेत्र घोषित किया गया। इसमें भी दिल्ली का नजफगढ़ ड्रेन बेसिन क्षेत्र सम्मिलित था। नजफगढ़ ड्रेन बेसिन क्षेत्र दिल्ली के लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्र में फैला है, जिसमें लगभग पूरा का पूरा दक्षिण दिल्ली और पश्चिम दिल्ली का क्षेत्र आता है। सबसे बड़ा रहस्य तो यही है कि ऐसे क्षेत्र का निर्धारण करने के समय किसे दिल्ली का नजफगढ़ ड्रेन बेसिन क्षेत्र के बाहर का हिस्सा गंभीर तौर पर प्रदूषित नहीं लगा होगा। यदि पूरी दिल्ली बेहद प्रदूषित होने के बाद भी इस सूची में नहीं थी, तब भी नजफगढ़ ड्रेन बेसिन क्षेत्र कौन सा प्रदूषण से मुक्त हो गया?

संवेदनहीनता का सिलसिला यहीं नहीं थमा, कुछ वर्ष पहले केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने औद्योगिक प्रदूषण के आधार पर फिर से गंभीर तौर पर प्रदूषित क्षेत्रों और शहरों की सूची जारी की, इसमें पहले की सूची के सभी क्षेत्र मौजूद थे। इसका सीधा सा मतलब यह है कि केन्द्रीय बोर्ड केवल यह आकलन कर पाता है कि कहां प्रदूषण अधिक है, पर कहीं के प्रदूषण को नियंत्रित कर पाना इसके बस में नहीं है, कोई प्रभावी योजना भी इस सन्दर्भ में नहीं है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि केन्द्रीय बोर्ड और पर्यावरण मंत्रालय निहायत ही बेशर्मी से अपना काम करता है और देश में प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है। इन संस्थानों के रहते देश में प्रदूषण कम करने की बात भी बेमानी है।

केन्द्रीय बोर्ड और पर्यावरण मंत्रालय की संवेदनहीनता का कोई अंत ही नहीं है और दुखद तथ्य यह है कि देश की अधिकतर न्यायालयें भी इन्ही संस्थानों का साथ देती हैं। जब औद्योगिक प्रदूषण के आधार पर फिर से गंभीर तौर पर प्रदूषित क्षेत्रों की सूची प्रकाशित हुई तब पर्यावरण मंत्रालय ने एक निर्देश भी जारी किया, इसके अनुसार इन क्षेत्रों में किसी भी परियोजना को पर्यावरण स्वीकृति नहीं दी जा सकती थी। दिल्ली को छोड़कर देश के सभी प्रदूषित क्षेत्रों में इस निर्देश का पालन किया गया। दिल्ली के पड़ोसी शहरों, गाजियाबाद और नोएडा में भी इसका पालन किया गया पर दिल्ली के परियोजनाओं को लगातार पर्यावरण स्वीकृति मिलती रही। दिल्ली के एरोसिटी (इंदिरा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास) में जितने भवन आज हैं, सबको पर्यावरण स्वीकृति उसी दौरान दी गई थी। यह पूरा क्षेत्र नजफगढ़ ड्रेन बेसिन क्षेत्र में स्थित है।


इस सम्बन्ध में जब लेखक ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की तब पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों ने न्यायालय में बताया कि यह पाबंदी निर्माण कार्यों पर नहीं लगी है। अधिकारियों का काम झूठ बोलना था, सो उन्होंने किया, पर न्यायाधीश महोदय ने भी एक बार भी उस निर्देश को पढ़ने की जहमत नहीं उठाई जिसमें स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि ऐसे क्षेत्रों में किसी भी परियोजना को पर्यावरण स्वीकृति नहीं दी जा सकती है, जाहिर है इसमें निर्माण परियोजनाएं सम्मिलित थीं।

झूठ और लापरवाही से लबरेज ऐसे संस्थान कैसे प्रदूषण से निजात दिला पाएंगे, यह समझाना कठिन नहीं है। एक कहावत है, जोकरों का झुंड, पर अफसोस यह है कि इन संस्थानों को जोकरों का झुंड भी नहीं कह सकते, क्योंकि जोकर भी अपना काम लगन से करते हैं। जाहिर है, ट्रेजेडी और कॉमेडी से भरपूर प्रदूषण महाकाव्य पर नाटक साल-दर-साल चलता रहेगा, सरकारें मंच पर सोती रहेंगीं, न्यायाधीश आर्डर-आर्डर करेंगें, मीडिया पराली से दिल्ली को प्रदूषित करती रहेगी, कुछ टीवी डिबेट्स होंगे और प्रधानमंत्री प्रदूषण को भी विकास का नाम दे देंगे।

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