पीएम मोदी और शी जिनपिंग की शिखर वार्ता तक पहुंच कर ही खत्म होगा पूर्वी लद्दाख का मामला

विशेषज्ञों का अनुमान है कि पूर्वी लद्दाख का मामला सैन्य स्तर पर बातचीत से आगे बढ़ते हुए विदेश मंत्रालय वगैरह से होते हुए अंततः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच शिखर स्तर वार्ता तक पहुंचेगा।

फोटो : सोशल मीडिया
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पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन में जारी गतिरोध के बीच दोनों देशों में लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बातचीत बिना किसी समाधान के समाप्त हो गई। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद पर बारीक नजर रखने वालों को यह लगने लगा है कि अब यह मामला लंबा खिंचने वाला है लेकिन उन्हें इस बात की आशंका नहीं है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के जमीन पर नहीं खींचे जाने के कारण जटिल हो गया यह मामला भारत और चीन के बीच युद्ध-जैसी स्थिति में बदल सकता है।

बातचीत में भारतीय पक्ष का नेतृत्व 14 कॉर्प्स के कमांडर ले. जनरल हरिंदर सिंह ने किया जबकि चीन का प्रतिनिधित्व साउथ जिंगजियांग मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट के मेजर जनरल लियूलिन ने। उम्मीद यही है कि बातचीत की यह प्रक्रिया जारी रहेगी क्योंकि ले. जनरल स्तर की वार्ता को ‘सकारात्मक’ कहा गया है। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के चाइनीज स्टडीज में प्रोफेसर कोंडा पल्ली श्रीकांत का मानना है कि जिस तरह बातचीत के स्तर के कमांडर, मेजर जनरल से बढ़ते हुए ले. जनरल तक आ जाने के बाद भी गतिरोध बना हुआ है, उससे लगता है कि मामला खिंचेगा। श्रीकांत का अनुमान है कि यह मामला सैन्य स्तर पर बातचीत से आगे बढ़ते हुए विदेश मंत्रालय वगैरह से होते हुए अंततः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच शिखर स्तर वार्ता तक पहुंचेगा। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि दोनों ही पक्षों को वैसे भी सितंबर तक पीछे हटना ही होगा क्योंकि समुद्र सतह से 14 हजार फुट की ऊंचाई पर तापमान शून्य से 55 डिग्री नीचे तक चला जाता है। फिलहाल ही वहां का तापमान शून्य से 13-15 डिग्री नीचे है।

इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स की पत्रिका इंडिया क्वाटर्ली की संपादक मधु भसीन कहती हैं- यह सैन्य तनातनी भारत की ओर से इस बात का स्पष्ट संदेश है कि भारत को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अपनी स्थिति को सुदढ़ करने की मनमोहन सरकार के समय शुरू हुई नीति को और मजबूती के साथ आगे बढ़ाने में जरा भी हिचक नहीं और यही बात चीन को परेशान कर रही है। वह कहती हैं, सड़क निर्माण करके “हमने कड़ा संदेश दिया” है। उनका मानना है कि ऐसे समय जब चीन पर न केवल कोविड-19 बल्कि तकनीक चुराने और दक्षिण चीन सागर में दादागिरी भरी नीतियों के कारण अमेरिका और अन्य देशों की ओर से जबर्दस्त दबाव है, वह भारत के साथ एक बड़ा मोर्चा खोलने की स्थिति में तो नहीं ही है। मधु कहती हैं कि चीन को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प के आकलन से डेमोक्रेट तक सहमत हैं और ट्रम्प में जितनी भी अस्थिरता हो, इतना तय है कि वह कुछ ठोस करना चाह रहे हैं।

चीन मामलों की विशेषज्ञ जेएनयू से संबद्ध अलका आचार्य कहती हैं कि बातचीत के स्तर का ले. जनरल के स्तर तक आने का साफ मतलब है कि दोनों सेनाएं अपने-अपने रुख पर अड़ी हैं। ताजा गतिरोध भारत-चीन सीमा विवाद की जटिल तस्वीर का ही एक पहलू है जिसमें विशेष प्रतिनिधि से लेकर 22 दौर की लंबी बातचीत हो चुकी है और भारत की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल इसमें महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। सोसाइटी फॉर सिक्योरिटी स्टडीज के निदेशक कमोडोर उदय भास्कर कहते हैं, “लोग जितना समझ रहे हैं, मामला उससे कहीं अधिक गंभीर है।” सुरक्षा विश्लेषक अशोक मेहता कहते हैं कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के मुताबिक “वे (चीनी) अंदर आ गए हैं। लेकिन ठीक-ठीक स्थिति क्या है, यह तो सरकार को ही पता होगा।” उन्हें लगता है कि चीनी एक सोची-समझी हुई रणनीति के तहत आए हैं और इसी कारण वे लोग कई जगहों पर काफी अंदर तक घुसे। उनका मानना है कि “मौजूदा बातचीत से कोई हल नहीं निकलने जा रहा। वैश्विक महामारी से निपटने में लड़खड़ाया चीन इस घुसपैठ के जरिये अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है।”

कोंडापल्ली श्रीकांत मानते हैं कि मौजूदा गतिरोध ऐसा नहीं जिसमें दोनों पक्ष पीछे नहीं हटने पर अड़े रहेंगे। वह इस गतिरोध को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। उनका कहना है कि एजेंडा तो अमेरिका तय करता है और यहां अमेरिका-चीन के संबंधों का सीधा असर भारत-चीन के समीकरण पर पड़ रहा है। वह कहते हैं कि गतिरोध के इलाके में भारत का कोई महत्वपूर्ण ठिकाना नहीं है और इसमें भारतीय संप्रभुता के उल्लंघन-जैसी कोई बात नहीं हुई है। वह इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्तहैं कि बातचीत जारी रहेगी और दोनों देशों का गतिरोध युद्ध में नहीं बदलेगा।

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