आकार पटेल / लव जिहाद और धर्म परिवर्तन को लेकर फैलाए जा रहे झूठ को उजागर करते आंकड़े
ताजा आंकड़े उन लोगों को तसल्ली दे सकते हैं जो जानते हैं कि बीजेपी का प्रोजेक्ट गुमराह करने वाला है, लेकिन उन लोगों का क्या जो अपने दिमाग में रहने वाली साज़िश की आवाज़ों से मोहित हैं और स्थाई तौर पर इस झूठ को सच मानने के लिए अभिशप्त हो चुके हैं।

कुछ बातें हैं जिन्हें लेकर देश परेशान है और कुछ असली खबरें भी हैं। जिन बातों को लेकर हम परेशान हैं, खासकर हमारे मीडिया में और व्हाट्सएप ग्रुप्स में, उनमें से एक है डेमोग्राफिक चेंज यानी आबादी में बदलाव और लव जिहाद और अन्य बातें। हमारी चिंताओं को सही ठहराने वाला वैसे कोई डेटा नहीं है, लेकिन अगर हमें जब वैसे ही पक्का यकीन है तो फिर तथ्य और सत्य हमें चाहिए ही क्यों?
न्यूज़ मिनट ने केरल में धर्म परिवर्तन को लेकर नए आंकड़े छापे हैं। याद रखें कि यह वही राज्य है जिसके हाईकोर्ट ने दिसंबर 2009 में कहा था कि उसे शक है कि ‘अच्छे परिवारों की ऊंची जाति की हिंदू और ईसाई लड़कियों को फंसाने की योजना’ चल रही है। एक जज की यह आम बात, जिसने माना था कि उसके पास इसका कोई सबूत नहीं है, उससे लव जिहाद की कॉन्सपिरेसी थ्योरी शुरू हुई थी जो आज हमें अकसर सुनाई देती है।
न्यूज़ मिनट ने ऐसे राज्य से धर्म परिवर्तन का डेटा इकट्ठा किया, जिसके कानून के मुताबिक धर्म परिवर्तन के हर मामले का रिकॉर्ड होना ज़रूरी है। 2024 के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में कुल 963 लोगों ने धर्म बदला। इनमें से 543 महिलाएं और 420 पुरुष थे। हिंदू धर्म अपनाने वाले कुल लोगों की संख्या 365 थी (जिनमें से 329 पहले ईसाई थे और 36 पहले मुसलमान थे)। इस्लाम अपनाने वालों की संख्या कम थी, 343 (जिनमें से 276 पहले हिंदू और 67 ईसाई थे)। ईसाई धर्म अपनाने वालों की संख्या 255 थी (जिनमें से 234 हिंदू और 23 मुसलमान थे)।
केरल में कोई लव जिहाद या ऐसा इस जैस कुछ नहीं हो रहा है। जो लोग कुछ समय से इस पर नज़र रख रहे हैं, उन्हें यह आंकड़े हैरान नहीं करेंगे। कुछ साल पहले छपी मेरी किताब ‘ऑवर हिंदू राष्ट्र’ में, मैंने पुराने आंकड़ों को सामने रखा था।
7 मार्च 2017 को, मलयालम मनोरमा ने एक एनजीओ मीडिया डेवलपमेंट एंड रिसर्च फाउंडेशन, कोझिकोड की रिसर्च की रिपोर्ट दी, जिससे पता चला कि जनवरी 2011 और दिसंबर 2017 के बीच केरल में धर्म बदलने वालों में से 60 फीसदी ने हिंदू बनना चुना। बदले हुए नामों के गैजेट रिकॉर्ड से पता चला कि सात साल के दौरान 8,334 लोगों ने धर्म बदला, जिनमें से 4,968 ने हिंदू बनना चुना, इनमें से ज़्यादातर, 4,756, ईसाई और 212 मुस्लिम थे। धर्म बदलने वाले कुल लोगों में, महिलाओं की संख्या 2,244 और पुरुषों की संख्या 2,724 थी।
जो 1,864 लोग मुसलमान बने, उनमें से 78 फीसदी पहले हिंदू थे, और इस बार भी धर्म बदलने वाले पुरुषों और महिलाओं की संख्या लगभग बराबर थी। और जो 1,496 लोग ईसाई बने, उनमें से 95 फीसदी हिंदू थे, जिनमें 720 महिलाएं और 776 पुरुष थे। छह लोगों ने बौद्ध बनना चुना, जिनमें से पांच हिंदू थे, एक ईसाई था और कुल दो महिलाएं और चार पुरुष थे।
उससे कुछ साल पहले एक अखबार की रिपोर्ट (‘केरल में 5 साल में करीब 6,000 लोगों ने इस्लाम अपनाया: रिपोर्ट’, 15 जुलाई 2016) में पुलिस की एक ‘इंटेलिजेंस रिपोर्ट’ का ज़िक्र था, जिसमें बताया गया था कि 2011 से 2015 के बीच 5,793 लोगों ने धर्म बदला था। इनमें से लगभग आधे पुरुष और आधी महिलाएं थीं। धर्म बदलने वाले हिंदुओं की संख्या 4,719 थी, जबकि 1,074 ईसाई थे।
व्हाट्सऐप ग्रुप्स में कुछ अंकल होंगे जो सरकार और अपने मन की आवाज़ों से बहुत ज़्यादा प्रभावित होंगे। वे इसे सिर्फ़ फ़ेक न्यूज़ कहकर खारिज सकते हैं। ऐसे लोगों को सोचना चाहिए कि 4 फरवरी 2020 को लोकसभा में क्या हुआ था। त्रिशूर के चालकुडी से सांसद, कांग्रेस के बेनी बेहनन ने एक सवाल पूछा था। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय से पूछा कि क्या उसके पास लव जिहाद के किसी मामले की जानकारी है और अगर है तो उसकी डिटेल्स क्या हैं।
मंत्रालय ने जवाब दिया: 'संविधान का आर्टिकल 25 अपनी पसंद के धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की आज़ादी देता है बशर्ते इससे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य संबंधी मामलों पर कोई असर न पड़े। केरल हाई कोर्ट समेत कई अदालतों ने इस बात को सही ठहराया है। मौजूदा कानूनों के तहत 'लव जिहाद' शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। किसी भी केंद्रीय एजेंसी ने 'लव जिहाद' का ऐसा कोई मामला रिपोर्ट नहीं किया है।'
इसके बाद फिर एक सवाल उठता है। अगर लव जिहाद कोई असली चीज़ नहीं है और सरकार मानती है कि यह कोई असली चीज़ नहीं है और धर्म बदलने के आंकड़ों से पता चलता है कि यह कोई असली चीज़ नहीं है, तो फिर इस पर चर्चा क्यों हो रही है, उस पागलपन वाले स्तर पर तो बिल्कुल नहीं जिससे हम इसे जोड़ते हैं?
मेरी राय में इसके दो कारण हैं। पहला यह कि असली खबरें ‘न्यू इंडिया’ के नैरेटिव के लिए सही नहीं हैं। अगर हम हाल ही के एक मामले के आधार पर इस बात पर चर्चा करें कि इंटेलिजेंस एजेंसियां कितनी नाकाबिल हैं, जिसमें अमेरिका ने एक भारतीय नागरिक को पकड़कर जेल में डाल दिया है, तो सरकार उतना दिखावा नहीं कर पाएगी जितना वह राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर करती है। अगर चर्चा इस बात पर होती कि कैसे एक पार्टी के खिलाफ पूरी तरह से झूठा केस किया गया और उसके मुख्यमंत्री को जेल भेज दिया गया क्योंकि बीजेपी उसे हटाना चाहती थी, तो हम दुनिया को इतने भरोसे के साथ यह नहीं बता पाते कि हम लोकतंत्र की जननी हैं। और इसलिए फोकस दूसरी चीजों पर है और सरकार वहीं फोकस रखना चाहती है। यह सब एक कारण है।
दूसरा कारण यह है कि हिंदुत्व की कहानी इतनी आम हो गई है कि तथ्य भी उसे कमज़ोर नहीं कर पाते। एक साफ़ झूठ जिसे सरकार लोकसभा में झूठ मान लेती है, वह भी बीजेपी के लिए 2018 से अब तक सात राज्यों में इस मिथक से निपटने वाले कानून पास करने के लिए काफ़ी है। यह हमारी सच्चाई बन गई है।
ताजा आंकड़े उन लोगों को तसल्ली दे सकते हैं जो जानते हैं कि बीजेपी का प्रोजेक्ट गुमराह करने वाला और नुकसान पहुंचाने वाला है, और उन लोगों के लिए एक पहेली की तरह होगा जिन्होंने झूठ पर यकीन कर लिया था लेकिन जानकारी और विश्लेषण के आधार पर बहकने के लिए तैयार हैं। लेकिन यह शायद हिंदुत्व के उस हिस्से के विचारों को नहीं बदल सकता जो अपने दिमाग में रहने वाली साज़िश की आवाज़ों से मोहित हैं और स्थाई तौर पर इस झूठ को सच मानने के लिए अभिशप्त हो चुके हैं।
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