गायब हो गए लैंगिक अनुपात और एनेमिया के आंकड़े: नाकामियों पर पर्दा डालने में जुटी मोदी सरकार
स्वास्थ्य और पोषण की समस्या मोदी काल में कितने गंभीर स्तर तक पहुंच गई है, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने सरकार की हरेक नाकामी पर पर्दा डालने का प्रयास करते हैं।
मोदी सरकार में बड़ी मुश्किल से आंकड़े प्रकाशित होते हैं, पर अधकचरे आंकड़ों के प्रकाशित होते ही देश का गुलाम मीडिया और अंधभक्तों का सोशल मीडिया मोदी सरकार की उपलब्धियां गिनाने में व्यस्त हो जाता है। दुर्भाग्य यह है कि हरेक ऐसी रिपोर्ट और आंकड़े स्पष्ट तौर पर यह साबित करते हैं कि गरीबी हटाने, स्वास्थ्य या कुपोषण को कम करने के मामले में आंकड़ों की बाजीगरी के बाद भी डॉ मनमोहन सिंह का कार्यकाल मोदी जी के कार्यकाल की तुलना में बहुत आगे था।
बॉडी-मास इंडेक्स (Body-mass Index) आम जनता के पोषण के स्तर को परखने का एक मान्य तरीका है। मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार सामान्य से कम बॉडी मास इंडेक्स वाली आबादी वर्ष 2005-2006 से लगातार कम होती रही पर वर्ष 2019-2021 के बाद से यह आबादी बढ़ती जा रही है। महिलाओं में सामान्य से कम बॉडी मास इंडेक्स वाली आबादी वर्ष 2005-06 में 35.5 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2015-16 तक 22.9 प्रतिशत रह गई। इस दौरान लगभग पूरे समय देश के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह थे। इसके बाद महिलाओं में सामान्य से कम बॉडी मास इंडेक्स वाली आबादी वर्ष 2019-21 तक 18.7 प्रतिशत ही रह गई, पर वर्ष 2023-24 में यह संख्या फिर से बढ़कर 19.7 प्रतिशत तक पहुंच गई।
इसी तरह पुरुषों में सामान्य से कम बॉडी मास इंडेक्स वाली आबादी वर्ष 2005-06, 2015-16, 2019-21 और 2023-24 में क्रमशः 34.2 प्रतिशत, 20.2 प्रतिशत, 16.2 प्रतिशत और फिर 19.7 प्रतिशत आंकी गई। जाहिर है पुरुषों में भी यह समस्या वर्ष 2019-21 के बाद से बढ़ती जा रही है – यह बढ़ते कुपोषण का सटीक पैमाना है।
पढ़ने में यह सामान्य आंकड़े नजर आते हैं – डॉ मनमोहन सिंह के समय कुपोषण की समस्या कम हुई तो मोदी जी के कार्यकाल में भी वर्ष 2019-21 तक यह कम होती हुई नजर आ रही है। पर, इन दोनों कार्यकालों के दौरान कुपोषण कम होने की दर में बहुत अंतर है। महिलाओं के संदर्भ में वर्ष 2005-06 से 2015-16 के बीच के 10 वर्षों में यह कमी हरेक साल औसतन 1.24 प्रतिशत की है, जबकि 2015-16 से 2019-21 के बीच के 5 वर्षों के दौरान औसत से कम बॉडी मास इंडेक्स वाली महिलाओं की संख्या में हरेक साल औसतन 0.8 प्रतिशत की ही गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद वर्ष 2023-24 तक इस संख्या में हरेक वर्ष औसतन 0.25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो रही है।
पुरुषों के संदर्भ में यह अंतर और भी प्रभावी है। वर्ष 2005-06 से 2015-16 के बीच हरेक वर्ष इस संख्या में औसतन 1.4 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि वर्ष 2015-16 से 2019-21 के बीच संख्या में औसत कमी 0.8 प्रतिशत ही आंकी गई। इसके बाद स्थितियां फिर से बिगड़ने लगीं और वर्ष 2019-21 से 2023-24 के बीच सामान्य से कम बॉडी मास इंडेक्स वाले पुरुषों की संख्या में हरेक वर्ष औसतन 1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।
जनता की नजरों से किसी समस्या को ओझल करने के दो रास्ते हैं – पहला रास्ता है समस्या का समाधान और दूसरा रास्ता है उस समस्या को ही मीडिया और रिपोर्टों से गायब कर देना। मोदी सरकार में हरेक समस्या का सामाधान दूसरे तरीके से होता है– यहां समस्या को ही जनता की नजरों से ओझल कर दिया जाता है। हरेक नई सरकारी रिपोर्ट या आंकड़े अनेक पुरानी समस्याओं को जनता की नजरों से ओझल कर देते हैं।
मई 2026 में मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण शृंखला की छठी रिपोर्ट प्रकाशित की है, इसमें वर्ष 2023-2024 के आंकड़े हैं| ऐसी अधिकतर रिपोर्ट केवल अंग्रेजी में प्रकाशित की जाती है, जाहिर है देश की अधिकतर जनता इन्हें समझ नहीं पाती। पहले अधिकतर रिपोर्ट में आंकड़ों के साथ लिखा होता था, “जम्मू और कश्मीर को छोड़कर”। नई रिपोर्ट से इतना स्पष्ट है कि अब जम्मू और कश्मीर की जगह मणिपुर ने ले ली है– इस रिपोर्ट में आंकड़ों के साथ लिखा है “मणिपुर को छोड़कर”। रिपोर्ट के आरंभ में लिखा है कि, इस रिपोर्ट के लिए मौलिक तौर पर उसी फॉर्मैट को अपनाया गया है जिसपर शृंखला की पहले की रिपोर्ट प्रकाशित की गई हैं, जिससे आंकड़ों की तुलना में आसानी रहे। जब आप इस रिपोर्ट के आंकड़ों को देखते हैं और इससे पहले की रिपोर्ट पर नजर डालते हैं तब स्पष्ट होता है कि नई रिपोर्ट से बहुत सारे महत्वपूर्ण आंकड़े हटा दिए गए हैं। इन गायब आंकड़ों में सबसे मत्वपूर्ण हैं – एनेमिया से पीड़ितों की संख्या, फेमिली प्लैनिंग सेवाओं की गुणवत्ता, लैंगिक अनुपात, नवजात और शिशु मृत्यु दर और कैंसर की स्क्रीनिंग के आंकड़े। इस शृंखला की पांचवीं रिपोर्ट (वर्ष 2019-2021) में कुल 131 विषयों पर आंकड़े प्रस्तुत हैं जबकि नई रिपोर्ट में महज 101 विषयों पर सूचनाएं हैं| आंकड़े उस जनसंख्या के भी नदारद हैं जिस आबादी तक रसोई में स्वच्छ ईंधन और परिवार में स्वच्छता की उपलब्धता है। इससे पहले की रिपोर्ट में 2 से 4 वर्ष के शिशुओं के प्री-स्कूल जाने के आंकड़े उपलब्ध हैं, पर नई रिपोर्ट में यह उम्र 5 वर्ष कर दी गई है।
राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 6 रिपोर्ट बताती है कि देश के 29.3 प्रतिशत बच्चों की लंबाई उनकी उम्र के संदर्भ में सामान्य से कम है, 19 प्रतिशत बच्चों का वजन उनकी ऊंचाई के संदर्भ में कम है और 5.2 प्रतिशत बच्चों में तो यह समस्या बहुत गंभीर है। देश के 31.8 बच्चों का वजन उनके उम्र के अनुपात से कम है।
इस शृंखला की पांचवीं रिपोर्ट (2019-2021) के अनुसार देश में एनेमिया (Anemia) की स्थिति खतरनाक स्तर पर है, पर इस नई रिपोर्ट में इससे संबंधित आंकड़े नदारद हैं। पांचवीं रिपोर्ट के अनुसार 6 से 59 सप्ताह की उम्र के 67.1 प्रतिशत शिशु, 15 से 49 वर्ष के उम्र की 57.2 प्रतिशत महिलायें, 52.2 प्रतिशत गर्भवती महिलायें, 57 प्रतिशत सभी उम्र की महिलायें और 25 प्रतिशत पुरुष इस समस्या से जूझ रहे हैं।
स्वास्थ्य और पोषण की समस्या मोदी काल में कितने गंभीर स्तर तक पहुंच गई है, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने सरकार की हरेक नाकामी पर पर्दा डालने का प्रयास करते हैं, समस्याओं को जनता की नजरों से ओझल करने पर पूरा जोर लगाने लगाते हैं पर उन्ही की सरकारी रिपोर्ट में देश की बदहाली दिखने लगी है। यह केवल मोदीकाल में जनता की बदहाली का मामला ही नहीं है बल्कि हरेक ऐसी रिपोर्ट डॉ मनमोहन सिंह को वास्तविक विकासपुरुष भी साबित करती है।
देश में घटता पोषण स्तर बताने के लिए तमाम सरकारी रिपोर्टें मौजूद हैं, बस विकास का राग अलापते मीडिया को कुछ नजर नहीं आता। देश का पूरा विपक्ष भी ऐसे सामाजिक और बुनियादी मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं करता। देश की तथाकथित कट्टर राष्ट्रवादी सत्ता और सत्ता की रखवाली करता मीडिया एक दिन पूरी आबादी को कुपोषण और भूख के चक्रव्यूह में उलझा देगा और हम विकास, बड़ी अर्थव्यवस्था और हिन्दू-मुस्लिम के सपनों में खोए रहेंगे।
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