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पुण्यतिथि विशेष: पंडित नेहरू ने रखी थी आज के भारत की नींव, उनके मूल्यों को मिटाने में लगे BJP-RSS कभी सफल नहीं होंगे

पंडित नेहरू ने 17 सालों तक प्रधानमंत्री के रूप में भारत का नेतृत्व किया। संसद में कांग्रेस का विराट बहुमत होने के बावजूद भारत में मजबूत और जवाबदेही वाले लोकतंत्र की स्थापना के लिए विरोधी नेताओं का और उनके सुझावों का उन्होंने हमेशा सम्मान किया।

फाइल फोटोः सोशल मीडिया
फाइल फोटोः सोशल मीडिया

आजाद भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास की मजबूत नींव रखने वाले पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की पुण्यतिथि पर देश उनको याद कर रहा है। भारत के स्वाधीनता संग्राम और आजाद भारत के नवनिर्माण में उनका ऐतिहासिक योगदान रहा है। 27 मई, 1964 को दिल्ली में जब पंडित जवाहर लाल नेहरू का निधन हुआ था तो पूरी दुनिया ने शोक मनाया था। यमुना तट पर शांतिवन में जब उनका अंतिम संस्कार हुआ तो 15 लाख से अधिक लोगों ने उनको आखिरी विदाई दी थी। उनकी बेहद लोकप्रियता का यह प्रमाण है।

आजादी मिलने के बाद बहुत कठिन चुनौती के बीच पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को देश के प्रधानमंत्री का जिम्मा संभाला था। जो लोग यह दावा कर रहे थे कि भारत जल्दी ही खंडित हो जाएगा, उनको निराशा हुई और नेहरूजी के नेतृत्व में भारत ताकतवर लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में उभरा। धर्म के आधार पर भारत विभाजन की मुस्लिम लीग की जिद का उन्होंने पुरजोर विरोध किया। विरोधी धाराओं के लोगों को साथ लेकर भारत को दुनिया का बेहतरीन संविधान देने में उनकी बहुत अहम भूमिका थी। बाबा साहेब को संविधान के प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया जो पंडित नेहरू की सरकार में देश के पहले कानून मंत्री भी बने।

पंडित नेहरू ने 17 सालों तक प्रधानमंत्री के रूप में भारत का नेतृत्व किया। तब संसद में कांग्रेस पार्टी का विराट बहुमत था। लेकिन वे सभी विचारों के नेताओं को सम्मान देते थे और उनकी बातें सुनते थे। भारत में मजबूत और जवाबदेही वाले लोकतंत्र की स्थापना के लिए विरोधी नेताओं के सुझावों का उन्होंने हमेशा सम्मान किया।

केंद्र में मोदी सरकार अपना आठवां साल पूरा कर चुकी है। लेकिन वह लगातार पंडित जवाहर लाल नेहरू के द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक परंपराओं और मूल्यों को मिटाने में लगी है। नेहरू के योगदान की सराहना करने की जगह वह लोगों के दिलों में उनके प्रति नफरत भर रही है। सरकार में बड़े ओहदे पर बैठे लोग हर समस्या का कारण पंडित नेहरू को बताकर उनके प्रति युवा पीढ़ी में जहर फैला रहे हैं। ऐसा उनके पैतृक संगठन आरएसएस के इशारे पर किया जा रहा है। उनके योगदान, उपलब्धियों और बलिदानों को एक सोची समझी रणनीति के तहत नीचा दिखाने का काम हो रहा है। वहीं महात्मा गांधी के हत्यारों और उनके वैचारिक पथ प्रदर्शकों का महिमामंडन हो रहा है। हेट स्पीच हो रही है। उनको रोकने की जगह ये सरकार प्रोत्साहित करती है।


1947 में भारत को राजनीतिक आज़ादी हासिल होने के बाद अनगिनत चुनौतियां थीं। न पर्याप्त अनाज था, न उद्योग-धंधे थे। हम सुई तक नहीं बना सकते थे। न स्वास्थ्य सुविधाएं थीं, न सिंचाई, बिजली, सड़क या यातायात और संचार के उचित साधन थे। देश को सैकड़ों रियासतों की सामंतशाही से मुक्त करा एक सूत्र में पिरोना बहुत जटिल काम था। लेकिन सरदार वल्लभ भाई पटेल और अन्य सहयोगियों की मदद से देश को एक सूत्र में पिरोने का काम हुआ।

योजना आयोग बना और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से बांध, बिजलीघर, परमाणु ऊर्जा, सड़क, रेल, संचार, सुरक्षा, शिक्षण संस्थान, आईआईटी, आईआईएम, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और तमाम विकास के कामों की बुनियाद रखी गयी। उन्होंने बड़े सिंचाई बांधों और परियोजनाओं को आधुनिक भारत के मंदिरों की संज्ञा दी। उनके ही बनाए रास्ते से 1960 और 1970 के दशक में हरित क्रांति आयी जिसने देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया। उन्होंने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों की बुनियाद रखी, जिसकी बदौलत सामाजिक न्याय के साथ वंचित तबकों को सुरक्षा मिली और स्वदेशीकरण को बढ़ावा भी। उनको आधुनिक भारत के सच्चे वास्तुकार के रूप में मान्यता मिली।

हाल में उदयपुर नव संकल्प ऐलान में अन्य बातों के साथ हमारे ‘राजनैतिक समूह ने मौजूदा विषम परिस्थितियों में ‘‘भारतीयता की भावना’’ व ‘‘वसुधैव कुटुंबकम’’ के सिद्धांतों को हर कांग्रेसजन द्वारा आत्मसात करने पर बल दिया। इसमें कहा गया कि ‘‘भारतीय राष्ट्रवाद’’ कांग्रेस का मूल चरित्र है। इसके विपरीत, बीजेपी का छद्म राष्ट्रवाद सत्ता की भूख पर केंद्रित है। आज सत्तासीन दल द्वारा भारतीय संविधान, उसमें निहित सिद्धांतों और अधिकारों तथा बाबा साहेब अंबेडकर की सोच पर षडयंत्रकारी हमला बोला जा रहा है। पहला आघात देश के दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और गरीबों पर किया गया है। इस नाते हमने उदयपुर में संकल्प लिया कि गांधीवादी मूल्यों और नेहरू जी के आज़ाद भारत के सिद्धांत की रक्षा के लिए हम संघर्ष करेंगे। आज भारत कई चुनौतियों से जूझ रहा है। कोरोना के बाद महंगाई और बेरोजगारी से लोग बुरी तरह परेशान हैं।

पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म देश के एक बेहद संपन्न और ताकतवर परिवार में हुआ। वे पंडित मोतीलाल नेहरू के बेटे थे जो चोटी के वकील थे। लेकिन महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलते हुए उन्होंने सादगी भरा जीवन अपनाया। आजादी की लड़ाई में वे कूद पड़े और अंग्रेजी राज में करीब नौ सालों तक जेलों की यातनाएं सहीं। नौजवान जवाहर लाल नेहरू लाहौर में 1929 में कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष बने। उनकी ही अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ था। बाद में वे 1936, 1937 और 1946 में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए।


आजादी के बाद 1951, 1953 और 1954 में कांग्रेस की अध्यक्षता उन्होंने काफी कठिन दौर में संभाली थी। वे अपने दौर के बहुत काबिल लेखक थे। उनकी किताबें Discovery of India”, Glimples of world history” और “Letters from father to daughter" दुनिया भर में मशहूर हैं। यह पंडित नेहरू का नजरिया था जिस कारण आजादी के तुरंत बाद नागरिकों को वयस्क मताधिकार मिला। 1951 में पहले आम चुनाव में 17.3 करोड़ भारतीयों ने वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुना। उस दौरान विकसित देशों ने भी सभी को वोटिंग का अधिकार देने में काफी लंबा समय लिया।

पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संसद को नयी ताकत और गरिमा प्रदान की। उनके मन में संसद के प्रति अत्याधिक सम्मान था। वे लम्बी बहसों को धैर्यपूर्वक बैठ कर सुनते थे। अपने जीवन के अंतिम कुछ महीनों के दौरान बीमार रहते हुए भी उन्होंने कोई भी सत्र नहीं छोड़ा। वे जनहित के नाम पर सांसदों को जानकारी न देने के बहाने को अच्छा नहीं मानते थे। 1947 में पंडित जवाहर लाल नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में शामिल 14 मंत्रियों में पांच बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जान मथाई, सी एच भाभा और षडमुखम चेट्टी गैर कांग्रेसी थे। वे इसे कांग्रेसी सरकार की जगह राष्ट्रीय सरकार बनाना चाहते थे, जो उनकी बड़ी सोच और इरादे को बताती है। उन्होंने ही अकाली दल के सरदार हुकुम सिंह को लोकसभा का उपाध्यक्ष बनवा कर यह पद विपक्ष को देने की परंपरा आरंभ की थी। लेकिन मोदी सरकार ने 2014 से ही तमाम परंपराओं को नष्ट करना शुरू कर दिया। 2019 के चुनाव के बाद से इतिहास में पहली बार लोकसभा में कोई उपाध्यक्ष नहीं है।

कांग्रेस के प्रबल बहुमत के बावजूद वे विपक्ष को इतना सम्मान देते थे कि उसके आग्रह पर कई बहुत बड़े फैसले लिए। उन्होंने 1953 में लोकसभा में कहा था कि सरकार के लिए निर्भीक आलोचकों और विपक्ष का होना जरूरी है। आलोचना के बिना लोग अपने में संतुष्ट अनुभव करने लगते हैं और सरकार आत्मसंतुष्ट हो जाती है। सारी संसदीय व्यवस्था ही आलोचना पर आधारित है।

लेकिन पिछले आठ सालों से पंडित नेहरू द्वारा स्थापित परंपराओं और संस्थाओं को समाप्त करने का सिलसिला चल रहा है। विपक्ष के द्वारा उठाए गए सवालों का सरकार जवाब नहीं देती। संसद की बैठकें कम हो रही हैं। केवल आत्मप्रचार और आत्मप्रशंसा का दौर जारी है। जल्दबाजी में बिल पास होते हैं। उनको पड़ताल के लिए संसदीय समितियों में नहीं भेजा जाता। सरकार अध्यादेश राज चलाना चाहती है।


नेहरूजी के प्रधानमंत्री काल में विशेषतौर पर 1950 से 1964 के दौरान भारत की राष्ट्रीय आय चार फीसदी सालाना की दर से बढ़ी। पहली तीन योजनाओं में कृषि विकास दर तीन फीसदी से अधिक रही। लेकिन इस सरकार में क्या कुछ हुआ ये बात किसी से छिपी नहीं है। लेकिन मोदी सरकार ने 2015 में योजना आयोग की जगह नीति आयोग बना दिया। जो योजना आयोग 65 सालों तक देश के नियोजित विकास की धुरी था, उसे नष्ट कर दिया।

नेहरूजी ने संसद, बहुदलीय प्रणाली, स्वतंत्र न्यायपालिका और प्रेस जैसे संस्थानों को मजबूत बनाया। पंचायती राज संस्थाओं को आधार दिया। देश की वैज्ञानिक प्रगति के लिए संस्थाओं का जाल खड़ा किया। गरीबी, अंधविश्वास, पिछड़ेपन और छुआछूत से मुक्ति की राह बनायी। लेकिन मोदी सरकार उनकी रखी बुनियाद को भी नष्ट करने में लगी है। हम भारत की बुनियाद को खोखला करने वाली सभी साजिशों का विरोध करेंगे। पंडित जवाहर लाल नेहरू की पुण्यतिथि पर श्रद्धासुमन अर्पित करने के साथ हम सबको उनकी राह पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।

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