पुण्यतिथि विशेषः नेहरू के बिना हम अजनबी देश में होते

साल 1947 में चर्चिल आदि कहा करते थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारतवासी स्वराज चला नहीं पाएंगे। स्वराज के बारे में हम भारतीयों का हीन भाव ही तानाशाही को जन्म दे सकता था। उस नियति से हम बचे, इसका सारा श्रेय नेहरू को है।

फोटोः सोशल मीडिया
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राजेंद्र माथुर

जवाहरलाल नेहरू यदि आजादी के आंदोलन के दिनों में गांधी के सिपाही नहीं होते, तो हमारे स्वतंत्रा-आंदोलन का नक्शा अलग होता। यदि आजादी के बाद के सत्रह वर्षों में वे भारत के प्रधानमंत्री नहीं होते, तो भारत का सामाजिक और राजनीतिक भूगोल वह नहीं होता, जो आज है। तब इस देश की राजनीति के नदी, पहाड़ और जंगल सब अलग हो जाते और हम मानो एक अलग ग्रह पर सांस ले रहे होते।

नेहरू जैसा सिपाही अगर गांधी को आजादी के आंदोलन में नहीं मिलता, तो 1927-28 के बाद भारत के नौजवानों को अपनी नाराज और बगावती अदा के बल पर गांधी सत्याग्रही खेमे में खींच-खींचकर लाने वाला और कौन था? नेहरू ने उन सारे नौजवानों का प्रतिनिधित्व किया, जो गांधी के तौर-तरीके से नाराज थे और बार-बार उन्होंने लिखकर, बोलकर अपनी असहमति का इजहार किया।

उन्होंने तीस की उस पीढ़ी को जबान दी, जो बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित होकर कांग्रेस को बेजुबान लोगों का लड़ाकू हथियार बनाना चाहती थी। लेकिन यह सारा काम उन्होंने कांग्रेस की केमिस्ट्री के दायरे में किया, और उसका सम्मान करते हुए किया।

अगर वे 1933-35 में सनकी लोहियावादियों की तरह बरताव करते और अपनी एक अलग समाजवादी पार्टी बनाकर गांधी से असहमत होते हुए भी नेहरू ने गांधी के सामने आत्मसमर्पण किया, क्योंकि अपने को न समझ में आने वाले जादू के सामने अपने को बिछा देने वाला भारतीय भक्तिभाव नेहरू में शेष था, और अपने अकसर बिगड़ पड़ने वाले पट्ट-शिष्य से लाड करना गांधी को आता था।

बकरी का दूध पीने वाला कोई सेवाग्रामी जूनियर गांधी तीस के दशक में न तो युवक-हृदय–सम्राट का पद अर्जित कर सकता था और न महात्मा मोहनदास उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर सकते थे, क्योंकि आंख पर पट्टी बांधकर लीक पर चलने वाले शिष्यों की सीमा महात्माजी खूब समझते थे। नेहरू और गांधी के इस द्वंद्वात्मक सहयोग ने आजादी के आंदोलन के ताने-बाने को एक अद्भुत सत्ता दी और गांधी का जादू नेहरू के तिलस्म से जुड़कर न जाने कौन सा ब्रह्मास्त्रबन गया।

नेहरू के बिना क्या भारत वैसा लोकतांत्रिक देश बन पाता जैसा कि वह आज है? आपको 1947 के किस नेता में लोकतंत्र की बुनियादी आजादियों के प्रति वह सम्मान नजर आता है, जो नेहरू में था? हरिजन से रक्त में एकता महसूस के प्रति लगाव कितनों में था? विज्ञान के प्रति इतना भोला उत्साह आप उस जमाने में और कहां पाते हैं? भारत के आर्थिक विकास के बारे में क्या किसी और नेता के पास दृष्टि थी? भारत की सारी विविधताओं को इतना स्नेह क्या किसी और नेता ने दिया? नेहरू नहीं होते तो विभाजन के तुरंत बाद क्या भारत हिंदू राष्ट्र बनने से बच पाता?

भारत 15 अगस्त के बाद एक लोकतंत्र होगा, यह इस देश की जन्मपत्री में तो नहीं लिखा था। अनुमान लगाना व्यर्थ है, लेकिन सोचिए कि यदि सरदार पटेल को स्वाधीनता के बाद सत्रह साल तक जवाहरलाल नेहरू की लोकप्रियता और उनका पद मिला होता, तो क्या वे मासोत्से-तुंग या स्तालिन के भारतीय संस्करण नहीं हो जाते? सुकर्णो, नासिर, टीटो, एनक्रूमा आदि ने अपनी लोकप्रियता का क्या किया?

देश के धीमे पन से असंतुष्ट जवाहरलाल के सामने क्या यह विकल्प नहीं रहा होगा कि लोकतंत्र को एक तरफ रखकर कुछ साल चाबुक चलाया जाए, ताकि देश दौड़कर एक बार सबके साथ आ सके? अगर वे चाबुक चलाते तो क्या एक नशीला उत्साह सारे देश में पैदा नहीं होता, जिसके रहते लोकतंत्र की हिमायत एक जनद्रोही हरकत नजर आती?

लेकिन जैसे गांधी के सामने नेहरू ने अहं-विहीन आत्मसर्पण कर दिया था, उसी तरह भारत के लोकतंत्र के सामने उन्होंने हमेशा अहं-विहीन आत्मसर्पण किया। गांधी की जगह गणदेवता ने ले ली। यह नहीं कहा जा सकता है कि नेहरू नहीं होते, तो भी ऐसा ही होता। और अगर भारत में लोकतंत्र नहीं होता, तो क्या हम अपने-आपको एक बिलकुल अलग देश में नहीं पाते?

यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र के अलवा कोई और प्रणाली होती, तो वह भारत जैसे बेमेल देश को एक नहीं रख पाती। तानाशाही का प्रेशर कुकर होता तो देश जल्दी टूटता। 1947 में यह माना जा सकता था कि लोकतंत्र में इतना हंगामा है, खींचतान है, दंगे फसाद हैं, अराजकता है कि भारत जैसे भानुमती के कुनबे में यह खुराफाती चीज अगर छोड़ दी गई, तो न टूटने वाला देश भी टूट जाएगा।

आखिर इसी बूते पर तो चर्चिल आदि कहा करते थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारतवासी स्वराज चला नहीं पाएंगे। स्वराज के बारे में हम भारतीयों का हीन भाव ही तानाशाही को जन्म दे सकता था। उस नियति से हम बचे, इसका सारा श्रेय नेहरू को है।

कांग्रेस की आर्थिक दृष्टि न गांधीवादी थी, न नेहरूवादी। इसलिए कुछ राज्यों के जमींदारी उन्मूलन कार्यक्रम को छोड़ दें, तो भारत के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों में हम किसी आर्थिक लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ने की कोई छटपटाहट नहीं पाते। कुरसी पर बैठ पाना ही उनके लिए इतिश्री थी। इसलिए कई जगह कांग्रेस का राज पुलिस-राज होता जा रहा था।

सिर्फ नेहरू में देश के पिछड़ेपन का अहसास था, और एक दृष्टि थी, और छटपटाहट थी। गांधी की तरह एक सेवामुखी कांग्रेस तो उन्होंने नहीं बनाई, और न ही कम्युनिस्ट देशों की तरह एक समर्पित काडर तैयार किया लेकिन अपनी लोकतांत्रिक सरकार की सारी शक्ति उन्होंने विकास के एक मॉडल पर अमल करने के लिए झोंक दी।

बड़े बांध, सिंचाई योजनाएं, अधिक अन्न उपजाओ, वन-महोत्सव, सामुदायिक विकास, राष्ट्रीय विस्तार कार्यक्रम, पंचवर्षीय योजना, भारी उद्योग, लोहे और बिजली और खाद के कारखाने, नए स्कूल और कॉलेज, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, लाखों नई सरकारी नौकरियां, समाजवादी समाज रचना- यह सारा सिलसिला जवाहरलाल नेहरू की अदम्य उर्जा से शुरू हुआ…।

नेहरू के जमाने में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर इतना सरकारी धन खर्च न हुआ होता, यदि भारी उद्योग की नींव न पड़ी होती, यदि रासायनिक खाद के कारखाने न खुले होते, तो क्या अस्सी के दशक की अभूतपूर्व, राजीवयुगीन समृद्धि यह देश देख पाता? भारत के देशी पूंजीपतियों में तो यह सामर्थ्य नहीं थी कि मल्टीनेशनल कंपनियों की मदद के बगैर वे भारत को आत्मनिर्भर समृद्धि के इस बिंदु तक पहुंचा पाते।

चीन और रूस के उदाहरणों से स्पष्ट है कि करोड़ों लोगों को जेल में ठूंसे बगैर, जान से मारे बगैर, या उन्हें सजा काटने के लिए अरुणाचल भेजे बगैर जो आतंकविहीन, आर्थिक सरप्लस भारत ने पैदा किया है, और इस सरप्लस के निवेश से जो प्रगति की है, वह आश्चर्यजनक रही है। इतनी सीधी उंगली से इतना ज्यादा घी निकालने का काम किसी और देश ने किया हो तो कृपया नाम बताएं।

नेहरू नहीं होते, तो हम या तो जापानी टूथपेस्ट खरीद रहे होते, या हमारे वकीलों और प्रोफेसरों को कोई हुकूमत धान के खेत में अनुभव प्राप्त करने के लिए भेज देती। नेहरू के बिना हमारी रोजमर्रा की जिंदगी यहां भी अलग होती।

और अंत में धर्मनिरपेक्षता! जब नेहरू इसकी चर्चा करते थे, तब दरअसल वे एक नया इनसान भारत की जमीन पर जन्मते देखना चाहते थे। वे ही क्यों, गांधी की भी सारी कोशिश भारत में एक नए मनुष्य को जन्म देने की थी। राममोहन राय से लेकर राममनोहर लोहिया तक हर महत्वाकांक्षी हिंदुस्तानी ने एक नए मनुष्य का सपना देखा है और डेढ़ सौ साल पुरानी यह आदत पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में ही विलुप्त हुई है।

नेहरू का नया मनुष्य रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध कविता का मनुष्य है। लेकिन जो युगपुरुष एक नए मनुष्य का स्वप्न पालता है, उसे समझ ही नहीं आता कि आदमी संकीर्ण क्यों है, क्षुद्र क्यों है, अंधविश्वासी क्यों है, नकली कसौटियों पर अपने आपको बांटने वाला और लड़ने वाला क्यों है, नफरत से अंध होने वाला क्यों है। हर मसीहा की कोशिश के बावजूद नया मनुष्य बार-बार पुराना होना क्यों पसंद करता है?

यह एक लंबा विषय है, और हम नहीं जानते कि गांधी और नेहरू के होने का कोई असर हम पर पड़ा है या नहीं, और हम नए इनसान बने हैं या नहीं लेकिन हम जैसे हैं, उससे बहुत बुरे अगर नहीं हैं, तो इसका श्रेय शायद उन्हीं के प्रयासों को देना होगा।

(सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘सपनों में बनता देश’ से साभार)

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