राम पुनियानी का लेखः गर्भवती हथिनी की मौत और त्रासदी के सांप्रदायीकरण की बीजेपी की चाल

केरल में एक हादसे में गर्भवती हथिनी की मौत के मामले में भी बीजेपी का पाखंड बेनकाब हो गया है। इस मामले में बीजेपी नेताओं द्वारा जानबूझकर मुस्लिम बहुल मल्लापुरम का नाम घसीटा गया और गर्भवती हथिनी की मौत का इस्तेमाल विघटनकारी राजनीति को बढ़ावा देने में किया गया।

फोटोः IANS
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राम पुनियानी

भारत के विविधवर्णी समाज में सांप्रदायिकता का रंग तेजी से घुलता जा रहा है। धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है। उनके विरुद्ध हिंसा की जा रही है और फिर उसे औचित्यपूर्ण ठहराया जा रहा है। हमारे समाज के सांप्रदायीकरण की प्रक्रिया अंग्रेज सरकार द्वारा इतिहास के सांप्रदायिक नजरिये से पुनर्लेखन से शुरू हुई थी।

अब तो स्थिति यह बन गई है कि हर घटना या त्रासदी को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। ऐसी शक्तियां बहुत ताकतवर हैं और अपनी बातों का प्रचार करने के लिए उनके पास एक भारी-भरकम मशीनरी है। हाल ही में हमने देखा कि किस प्रकार कोरोना वायरस के प्रसार के लिए तबलीगी जमात को दोषी ठहरा दिया गया। इस संस्था पर ‘कोरोना जिहाद’ करने और ‘कोरोना बम’ बनाने तक के आरोप भी लगाए गए।

अब एक और त्रासद घटना को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। गत 27 मई 2020 को केरल के पलक्कड़ जिले में 15 साल की एक गर्भवती हथिनी सौम्या की त्रासद परिस्थितियों में मौत हो गई। उसने गलती से पटाखों से भरा कोई फल (अनानास या नारियल) खा लिया था। मुंह में पटाखों के फूट जाने से उसके निचले जबड़े में गंभीर चोट आई और अंततः उसकी मौत हो गई। इस मामले के कई पहलू हैं। पटाखों से भरा वह फल जंगली सूअरों को डराने के लिए रखा गया था। ये सूअर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। फल रखने वाले का उद्देश्य हथिनी को मारना कतई नहीं था।

लेकिन पूर्व केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्री मेनका गांधी ने इस घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जो ट्वीट किया वह न केवल सांप्रदायिक जहर से लबरेज था, वरन उसमें तथ्यात्मक भूलें भी थीं। उन्होंने लिखा कि “घटना केरल के मुस्लिम-बहुल जिले मल्लापुरम में हुई। मल्लापुरम आपराधिक घटनाओं, विशेषकर जानवरों के सन्दर्भ में, के लिए जाना जाता है। आज तक वहां शिकारियों और वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती और इसलिए वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आते।”

समाचार एजेंसी को दिए गए अपने वक्तव्य में उन्होंने मल्लापुरम को देश का सबसे अशांत जिला बताया और कहा कि वहां हर दिन कोई न कोई भयावह घटना होती रहती है। वहां हर किस्म के जानवरों को मारा जाता है और सांप्रदायिक घटनाओं में मनुष्यों की मौत भी आम है। उनके ट्वीट और वक्तव्य मल्लापुरम और केरल का अत्यंत नकारात्मक चित्रण करते हैं और पूरी तरह झूठ पर आधारित हैं।

उन्होंने पलक्कड़- जहां यह घटना हुई थी- की जगह मल्लापुरम का नाम क्यों लिया? इसका मुख्य कारण यह था कि मल्लापुरम एक मुस्लिम-बहुल जिला है। इस जिले का गठन ईएमएस नम्बूदरीपाद सरकार की दूसरी पारी में हुआ था और तत्समय बीजेपी के पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ ने इसका विरोध किया था। तब से लेकर अब तक देश में अनेक नए जिले बने परंतु बीजेपी ने इनमें से एक का भी विरोध नहीं किया। कुल मिलाकर इस पार्टी को मुस्लिम-बहुल जिला मंज़ूर नहीं है।

मेनका ने हाथियों के अवैध शिकार और उनके साथ दुर्व्यवहार के लिए केरल को भी कटघरे में खड़ा किया। उनसे कुछ हद तक सहमत हुआ जा सकता है क्योंकि केरल में हाथियों का धार्मिक अनुष्ठानों और अन्य कामों में प्रयोग किया जाता है। परंतु यही अन्य कई राज्यों में भी होता है और इनमें पड़ोसी राज्य कर्नाटक भी शामिल है।

क्या हम सबको वीरप्पन याद नहीं है जो हाथी दांत की तस्करी के लिए कुख्यात था? परंतु कर्नाटक के बारे में पूर्व मंत्री ने एक शब्द नहीं कहा। क्यों? क्योंकि वहां उनकी पार्टी की सरकार है। दसियों साल कोशिश करने के बाद भी बीजेपी केरल में अपने लिए जगह नहीं बना सकी है, जबकि पार्टी के पितृ संगठन आरएसएस का राज्य में ख़ासा प्रभाव जम चुका है।

मल्लापुरम के बारे में मेनका गांधी ने जो अन्य बातें कहीं वे भी गलत हैं। इस जिले की अपराध दर, मेनका गांधी के निर्वाचन क्षेत्र सुल्तानपुर से काफी कम है। जहां तक मल्लापुरम में सांप्रदायिक हिंसा या विवादों का सवाल है, तो एक ही उदाहरण मेनका गांधी को गलत साबित करने के लिए पर्याप्त है। बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद जब मुंबई, सूरत और भोपाल सहित देश के अनेक शहर जल रहे थे तब मल्लापुरम में पूर्ण शांति थी।

जहां तक मेनका गांधी के इस आरोप का सवाल है कि मल्लापुरम में हजारों लड़कियों को मार दिया जाता है, उसके बारे में जितना कम कहा जाए उतना बेहतर है। केरल का लिंगानुपात देश में सबसे अच्छा है और वहां के मुसलमानों में लिंगानुपात हिन्दुओं से भी बेहतर है, क्योंकि हिन्दुओं की तुलना में उनमें कन्या भ्रूण हत्या का प्रचलन बहुत कम है।

वर्तमान केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने अपने विभाग की पूर्व मंत्री के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहा कि मल्लापुरम में जो कुछ हुआ, वह भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। इतने बड़े पद पर होते हुए भी मंत्रीजी को यह नहीं पता था कि घटना पलक्कड़ में हुई है, मल्लापुरम में नहीं। उनका इरादा भी शायद मुसलमानों को निशाना बनाना रहा होगा। बीजेपी के इन दोनों नेताओं ने इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इस घटना ने पशुओं के साथ व्यवहार से जुड़े कई मुद्दों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है। इस मामले में भी बीजेपी और उसके साथियों का पाखंड सबके सामने है। वे गाय को ‘माता’ बताते हैं परन्तु बीजेपी-शासित प्रदेशों की कई गौशालाओं में गायों की स्थिति दिल दहलाने वाली है। बीजेपी शासनकाल में राजस्थान के हिंगोनिया में एक गौशाला में सैकड़ों गाएं भूख और बीमारियों से मारी गईं थीं।

जहां भारत में गौरक्षा के नाम पर लिंचिंग में तेजी से वृद्धि हो रही है, वहीं हम बीफ के अग्रणी निर्यातकों में से एक भी हैं। यह भी दिलचस्प है कि देश में बीफ के अनेक बल्कि अधिकांश निर्यातक गैर-मुसलमान हैं। केरल में हथिनी की मौत के मुद्दे का इस्तेमाल विघटनकारी राजनीति को बढ़ावा देने में करने की बजाय जानवरों के इस्तेमाल के संबंध में ऐसे नियम बनाये जाने की जरूरत है जो उनके प्रति करुणा और प्रेम के भाव से प्रेरित हों।

इन दिनों गर्भवती हथिनी और उसके अजन्मे बच्चे के बारे में बहुत कुछ कहा जा रहा है। ऐसे में हमें गुजरात दंगों की याद आना स्वाभाविक है, जिनके दौरान गर्भवती स्त्रियों के गर्भाशय काट कर अजन्मे बच्चों को त्रिशूल पर टांगा गया था। हमें जामिया की एमफिल विद्यार्थी सफूरा जरगर की चिंता भी होनी चाहिए। वे गर्भवती हैं और सीएए के विरोध में प्रदर्शन करने के सिलसिले में जेल में हैं। उन्हें जमानत तक नहीं मिल पा रही है।

आखिर कहां है हमारी करुणा? क्या वह केवल केरल के हाथियों के लिए आरक्षित है?

(हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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