मार्च में दिसंबर की दस्तक बड़े खतरे का संकेत
सबसे बड़ी मार कृषि व्यवस्था पर, श्वसन रोगियों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति बेहद घातक।

उपेन्द्र को अभी मार्च के तीसरे हफ्ते में हलद्वानी से आते हुए मुरादाबाद से रामपुर तक सुबह आठ बजे अचानक कोहरे की वजह से अपनी कार की स्पीड काफी कम कर देनी पड़ी। उन्हें समझ में नहीं आया कि अभी इस तरह दिसंबर की तरह धुंध क्यों छा गई है। पहले तो उन्हें लगा कि हो सकता है कि यह स्मॉग हो, क्योंकि दिल्ली की तरह इस इलाके में भी कभी-कभी ऐसा हो जाता है। लेकिन इसमें कोई गंध नहीं थी और आंखों में जलन भी नहीं हो रही थी। साथ चल रहे एक साथी ने अटकल लगाई कि यह सब ईरान-अमेरिका-इजरायल लड़ाई का नतीजा भी हो सकता है। लेकिन जब वे गाजियाबाद के वसुंधरा में अपने घर पहुंचे, तो बच्चों ने बताया कि सुबह वे देर से वॉक करने निकल पाए क्योंकि ठंड तो थी ही, कोहरा-जैसा हो गया था और सूरज देर से निकला। बीच में एक-दो दिन दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़ और झारखंड तक झमाझम बारिश हुई और कई लोगों को अपने हाफ स्वेटर तक निकालने पड़े। मार्च के अंतिम हफ्ते में भी कई जगह इसी किस्म के दृश्य हैं।
भारतीय कैलेंडर में मार्च का महीना उस संधि काल का प्रतीक है जहां ठंड की विदाई होती है और गर्मी दस्तक देने लगती है। लोग कंबल-स्वेटर को विदा कर देते हैं, मोटी चादरें निकाल लेते हैं, पंखे घूमने लगते हैं, सुबह-शाम का मौसम अच्छा लगता है और दिन की धूप तनिक गर्मी देने लगती है। पलाश के फूल दहकते हैं और गेहूं की बालियां सूरज की सुनहरी किरणों को सोखकर पकने की ओर बढ़ती हैं। किंतु इस बार उत्तर भारत में यह समय डराने वाला हो गया है। रही-सही कसर बरसात और ओलावृष्टि ने पूरी कर दी है क्योंकि इससे फसलें तक चौपट हो गईं। दिल्ली, गाजियाबाद, कानपुर और लखनऊ जैसे शहरों में अचानक छा जाने वाला घना कोहरा कोई साधारण मौसमी फेरबदल नहीं है। दरअसल, प्रकृति का संतुलन बुरी तरह डगमगा चुका है। इसे मौसम वैज्ञानिकों ने जलवायु आपातकाल की संज्ञा दी है।
सामान्यतः कोहरा सर्दियों की रात में तब बनता है जब धरती तेजी से अपनी गर्मी छोड़ती है और नमी का स्तर अधिक होता है। लेकिन इस साल फरवरी के अंतिम सप्ताह में अचानक बढ़ी तपिश ने धरती की ऊपरी सतह को अत्यधिक गर्म कर दिया। जब बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी युक्त पूर्वी हवाएं इस गर्म सतह के संपर्क में आईं और उसी दौरान रात के तापमान में अचानक छह से सात डिग्री की गिरावट दर्ज की गई, तो विकिरण की प्रक्रिया ने एक घना आवरण तैयार कर दिया। इसे विज्ञान की भाषा में विकिरण कोहरा कहा जाता है। वायुमंडल के निचले स्तर पर हवा की स्थिरता ने उस धुंध और प्रदूषण के मिश्रण को जमने का अवसर दे दिया, जिसे हम अक्सर कड़ाके की ठंड में देखते हैं।
दिन और रात के तापमान में आ रहा यह भारी अंतर प्रकृति के बदलते मिजाज का गंभीर संकेत है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर भारत के कई हिस्सों में दिन का तापमान सामान्य से 8 से 12 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है, जबकि रातें तुलनात्मक रूप से ठंडी बनी हुई हैं। इस तापमान की गड़बड़ी का बड़ा कारण पश्चिमी विक्षोभ का अत्यंत कमजोर होना है। आमतौर पर ये विक्षोभ बारिश और बर्फबारी लाते हैं जो तापमान को नियंत्रित रखते हैं। इनकी अनुपस्थिति के कारण आसमान पूरी तरह साफ है, जिससे दिन में सूरज की किरणें सीधे धरती को तपा रही हैं।
इस बार जनवरी और फरवरी में करीब 60 प्रतिशत कम बारिश हुई। इसके चलते मिट्टी में नमी नहीं थी। दिन की गर्मी वाष्पीकरण में खर्च होने के बजाय सीधे सतह को गर्म करती है। रात में, साफ आसमान होने के कारण धरती की गर्मी तेजी से वापस अंतरिक्ष में चली जाती है जिससे रातें ठंडी हो जाती हैं। इसके साथ पश्चिमी भारत के ऊपर बने उच्च वायुदाब के क्षेत्रों के कारण हवाएं नीचे की ओर दब रही हैं। यह दबती हुई हवा गर्म हो जाती है और बादलों को बनने से रोकती है, जिससे दिन में 'हीटवेव' जैसी स्थिति बन रही है।
इस अनियमित तापमान से उपज रहे कोहरे और फिर, कई इलाकों में भारी बारिश, काफी तेज हवा और ओलावृष्टि के व्यापक और दूरगामी नुकसान हैं। सबसे बड़ी मार हमारी कृषि व्यवस्था पर पड़ रही है। रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, इस समय अपने पकने के अंतिम चरण में है। कोहरे के कारण बढ़ने वाली नमी और फिर अचानक निकलने वाली तेज धूप फसलों में पीला रतुआ और विभिन्न प्रकार की फफूंद जनित बीमारियों को जन्म दे रही हैं। केवल अनाज ही नहीं, बल्कि बागवानी फसलों जैसे आम के बौर पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ा है। कई जगह सब्जी की फसलें प्रायः नष्ट ही हो गई हैं। अचानक आई नमी और ठंडक ने फूलों को भी झाड़ दिया है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका प्रबल हो गई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अनिश्चितता बनी रही, तो खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर हमें बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
पारिस्थितिकीय नुकसान के साथ-साथ यह मानवीय स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा संकट है। मार्च के इस कोहरे में केवल जलवाष्प नहीं है, बल्कि इसमें वातावरण में मौजूद सूक्ष्म धूल कण और जहरीली गैसें भी फंसी हुई हैं। यह एक प्रकार का विषैला धुआं है जो सीधे फेफड़ों पर प्रहार करता है। श्वसन रोगियों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति बेहद घातक है। यातायात के क्षेत्र में होने वाली बाधाएं आर्थिक तंत्र को प्रभावित करती हैं। विमानों का मार्ग परिवर्तन और रेलगाड़ियों का विलंब केवल असुविधा नहीं है, बल्कि यह करोड़ों रुपये के ईंधन की बर्बादी और कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि का कारण भी है। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जहां जलवायु परिवर्तन के कारण कोहरा बनता है और उस कोहरे के कारण होने वाले उपाय पुनः पर्यावरण को दूषित करते हैं।
मार्च में दिसंबर जैसे दृश्य बड़ी आपदा की आहट हैं। यह हमारी जीवनशैली और विकास के उन मॉडलों पर सवालिया निशान खड़ा करता है जो प्रकृति की कीमत पर तैयार किए गए हैं। हिमालयीन क्षेत्रों में पश्चिमी विक्षोभ की बदलती आवृत्ति और मैदानी इलाकों में बढ़ता कंक्रीट का जाल - दोनों ही इस संकट के लिए उत्तरदायी हैं।
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