खरी-खरीः मोदी सरकार में हाशिये पर पहुंचा लोकतंत्र, पुलिस स्टेट की कगार पर देश

हर मोर्चे पर बुरी तरह से विफल मोदी सरकार जिस ‘पुलिस स्टेट’ की तैयारी कर रही है, उससे साफ पता चल रहा है कि सरकार को जनता के बदलते मूड का अंदाजा है। तभी योगी जी अपने प्रदेश में ऐसी पुलिस फोर्स बना रहे हैं जो किसी को भी बगैर वारंट कभी भी गिरफ्तार कर सकती है।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

कैसा लोकतंत्र, कहां है बोलने की आजादी! जरा सरकार के खिलाफ बोल कर तो देखिए, फिर पता चलेगा, आपका क्या अंजाम होगा! अरे, हम और आप-जैसे आम आदमी की क्या हैसियत, मोदी के भारतवर्ष में यदि सीताराम येचुरी और योगेंद्र यादव सरकार के खिलाफ बोलें तो दिल्ली पुलिस उनका नाम दिल्ली हिंसा से जोड़ देती है। और तो और, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी के जाने-माने प्रोफेसर अपूर्वानंद को दिल्ली पुलिस थाने में बुलाकर घंटों पूछताछ करती है और फिर जेएनयू की जानी-मानी प्रोफेसर और सम्मानित अर्थशास्त्री जयति घोष के साथ उनका नाम दंगों की चार्जशीट में प्रकट होता है। इसी के चौबीस घंटों के अंदर जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद को गिरफ्तार कर लिया जाता है।

अभी यह मामला ठंडा भी नहीं होता कि उत्तर प्रदेश से यह समाचार मिलता है कि राज्य में विशेष सुरक्षा बल का गठन हुआ है, जो किसी को कभी भी बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकता है। अगर आप ऐसे मामले गिनने लगें तो दर्जनों नाम आपको मिल जाएंगे। अरे, हर्ष मंदर पर कोर्ट की मानहानि का मामला ठोक दिया गया। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ‘देशद्रोह’ का मुकदमा झेल रहे हैं। रोज ऐसे दो-चार मामले आ रहे हैं और गिरफ्तारियां हो रही हैं।

सवाल यह है कि आखिर इन लोगों का अपराध क्या है! अपराध कुछ भी नहीं, ये सब के सब मोदी सरकार का विरोध करते चले आ रहे हैं। भाई, लोकतंत्र में सरकार का विरोध कौन-सा पाप है। परंतु मोदी के शासनकाल में लोकतंत्र की एक नई परिभाषा रची जा रही है, जिसमें सरकार का विरोध ‘देशद्रोह’ है। अब लीजिए, चीन की फौज देश में घुसकर एक हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर ले और आप सवाल पूछें तो ‘देशद्रोही’।

अरे, प्रधानमंत्री संसद में खड़े होकर सांसदों से बोलें कि विपक्ष को सरकार के साथ एकजुट होकर चीन का सामना करना चाहिए। पहले आप विपक्ष को यह तो बताइए कि लद्दाख में चीन ने किया क्या, देश को पता तो चले कि हमारी कितनी जमीन चीन के पास चली गई। स्थिति से तो देश अवगत हो और देश एकजुट न हो, तो कहिए। परंतु आप देश से यह कहें कि चीन ने हमारी एक इंच भी जमीन नहीं ली है और फिर रक्षा मंत्री कहें कि चीनी फौज अंदर आ गई है। अब विपक्ष प्रश्न करे तो वह ‘देशद्रोही’ ठहरा दिया जाए। यह एक नया चलन है, यानी चोर से कहो चोरी करो और साथ ही यह भी चिल्लाओ कि जागते रहो।

लब्बोलुआब यह है कि देश इस समय एक ऐसी अघोषित आपातकाल की स्थिति से गुजर रहा है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। हम सन 1975-77 के बीच इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र थे। इमरजेंसी के विरुद्ध आए दिन इलाहाबाद कॉफी हाउस में बैठकर दिन भर सरकार को कोसते थे। कभी किसी पुलिस वाले ने झूठे मुंह सवाल भी नहीं किया। परंतु मोदी जी का लोकतंत्र कुछ अलग ही है। कहने को तो देश में किसी प्रकार की आपातकालीन स्थिति की घोषणा नहीं हुई है, परंतु आप सरकार विरोधी किसी धरने-प्रदर्शन में चले तो जाइए और फिर देखिए, चौबीस घंटे के भीतर आप पर ‘देशद्रोह’ का आरोप ठोक दिया जाएगा। जब सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी का नाम दंगों की चार्जशीट में दाखिल हो सकता है तो फिर हम और आप किस खेत की मूली हैं। इसको आप आपातकालीन स्थिति नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे!

जी हां, स्वतंत्रता के बाद पिछले सात दशकों में देश ऐसे संकट से नहीं गुजरा जैसा संकट वह इस समय झेल रहा है। अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी है। देश की जीडीपी लगभग 24 प्रतिशत घाटे में है। सख्त लॉकडाउन की वजह से करोड़ों लोग रोजगार खो चुके हैं। लाखों काम-धंधे ठप्प पड़े हैं। विपक्ष को चुप करवा दिया गया है। विपक्षी नेताओं को फाइलें दिखा-दिखा कर चुप करवाया जा रहा है। संसद में सांसद प्रश्न नहीं कर सकते। विपक्ष को चीन के मामले में खुद प्रधानमंत्री यह नसीहत दें कि चुप रहें। अब ले-देकर सिविल सोसायटी बची तो प्रोफेसर अपूर्वानंद को थाने बुलाकर घंटों पूछताछ और उमर खालिद ‘देशद्रोह’ के आरोप में गिरफ्तार।

कटु सत्य यह है कि आज भारत लोकतांत्रिक भारत नहीं अपितु एक घोर ‘पुलिस स्टेट’ है, जहां न संसद का कोई अर्थ बचा है और न ही कार्यपालिका तथा न्यायपालिका स्वतंत्र हैं। मीडिया तो पहले ही विज्ञापन के नशे में सरकार की उंगलियों पर नाच रहा है। यह तो लोकतंत्र नहीं है! लोकतंत्र में कहीं ऐसी पुलिस फोर्स नहीं होती जो बिना कारण बताए और बगैर वारंट के किसी को भी, कभी भी घर में घुसकर गिरफ्तार कर सकती है। यह ‘पुलिस स्टेट’ नहीं तो और क्या है!

वास्तविकता यह है कि मोदी सरकार हर मोर्चे पर बुरी तरह विफल है। अर्थव्यवस्था की दुर्दशा तो हर व्यक्ति झेल ही रहा है। मोदी ने सत्ता में आने से पहले जो झूठ बोले थे, वे सब एक-एक कर खुल रहे हैं। कहा गया था कि हर वर्ष दो करोड़ लोगों को नौकरियां मिलेंगी। आज करोड़ों लोग रोजगार से बाहर हो गए हैं। कहा गया था कि हर किसी के बैंक खाते में पंद्रह लाख जमा होंगे। अब हालत यह है कि बैंक ही डूबे जा रहे हैं। किसान को निर्धारित मूल्य का प्रचलन बंद।

अरे, आखिर आम आदमी जाए तो जाए कहां! और मोदी सरकार कहां मुंह छिपाए! मोदी के पास केवल दो रास्ते बचे हैं। पहला, सांप्रदायिकता और घृणा का जितना जहर घोला जा सकता है, घोला जाए। यह काम जारी है। धर्म के नाम पर देश को जितना बांटा जा सकता है, उतना बांटा जा रहा है। कुछ दिनों में राम मंदिर निर्माण के नाम पर पूरे देश में राम राज्य का डंका पीटा जाएगा। मंदिर निर्माण की नींव रख दी गई है। निर्माण का कामकाज चल रहा है। फिर उसकी राजनीतिक मार्केटिंग का काम होगा।

आखिर, भूखे पेट धर्म को कितना दुहा जा सकता है। राम मंदिर वह कार्ड है, जिसको बीजेपी 1990 के दशक से भुना रही है। पिछले लोकसभा चुनाव से थोड़ा पहले कुंभ मेले के अवसर पर इसी कार्ड को फिर से खेलने की कोशिश स्वयं संघ ने की और वह विफल हो गया। अभी पांच अगस्त को जब मोदी जी ने स्वयं अयोध्या जाकर पूजा-अर्चना के बीच मंदिर निर्माण का आरंभ किया, तब भी कोई बहतु जन उत्साह नहीं उत्पन्न हआ। फिर उत्तर प्रदेश की ब्राह्मण लॉबी जो मंदिर के मामले में माहौल बनाती है, वह ठाकुर आदित्यनाथ से मुंह फुलाए बैठी है। इसके अतिरिक्त अब राम मंदिर निर्माण में कोई बाधा तो बची नहीं। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी जैसी हिंदू प्रतिक्रिया उत्पन्न करने वाली संस्था अब कहीं है ही नहीं।

ऐसे में हिंदू आक्रोश भला कैसे पैदा हो! बाकी मुसलमानों को ठीक करने के जितने तीर तरकश में थे, सब चल चुके। तीन तलाक का मामला खत्म, कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त, आतंकवाद भी लगभग ठंडा है। पाकिस्तान डर कर दबका बैठा है। अतः अब मोदी जी धर्म के नाम पर भूखी पेट जनता में घृणा का जहर घोलें तो घोलें कैसे! अब तो केवल एक ही चीज होनी बाकी है। वह यह कि भूखी, बेरोजगार जनता न जाने कब बगैर किसी नेतृत्व के सड़कों पर उतर पड़े।

जो आसार हैं, वह यही बता रहे हैं कि विपक्ष के किसी बड़े नेतृत्व के बगैर जनता कभी भी सड़कों पर उतर सकती है। बल्कि यह कहिए कि जनता के सब्र का पैमाना छलकने लगा है। अभी जिस प्रकार हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान गेहूं के दामों के मामले पर सड़कों पर उतर पड़े, वह इस बात का संकेत है कि मोदी के खिलाफ लावा तेजी से धधक रहा है। लॉकडाउन के कारण जो आर्थिक संकट गहराया, उसके बारे में यही कहा जा रहा था कि भारतीय गांव-देहात उस संकट से परे हैं। परंतु अब किसान का अनाज घर पर पड़ा है और उसको लागत भर भी दाम नहीं मिल रहा है। इस स्थिति ने यह संकट गांव-देहात में भी पहुंचा दिया है।

ऐसी स्थिति में मोदी सरकार को बचने का दूसरा रास्ता जनता के दमन का दिखाई पड़ रहा है। मोदी सरकार जिस पुलिस स्टेट की तैयारी कर रही है, वह यह बता रहा है कि सरकार को जनता के बदलते मूड का अंदाजा है। तब ही तो योगी जी ऐसी पुलिस फोर्स बना रहे हैं जो किसी को भी बगैर वारंट कभी भी गिरफ्तार कर सकती है। इधर, मोदी जी सीताराम येचुरी से लेकर उमर खालिद तक हर किसी को जेल भेजने की तैयारी में हैं। कल कब विपक्ष के बड़े-बड़े नेता जेल चले जाएं, पता नहीं। बस, यूं समझिए कि भारत अब एक ‘पुलिस स्टेट’ की कगार पर है, जहां जल्द ही दमन का एक नया इतिहास लिखा जाएगा।

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