असहमति को राष्ट्र विरोधी और सरकार की आलोचना राष्ट्र के साथ गद्दारी माना जा रहा, अब एक रंग की हो गई है देशभक्ति

ये लोकतांत्रिक मंदी का दौर है और इसका सामना करने के लि ए नकेवल सामाजिक आंदोलन बल्कि राजनीति क वि रोध भी जरूरी है।भारत की आत्मा को पुनर्जीवि त करने और संवैधानि क नैति कता कोसड़कों से लेकर हर जगह बहाल करने के लि ए लड़ा ई लड़नी होगी।

फोटो: सोशल मीडिया
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तीस्ता सीतलवाड़

15 अगस्त को जब भारत ने अपना 73वां स्वतंत्रता दिवस मनाया, उससे महज सात दिन पहले राजस्थान के सीकर के 52 वर्षीय ऑटो रिक्शा चालक गफ्फार को ‘जय श्रीराम’ कहने के लिए मजबूर किया जाता है और तब तक पीटा जाता है जब तक वह बेहोश नहीं हो जाता। हमलावर उसे पीटते हुए कहते हैं, ‘बोलो... मोदी जिंदाबाद’। 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने, उसके चंद हफ्तों के भीतर ही भीड़ ने महज इसलिए मोहसिन खान को पीट-पीटकर मार डाला था कि वह शक्ल-ओ-सूरत और पहनावे से ही मुसलमान लग रहा था। तब से इस तरह की घटनाएं बढ़ गई हैं। अखलाक, पहलू से लेकर जुनैद तक ऐसे अनगिनत मामले बता रहे हैं कि खाकी कमीज के इरादे बुलंद हैं क्योंकि ऊपर बैठे लोगों ने खामोशी अख्तियार कर रखी है। वे सड़कों पर कब्जा कर लेते हैं, समय- समय पर इस तरह के वारदात को अंजाम देते हैं जैसे एक ठंडी चेतावनी दे रहे हों- जानते नहीं क्या कि अब यह देश किसका है?

भारत अब भी अपने लोकतंत्र का जय घोष करेगा, विविधता का प्रतीक तिरंगा फहराएगा, संविधान प्रदत्त आजादी का जश्न मनाएगा और इसके साथ-साथ गफ्फार और मोहसिन को जिस तरह की चोटें सहनी पड़ीं, वैसे हमले भी हुआ करेंगे। हर जगह भीड़तंत्र है। संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखने की जिम्मेदारी जिन संस्थानों पर है, वही इसे कमजोर करने में जुटे हैं। निशाने पर स्पष्ट रूप से मुस्लिम हैं लेकिन ईसाई और दलितों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं और जिस तरह बिना किसी लोकतांत्रिक विचार-विमर्श के स्वास्थ्य, खाद्य, कृषि, शिक्षा, और परिवहन से जुड़े सार्वजनिक संसाधनों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, यह उनके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रहा है।

विरोध और असहमति को राष्ट्र विरोधी करार दिया जा रहा है। देश भक्ति एक-रंग की हो गई है और सरकार की आलोचना को राष्ट्र के साथ गद्दारी के तौर पर लिया जा रहा है। जिस 124-ए को दशकों पहले खत्म कर दिया जाना चाहिए था, उसका इस्तेमाल संशोधित नागरिकता कानून का नाटक करके विरोध करने वाले बच्चों की माताओं के खिलाफ किया जा रहा है जबकि इस संशोधन को खुद संविधानविदों ने भी असंवैधानिक करार दिया है। इसके अलावा यूएपीए जैसे दमनकारी कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है और राज्यों के ऐसे ही तमाम क्रूर कानून हैं जिनका इस्तेमाल सामाजिक आंदोलनकारियों, वकीलों और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किया जा रहा है। टीवी मीडिया और गैर-अंग्रेजी प्रिंट मीडिया सत्तापक्ष के भोंपू बनकर रह गए हैं।


एक दशक पहले हमने गुजरात मॉडल की आलोचना की थी क्यों कि हमने देखा था कि किस तरह 2002 में किए गए व्यापक अपराध पर प्रमुख कॉरपोरेट्स, आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के बीच सावधानीपूर्वक तैयार किए गए गठजोड़ ने पर्दा डालने का काम किया। हममें से कुछ ने गुजरात मॉडल की विफलताओं को लेकर आगाह भी किया था क्योंकि यह पूंजी के चंद हाथों में सिमटने और रोजगारहीन विकास का प्रतीक था। लेकिन तब ज्यादा लोगों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। वह तो इस तरह की आलोचनाओं को तब जाकर कुछ वैधता मिली जब एक युवा पटेल नेता ने बेरोजगार पटेल युवाओं के लिए नौकरियों की मांग की। गौरतलब है कि गुजरात में पटेल बड़े संपन्न हैं। उससे पहले तक तो उदार टीवी एंकर भी विकास के गुजरात मॉडल की तारीफ किया करते थे।

आज हमारे लिए जरूरी है कि गुजरात मॉडल की पृष्ठभूमि में कश्मीर और यूपी के मॉडल को तौलें जिनका आजकल बड़े पैमाने पर प्रचार किया जा रहा है। मोदी-शाह शासन के एक फैसले ने जम्मू-कश्मीर को बर्बाद कर दिया। एक ऐसा फैसला जिसने राजनीतिक नैतिकता, कानून, संविधान और शालीनता का मजाक बनाकर रख दिया। पिछले साल शाह फैजल ने एक इंटरव्यू में मुझसे कहा था, “इस संसद का इस्तेमाल भारतीय लोकतंत्र की एक-एक ईंट निकाल बाहर करने के लिए किया जा रहा है”। एक साल बाद वहां हत्या और क्रूरता का दौर बरकरार है। यहां तक कि वहां नहीं रहने वाला कश्मीरी पंडित समुदाय भी छला महसूस कर रहा है।

हममें से कोई नहीं सोच सकता था कि पहले से बड़े बहुमत के साथ सत्ता में आने के चंद महीनों के भीतर ही मोदी-शाह की सत्ता व्यापक प्रदर्शनों से हिल उठेगी। इन प्रदर्शनों में अन्य समुदाय के लोगों ने भी भाग लिया लेकिन इनमें ज्यादातर मुसलमा नहीं थे और इन्हें एक नागरिक के तौर पर अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरना पड़ा। सत्तारूढ़ बीजेपी लंबे समय से चल रहे इस विरोध को खत्म करने को बेचैन थी और दिल्ली के विधानसभा चुनाव ने उसे मौका दे दिया। प्रदर्शनकारियों की छवि खराब करने के लिए बीजेपी ने नफरती भाषणों का सहारा लिया लेकिन दिल्ली के मतदाताओं ने इन्हें सिरे से खारिज कर दिया। इसके बाद फरवरी, 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शनों को कमजोर करने के लिए किया गया। लॉकडाउन उनके लिए वरदान साबित हुआ और उन्होंने 1,350 लोगों को अवैध तौर पर पकड़ाया जेलों में बंद कर दिया। एक बार फिर ‘सामूहिक प्राथमिकी’ (याद करें गुजरात में 2002 में ऐसा ही हुआ था) दर्ज करने के बाद, ‘फेस रिकॉग्निशन’ जैसी संदिग्ध तकनीक का उपयोग करके विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वालों को गलत तरीके से निशाना बनाया गया।

यूपी ने भी इसी पैटर्न का अनुसरण किया है। अन्य राज्यों की तरह यहां भी सीएए और एनपीआर- एनआरसी के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हुए। लेकिन यहां सरकार बड़ी सख्ती के साथ पेश आई और आज वहां 82 लोगों के खिलाफ गंभीर मामले दर्ज हैं और कई लोगों के सामने उनकी संपत्तियों के अवैध रूप से जब्त हो जाने का खतरा है। इनमें एक रिक्शा चालक भी है! एक ऐसा राज्य जो अपने ही नागरिकों को धमका रहा है, उनके खिलाफ हिंसा का इस्तेमाल कर रहा है। 2002 के बाद के गुजरात के साथ यूपी की एक अजीब-सी समानता है- राष्ट्रीय फलक पर मीडिया घराने आज उस राज्य के मुख्यमंत्री अजय बिष्ट उर्फ आदित्यनाथ को देश का ‘सर्वश्रेष्ठ’ मुखयमंत्री बता रहे हैं।


लॉकडाउन के कुछ ही समय बाद तब्लीगी जमात को वायरस फैलाने का आरोपी बताकर परोक्षरूप से मुसलमानों को निशाना बनाया गया। तब्लीगी का कार्यक्रम मध्य मार्च में हुआ था और दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल नहीं खड़े किए गए क्योंकि यह केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आती है। बस, मौका मिल गया भारतीय मुसलमानों को कठघरे में खड़ा करने का। लॉकडाउनका एक और बुरा असर पड़ा। इसने संसद को और भी अधिक अप्रासंगिक बना दिया है क्योंकि मौलिक नीतिगत परिवर्तन लोकतांत्रिक संवाद के बिना हो रहे हैं। इनके संबंध में कोई भी विरोधी मत नहीं आ पा रहा है। इनके विरोध की इच्छा रखने वाले लोग भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। लॉकडाउन के कारण जिस समय लॉकडाउन के कारण आर्थिक संकट गंभीर हो गया और लाखों लोग भूख से मर रहे थे, उस समय भारत के पास 9.1 करोड़ टन खाद्यान्न का भंडार था जिसे इन भूखे लोगों में बांटा जा सकता था। इसी अवधि के दौरान सरकार ने देश के 40 स्थानों पर वाणिज्यिक खनन की अनुमति दे दी है जहां अभी घने जंगल हैं। यह भी लॉकडाउन की आड़ में कर दिया गया। केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने राज्यों को उन श्रम सुरक्षा कानूनों को हल्का करने को कहा है जो दशकों से अच्छी तरह काम कर रहे थे और जिन्हें दशकों के संघर्ष के बाद बनवाया जा सका था। जिस तरह से रेलवे समेत तमाम सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण किया जा रहा है, बड़ी संख्या में लोग आजादी से पहले वाली दुर्दशा में पहुंच जाएंगे।

नई शिक्षा नीति, 2020 और पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना (ईआईए) की व्यापक आलोचना हो रही है। सबसे बुरी बात यह है कि मोदी सरकार विभिन्न क्षेत्रों में मूलभूत बदलाव कर रही है लेकिन उसके लिए नियत प्रक्रिया को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जा रहा है। ये लोकतांत्रिक मंदी का दौर है और इसका सामना करने के लिए न केवल सामाजिक आंदोलन बल्कि राजनीतिक विरोध भी जरूरी है। भारत की आत्मा को पुनर्जीवित करने और संवैधानिक नैतिकता को सड़कों से लेकर हर जगह बहाल करने के लिए लड़ाई लड़नी होगी। अगर इसका परिणाम व्यापक तौर पर लोगों को जेल में डालने के रूप में आता है तो आया करे।

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