छतरपुर में जल-सखियों के प्रयासों ने बदली तस्वीर, जल संकट को खत्म करने की दिशा में जगी नई उम्मीद

छतरपुर जिले में विशेषकर इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ है। यहां के अंगरौठा गांव में बबिता राजपूत नामक जल-सखी के नेतृत्व में बहुत कठिन परिस्थितियों में महिलाओं और अन्य गांववासियों ने पहाड़ काट कर नहर खोदी और जंगल के पानी को अपने सूखे तालाब तक पहुंचाया।

छतरपुर में जल-सखियों के प्रयासों ने बदली जल संकट की तस्वीर, जगी नई उम्मीद
छतरपुर में जल-सखियों के प्रयासों ने बदली जल संकट की तस्वीर, जगी नई उम्मीद
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भारत डोगरा

लगभग एक दशक से बुंदेलखंड में महिलाओं का जल-संरक्षण में योगदान बढ़ाने के लिए अनेक ग्रामीण महिलाओं का चयन किया गया और इसके लिए उनका प्रशिक्षण भी किया गया। यह प्रयास विशेष तौर पर परमार्थ संस्था के विकास कार्यों से जुड़ा रहा और बहुत चर्चित भी रहा है। छतरपुर जिले में विशेषकर इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ है। यहां के अंगरौठा गांव में बबिता राजपूत नामक जल-सखी के नेतृत्व में बहुत कठिन परिस्थितियों में महिलाओं और अन्य गांववासियों ने पहाड़ काट कर नहर खोदी और जंगल के पानी को अपने सूखे तालाब तक पहुंचाया।

छतरपुर में प्रशिक्षण के लिए एकत्र अनेक जल-सखियों से हुई बातचीत में स्पष्ट हुआ कि पानी की अधिक से अधिक बचत करने और उसे बेकार न करने की सोच को उन्होंने अपनाया है और इसका निरंतर प्रसार किया है। एक जल सहेली बेटीबाई ने कहा कि बेशक हमारे नल में सरकार कम पानी दे, पर पानी बर्बाद नहीं होना चाहिए। अधिकांश जल-सहेलियों ने रसोई के पानी का उपयोग करते हुए किचन गार्डन तैयार करने और सोखता पिट बनाने के बारे में बताया।

खुले में शौच रोकने और शौचालयों के उचित उपयोग के लिए भी अधिकांश जल-सखियां सक्रिय हैं। जिन परिवारां के शौचालय ठीक से नहीं बन सके हैं, वे भी शौचालय बनवा सकें इसके लिए भी वे प्रयासरत हैं। स्वच्छता के लिए जल-सखियां अनेक स्तरों पर सक्रिय हैं और अनेक जल-सखियों ने स्वयं और अन्य गांववासियों की सहायता से एकत्र हुए कूड़े को हटाया है और बेहतर कूड़ा प्रबंधन की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

कुछ जल सखियों ने पाॅलीथीन को गांव में और बाजार में कम करने के प्रयास भी किए हैं। उन्हें इस बारे में चिंता है कि अनेक पशु विशेषकर गाय पाॅलीथीन खाने से बहुत बीमार हो जाती हैं।अनेक जल सखियां जैविक खेती अपना रही हैं और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित कर रही हैं। एक गोबर गैस संयंत्र की स्थापना की गई और बेहतर जैविक खाद प्राप्त करने के साथ वे इससे रसोईघर के लिए ईंधन भी प्राप्त कर सकीं तो इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए और प्रोत्साहित हुईं।


वृक्षारोपण में अधिकांश जल-सखियों ने योगदान दिया है और कुछ जल सखियां तो बहुत बड़े वृक्षारोपण कार्यक्रमों से भी जुड़ी हैं। सेंधघुरी गांव में सभी घरों के सामने, स्कूलों में और अन्य स्थानों में वृक्षारोपण ने इस साधारण गांव को बहुत सुंदर बना दिया है और यह एक माॅडल गांव के रूप में चिह्नित भी हुआ है। यहां पास की पनियाल नदी में पानी रोककर सिंचाई प्राप्त करने के लिए बोरा बंधान किया गया यानि रेत को बोरी में भरकर उससे पानी को रोका गया। इस तरह के प्रयासों से या पक्के चेक डैमों आदि से जल-स्तर ठीक करने के प्रयास हो रहे हैं, जबकि पिछले कुछ दशकों में जल-स्तर बहुत नीचे चला गया है।

यहां की एक बहुत पहले की समस्या यह रही कि इस नदी पर पानी रोकने के लिए लगे कुछ गेटों को कुछ लोग उखाड़ ले गए थे। इन्हें परमार्थ, जल सखियों और गांव समुदाय के सामूहिक प्रयास से एकत्र कर नदी में लगाया गया। यह कठिन कार्य था, इसका कुछ विरोध भी हुआ, पर अंत में सफलता मिली।

काठन नदी पर पानी रोकने और जल संरक्षण के लिए बोरा-बंधान का प्रयास किया गया जिसमें देवशन और वियतपुरा की महिलाओं और जल-सखियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें इस महत्वपूर्ण भूमिका निभाने हेतु तैयार करने में देवरान गांव की जलसखी रानी अहरवार ने विशेष तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह बोरा-बंधान बड़े स्तर पर हुआ। इसके अतिरिक्त काठन नदी में सेवया नामक एक स्थान पर बोराबंधान अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर हुआ।

इस तरह के प्रयासों से सिंचाई की संभावनाएं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर बढ़ती हैं, कुओं का जलस्तर भी ऊंचा होता है। खोड़न नदी में गेट लगाकर किसानों को पानी दिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक तालाबों में गाद हटाकर सफाई द्वारा या उन्हें कुछ गहरा कर तालाबों की जल ग्रहण क्षमता को बढ़ाया गया है। परमार्थ और जल सहेलियों की ओर से सिजवाहा के तालाब में एनीकट बनाकर पानी पहुंचाया गया। मनकारी घरदती, कहोरा, बढेरा आदि तालाबों को भी मिट्टी-गाद हटाकर बेहतर किया गया।


कर्री गांव में चंदेल कालीन जल स्रोत चोपड़ा और बावड़ी के रूप में मौजूद थे पर इन्हें मरम्मत और सुधार की जरूरत थी। परमार्थ की सहायता से यह कार्य सफलतापूर्वक किया गया। यहां के सरपंच ने बताया कि गांव और यहां के स्कूल की जल और स्वच्छता व्यवस्था सुधारने में परमार्थ ने मूल्यवान योगदान दिया है और जल सहेलियों की भूमिका तो बहुत ही सार्थक है।

अब जल जीवन मिशन के अन्तर्गत अनेक गांवों की समस्याएं सामने आने पर जल सखियां इसे सुलझाती हैं। जो घर किसी कारण छूट जाते हैं, वे भी लाभान्वित हो सकें इसका प्रयास करती हैं।

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