मोदी सरकार में पर्यावरण और मानवाधिकार बस प्रवचन तक सीमित, फिर जगजाहीर हुआ कथनी और करनी का अंतर

इसका स्पष्ट मतलब है कि मानवाधिकार पर विपक्ष को कोसने वाले और अपने आप को इसका मसीहा साबित करने वाले प्रधानमंत्री, जमीनी स्तर पर मानवाधिकार के मसले पर चीन और रूस जैसी तानाशाही और निरंकुश व्यवस्था के साथ खड़े हैं।

फाइल फोटोः सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

अलग-अलग समय पर प्रदूषण से संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय और अनेक उच्च न्यायालय पर्यावरण को मानवाधिकार और मौलिक अधिकार बताते रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी भी लगातार जलवायु परिवर्तन, नवीनीकृत ऊर्जा स्त्रोत, पर्यावरण संरक्षण और देश की 5000 वर्षों की पर्यावरण संरक्षण की परंपरा पर देश में कम और विदेशों में ज्यादा प्रवचन देते हैं। दूसरी तरफ देश में सरकार की तरफ से हरेक गंभीर मानवाधिकार हनन के बाद प्रधानमंत्री जी मानवाधिकार के मसले पर तरह-तरह की कहानियां गढ़कर कंग्रेस शासन को कोसते हैं और अपनी पीठ खुद ही थपथपाते हैं। पर, आप कथनी और करनी का फर्क तो देखिये– मोदी सरकार संयुक्त राष्ट्र में स्वच्छ पर्यावरण को मानवाधिकार में जोड़ने वाले प्रस्ताव के अनुमोदन के लिए मतदान में शरीक नहीं होती।

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद् में भारत समेत कुल 47 सदस्य हैं और भारत को 2022 से 2024 तक के लिए भी फिर से सदस्य चुना गया है। इसी मानवाधिकार परिषद् में मानवाधिकार में स्वच्छ, स्वस्थ्य और सतत पर्यावरण के अधिकार को जोड़ने वाले एक प्रस्ताव को पारित करने के लिए मतदान किया गया था, जिसे 43 देशों की सहमति मिली। शेष चार देश– भारत, चीन, जापान और रूस– मतदान से अनुपस्थित रहे। इसका स्पष्ट मतलब है कि मानवाधिकार पर विपक्ष को कोसने वाले और अपने आप को इसका मसीहा साबित करने वाले प्रधानमंत्री, जमीनी स्तर पर मानवाधिकार के मसले पर चीन और रूस जैसी तानाशाही और निरंकुश व्यवस्था के साथ खड़े हैं।

फिर भी मानवाधिकार और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे पर उनके प्रवचनों में कुछ और ही झलकता है। हाल में ही 12 अक्टूबर को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्थापना दिवस के अवसर पर पीएम मोदी ने कहा था कि “भारत आत्मवत सर्वभूतेषु के महान आदर्शों, संस्कारों और विचारों को लेकर चलने वाला देश है। आत्मवत सर्वभूतेषु यानि जैसा मैं हूं वैसे ही सब मनुष्य हैं- मानव-मानव में, जीव-जीव में भेद नहीं है”। ऐसे महान प्रवचन के बाद भी स्वच्छ पर्यावरण को मानवाधिकार में शामिल करने वाले प्रस्ताव का विरोध केवल बीजेपी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ही कर सकती है।

ह्यूमन राइट्स वाच नामक संस्था की उप निदेशक लूसी मेकेर्नन ने इस प्रस्ताव को विश्वव्यापी पर्यावरण संकट और जनजातीय/वनवासी आबादी के दमन को रोकने की दिशा में एक महत्वपुर्ण कदम बताया। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने दुनिया के देशों में पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में तेजी लाने का आह्वान किया। मानवाधिकार परिषद् की प्रमुख मिचेल बकेलेट ने भी सभी देशों से पर्यावरण संरक्षण में तेजी लाने क कहा और इस प्रस्ताव को पर्यावरण संरक्षण और जनजातीय और वनवासी समुदाय के सशक्तीकरण, आजीविका और स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया। यह मानवाधिकार परिषद् का प्रस्ताव संख्या 48/13 था और इसे कोस्टा रिका, मालदीव, मोरक्को और स्लोवेनिया ने स्विट्ज़रलैंड की मदद से तैयार किया था। आश्चर्य यह है कि शुरू से इस प्रस्ताव का विरोध करने वाले यूनाइटेड किंगडम ने मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में मत दिया।


मोदी सरकार की पर्यावरण संरक्षण और मानवाधिकार से दूरी यहीं ख़त्म नहीं होती। इसी दिन, यानि 8 अक्टूबर को ही, प्रस्ताव संख्या 48/14 पर भी मतदान कराया गया था। इसे मार्शल आइलैंड ने तैयार किया था और इसमें मानवाधिकार परिषद् में एक विशेषज्ञ के नियुक्ति की मांग थी जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से मानवाधिकार हनन पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर सके। इस प्रस्ताव के मतदान में भी भारतीय प्रतिनिधि अनुपस्थित रहे। इस प्रस्ताव के समर्थन में 42 मत, विरोध में 1 मत और 4 देश अनुपस्थित रहे। रूस ने विरोध में मत डाला और भारत, चीन, जापान और एरिट्रिया ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। मानवाधिकार परिषद् में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से मानवाधिकार हनन का आकलन करने वाले विशेषज्ञ की नियुक्ति तीन वर्षों के लिए की जाएगी।

भारत फिर से सयुंक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद् का सदस्य पुनःनिर्वाचित हो गया है, और सरकार, मीडिया और सोशल मीडिया इसे ऐतिहासिक उपलब्धि करार दे रही है। दरअसल अब वैश्विक मानवाधिकार की बागडोर उन हाथों में सिमट गई है जो खुलेआम मानवाधिकार का हनन करते हैं और इसे सही साबित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों का सहारा लेते हैं। संयुक्त राष्ट्र में 14 अक्टूबर को गुप्त मतदान द्वारा भारत समेत अर्जेंटीना, बेनिन, कैमरून, एरिट्रिया, फ़िनलैंड, गाम्बिया, होंडुरस, कजाखस्तान, लिथुआनिया, लक्सेम्बर्ग, मलेशिया, मॉन्टेंगरो, पैराग्वे, कतर, सोमालिया, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका को वर्ष 2022 से 2024 तक के लिए चुना गया है। मानवाधिकार काउंसिल में कुल 47 सदस्य होते हैं।

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद से मानवाधिकार परिषद् से नाता तोड़ दिया था, पर अब फिर से अमेरिका की वापसी हो गई है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की प्रतिनिधि लिंडा थॉमस ग्रीनफ़ील्ड ने कहा है कि वह ये सुनिश्चित करेंगी कि अफ़ग़ानिस्तान, म्यांमार, चीन, इथियोपिया, सीरिया और यमन में मानवाधिकार हनन पर पर्याप्त चर्चा की जाए, सभी देशों में बुनियादी आजादी और महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित किया जाए, धार्मिक असहिष्णुता पर लगाम लगे, सभी नागरिकों के लिए समान कानून-व्यवस्था का पैमाना हो, अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा और भेदभाव रोका जा सके। लिंडा थॉमस ग्रीनफ़ील्ड ने यह भी कहा कि अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि मानवाधिकार के सन्दर्भ में दागी देश इस परिषद् के सदस्य नहीं बन सकें।

लिंडा थॉमस ग्रीनफ़ील्ड के बयान भी किसी आदर्श वाक्य से कम नजर नहीं आते, पर यदि इस बयान के बाद भी भारत लगातार इस काउंसिल का सदस्य भारी मतों से निर्वाचित होता जा रहा है, तब यह समझ लेना चाहिए कि पूरी दुनिया में मानवाधिकार की परिभाषा ही बदल गई है और मानवाधिकार बस प्रवचनों तक ही सिमट कर रह गया है। सामाजिक विकास, भूख, मानवाधिकार, प्रेस की आजादी और व्यक्तिगत आजादी से संबंधित दुनिया के जितने इंडेक्स हैं, सबमें भारत सबसे पिछड़े देशों की कतार में खड़ा है– यदि इस तथ्य को नकार भी दें तब भी लिंडा थॉमस ग्रीनफ़ील्ड को इतना तो पता ही होगा कि हरेक वर्ष अमेरिकी कांग्रेस की धार्मिक आजादी और मानवाधिकार से संबंधित कमेटी भारत में इसके लगातार हनन से संबंधित रिपोर्ट प्रकाशित करती है।


एक ऐसा देश जहां अपने अधिकार की मांग करते लोग कुचल कर मार दिए जाते हैं और कुचलने वाले को पुलिस, प्रशासन, राज्य और केंद्र की सरकारें बचाने में जुट जाती हैं। एक ऐसा देश जहां सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों को देशद्रोही बताकर जेल में अनंत काल के लिए ठूंस दिया जाता है, एक ऐसा देश जहां सरकार अपने राजनैतिक फायदे के लिए धार्मिक उन्माद पैदा कर दंगे भी करवा देती है, एक ऐसा देश जहां कोविड-19 की लहर ने देश को श्मशान में बदल डाला था और सरकार उत्सव और जश्न मनाती रही– वैश्विक मानवाधिकार का रखवाला है। अमेरिका के काटो इंस्टिट्यूट और कनाडा के फ्रासेर इंस्टिट्यूट द्वारा संयुक्त तौर पर प्रकाशित ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स 2020 में कुल 162 देशों की सूची में भारत का स्थान 111वां था, जो वर्ष 2019 के इंडेक्स की तुलना में 17 स्थान नीचे था।

दुनिया के अधिकतर पर्यावरणविदों ने मानवाधिकार परिषद् के पर्यावरण संबंधी प्रस्तावो का स्वागत किया है। पर्यावरण विनाश से पूरी दुनिया में मानवाधिकार का हनन हो रहा है| विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में प्रतिवर्ष 1.37 करोड़ मौतें या कुल मौतों में से 24 प्रतिशत का कारण पर्यावरण विनाश है। इस समय दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव-विविधता के नाश से प्रभावित है और हमारे युग में मानवाधिकार हनन का यही सबसे बड़ा कारण है। संयुक्त राष्ट्र ने तो इसे मानवाधिकार में शामिल कर लिया, पर क्या मोदी सरकार प्रवचनों से परे जाकर इस और कभी ध्यान देगी?

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