मृणाल पाण्डे का लेखः राजनीति की नैतिकता, नैतिकता की राजनीति

बीसवीं सदी की शुरुआत में गांधी ने क्रांति के मतलब को रक्तरंजित तख्तापलट या भाट-चारणों की जयकार से भरे युद्ध से अलग कर अहिंसा और सत्याग्रह से जोड़ा, तो कहीं क्रांति को एक नया अर्थ भी दिया। वह भी प्रवचन या नाटकीय भाषणों के जरिए नहीं, खुद अपने उदाहरण द्वारा।

फोटोः सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

भारत की राजनीति को एक मानवीय और नैतिक चेहरा देने वालों में आदिकवि व्यास और वाल्मीकि राजनीति और अर्थशास्त्र के तमाम जानकारों से पहले याद आते हैं। मनुष्य की मूलभूत आजादी और महाज्ञानी होते हुए भी नैतिकता से हीन महारथियों और उनके द्वारा विमोचित हिंसा की आंधी के खतरों को उनके महाकाव्यों ने पहले पहल बहुत निर्मम तटस्थता के साथ रेखांकित किया है। याद रखने की बात है कि दोनों ही कवि जातिच्युत और जारज संतान भी थे। शायद इसीलिए गांधी के प्रियकवि नरसी भगत की ही तरह वे भी सत्ता के गलियारों से दूर कला के द्वीप में बैठे दो निरभिमान मन रखते थे। वह मन जो ‘पीर पराई’ बड़ी गहराई से समझता है।

भारी तामझाम के साथ गांधी की डेढ़ सौवीं जयंती मना रहे देश की मौजूदा हालत देखकर लगता ही नहीं कि वह कभी इसी देश में पैदा हुए थे। बीसवीं सदी की शुरुआत में गांधी ने क्रांति के मतलब को रक्तरंजित तख्तापलट या भाट-चारणों की जयजयकार से भरे युद्ध से एकदम अलग-थलग कर उसे अहिंसा और सत्याग्रह से जोड़ा, तो कहीं क्रांति शब्द को एक नया मतलब भी दिया। वह भी प्रवचन या नाटकीय भाषणों के जरिए नहीं, खुद अपने उदाहरण द्वारा। उनका दो-दो विश्वयुद्धों की हिंसा से क्षत-विक्षत दुनिया के बीचों-बीच उस समय की सबसे बड़ी औपनिवेशिक ताकत पर अहिंसा से काबू पाना और बिना खून बहाए सदियों से गुलाम हिंदुस्तानियों को अहिंसा और सत्याग्रह की ताकत से संपूर्ण आजादी दिलाना, फिर अपना खून देकर हिंदू-मुस्लिम एकता को कायम रखना हमारे लोकतंत्र को नैतिकता का एक दुर्लभ धरातल देता था। पर आज सोचने वाली बात है कि हमने उस नैतिक विरासत का क्या किया?

अंधाधुंध हकबकाहट से हर कीमत पर देश में बाहरी पूंजी न्योतते हुए औद्योगिक, तकनीकी और आर्थिक विकास, स्मार्ट सिटी, स्मार्ट बैंकिंग, स्किलफुल मार्केटिंग और बुलेट ट्रेनों के सपनों का जो ब्लूप्रिंट इधर तैयार किया जा रहा है, सोचने की बात है कि क्या वह गांधी की स्वाश्रयी, सेवाभावी, स्वाभिमानी देश की संकल्पना से मेल खाता है? राज्य दर राज्य नागरिकों का रजिस्टर बनाकर राज्यों के बीच मनमुटाव न्योतना, हिंदी को धुकाने के लिए भाषणबाजी करके दक्षिण में भिड़ का छत्ता छेड़ना, फिर बाहर तमिल को भारत की प्राचीनतम भाषाई धरोहर बताकर पैर वापिस खींचना, यह क्या नैतिक सयानापन दिखाता है? क्या न्यूइंडिया का जो सपना ह्यूस्टन में झलका वह करीब हर तरह की सेवा, चिकित्सा सुश्रूषा, आतिथ्य सत्कार अथवा श्रम की नैतिकता को खाई में फेंककर उनको सीधे नगद खरीद-फरोख्त से नहीं जोड़ देगा?

नैतिकता मानव के स्थायी सरोकारों में से एक रही है। 1940 के संदर्भ आज भले ही बदल गए हों, पर क्या इससे गांधी की प्रासंगिकता मिटाई जा सकती है? दार्शनिक अरस्तू के अनुसार जब एक समाज में कुछ इस तरह की श्रेष्ठताएं पैदा होती हैं, जो किसी फौरी तर्क या रहस्यवाद की बजाय सच्चा और जरूरी नैतिक व्यवहार बनकर सारे समाज में फैल जाती हैं, तो एक दिन धीरे-धीरे वे उस समाज की देशकाल की सीमाओं के भी परे जाकर सारी मानवजाति के नैतिक विवेक का हिस्सा बन जाती हैं। बुद्ध के साथ यही हुआ। गांधी दर्शन के साथ भी यही हुआ है।

आज की भारतीय राजनीति जो घर भीतर गोडसे को पूजती है और बाहर जाकर गांधी की माला भी जप आती है, क्या खुद अपनी नैतिकता के बारे में कभी सोचती है? पिछले छह सालों में अगर उसकी विचार पद्धति में कोई बड़ा बदलाव आया है, तो वह उसकी भाषा, बिंबों और नारों में किस तरह झलक रहा है? ‘घर में घुस कर मारूंगा’, ‘बाहरी घुसपैठिए दीमकों की तरह देश को खोखला कर रहे हैं’, जम्मू-कश्मीर के लाखों जीवित नागरिकों की घेरेबंदी के खिलाफ दायर याचिकाओं को अज्ञात समय तक पिछले बर्नर पर खिसका कर किसी भी सूरत में रामलल्ला बनाम बाबरी मस्जिद मसले पर 18 अक्टूबर तक फैसला करने की न्यायिक घोषणा, किसी बलात्कृत लड़की या उत्पीड़ित दलित या अल्पसंख्यक को जेल भेजकर आरोपियों का बेल पा जाना, फिर भारी सार्वजनिक स्वागत किया जाना, राज्य चुनावों की पूर्व संध्या पर महाराष्ट्र के एक कद्दावर विपक्षी नेता पर ईडी से जांच शुरू करवाना और जब वह खम ठोक कर कहें- ठीक है, मैं खुद दफ्तर आ जाता हूं, तो कहना नहीं-नहीं, इससे कानून व्यवस्था का संकट होगा। आप घरै पर रहिए। इन सब खबरों को हर शाम ताबेदार मीडिया और झागदार बनाकर देश को भले पेश करता रहे, लेकिन यह जनता तक किस तरह की सोच, राजनीतिक हिसाब चुकाई, तथा नैतिकताओं की बाबत इशारे कर रही हैं?

2019 के चुनावों की पूर्व संध्या पर जिस तरह गांधीजी पर, उनके जातीय, सांप्रदायिक एकता के बयानात पर छुटभइये राजनेताओं द्वारा बार-बार ओछे प्रहार किए गए, उनके मद्देनजर 150वीं जयंती समारोह में गांधीवादी सोच को राजनीतिक सिक्कों के रूप में भुनाने के लिए उनकी विकृत व्याख्याओं के कई खतरे सर उठाते हैं। नाम भर की साक्षरता से क्या होता है? सोशल मीडिया की फब्तियां गवाह हैं कि हमारे स्कूलों-कॉलेजों की जो गत बन गई है उनसे निकले अधिकतर मिलेनियल मन डिग्री पाकर भी इतने प्रौढ़ नहीं बन पाए हैं कि इतिहास के सही और गलत पाठ के बीच सही तरह फर्क कर सकें। वे 1990 से पहले के इतिहास को लेकर एक तरह से उदासीन ही हैं। गांधी वांग्मय उनके लिए अजाना बना दिया गया है, उससे अंतरंग संवाद जैसा हमारी पीढ़ी का स्कूली दिनों में बनाया गया था आज निरुत्साहित किया जा रहा है।

कभी-कभी लगता है कि इक्कीसवीं सदी में पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने की उतावली ने उदारता, विचारों के साथ एक सहज संवाद, गाली रहित वाद-विवाद, और खुद अपने भीतर नैतिक मूल्यों की खोज को अलविदा कह दिया है। हिंदी पट्टी और हिंदी भाषा के भीतर शुरू से ही गांधीवादी और हिंदुत्ववादी विचारधारा के बीच साफ विभाजन रहा है। यह विभाजन महज बोलचाल की भाषा में नहीं है। बातचीत और व्यवहार में भी अब साफ-साफ दिखाई देने लगा है। हिंदुत्ववादी धड़ा भीतरखाने शह पाकर अब खुल कर भाषा का, जाति का, नस्ल का शुद्धीकरण करने की जिस तरह की आक्रामक बातें सार्वजनिक तौर से कहने और तदनुरूप व्यवहार करने लगा है, यह सब एक दशक पहले तक अकल्पनीय था।

मीडिया, खासकर टीवी तथा सोशल मीडिया की मार्फत भाषायी स्तर पर हिंदी की समझ व्यापक तो बनी है, लेकिन इन माध्यमों में काम करने वाले, संस्कृति के सबसे बड़े स्रोत, उसके क्लासिकी हिंदी साहित्य से अछूते ही दिखते हैं। इसका प्रमाण हैं वे राज्य स्तरीय और अंतरराष्ट्रीय लिट फेस्ट जिनमें भारतीय भाषाओं-बोलियों के ऊपर बातचीत या उनकी किताबों की बिक्री या अनुवाद संभावनाओं पर चर्चा बस धैंय्या छूने के स्तर पर ही हो रही है। उसके स्टार स्पीकर्स भी ज्यादातर बॉलीवुड या विज्ञापन जगत या टीवी अथवा चर्चित पोर्टलों की नकलची वसुंधराओं के आत्ममुग्ध कवि, एंकर, अभिनेता, गायक निकलते हैं।

जब इस नैतिकता विमुख, परमुखापेक्षी, विदेश निवेशान्वेषी मंजर पर सोचें, तो एक बिंब कौंधता है : दांडी यात्रा का, रामधुन इकतारे पर गाते जन आगे, पीछे लाठी थामे बापू और उनकी जिद्दी लेकिन हंसमुख मंडली जिसमें सब हैं, गायक, संत, भिक्षु, विद्वान्, जिद्दी कवियित्री सरोजिनी नायडू, विचारक। सबको पता है नमक बनाते ही जेल जाना है। फिर भी वे प्रसन्न हैं। उनकी नियति उनकी नैतिकता ने लिख दी है। सहनशीलता, बुद्धि और अच्छाई में गहरे विश्वास के जो पदचिन्ह गांधी और उनकी ऐसी मंडली ने छोड़े हैं वे मानवीय नैतिकता के अनमोल दस्तावेज हैं। संजय, विदुर, कृपाचार्य, व्यास, वाल्मीकि, शबरी, यह सब पात्र गांधी में भी दिखते हैं, अपनी निर्लिप्तता, विवेक और गहरी मानवीयता समेत। वे सत्ता के लिए छेड़े गए हर खूनी युद्ध की भूमि से बाहर हैं। गांधी न कायर हैं, न महत्वाकांक्षी। अंतर्मन में शांति, विप्लव के प्रति उदासीनता ही उनको परिवार में बाहरिया, और परिवार से बहिष्कृत सभी बाहरियों के बीच उनका अपना वैष्णव जन बनाती है। यही गुण इस लेखिका जैसों को गहरी निराशा के इस अंधकार के बीच भी सहारा देता आया है, देता रहेगा।

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