9/11 आतंकवादी हमले के 20 वर्ष: पाक आईएसआई का हाथ होने के सबूतों के बाद भी क्यों आजतक डाला जा रहा पर्दा

9/11 यानी सितंबर महीने की 11 तारीख। यह वह तारीख है जो एक ऐतिहासिक और भयावह आतंकी हमले की याद दिलाती है। 20 साल हो गए अमेरिका पर हुए इस हमले को। भले ही इस हमले के मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन को मार दिया गया, लेकिन आज भी इस हमले से जुड़ी कुछ पहेलियां हैं जो अनसुलझी हैं।

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भारत डोगरा

11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुआ आतंकवादी हमला (जिसे संक्षेप में 9/11 कहा जाता है) उन ऐतिहासिक घटनाओं में है जो भविष्य को कई वर्षों तक प्रभावित करती हैं। विश्व के सभी शान्ति प्रिय लोगों ने एक होकर निर्दोष लोगों की इस जघन्य हत्या का विरोध किया। इसके बाद के समय में शान्ति आंदोलन से जुड़े लोगों ने इस बारे में भी निरंतर चिंता व्यक्त की है कि जिस तरह की जवाबी कार्यवाही अमेरिकी सरकार ने की है उससे शान्ति की संभावना तो क्या बढ़ेगी इसके विपरीत हिंसा (विशेषकर आतंकवादी हिंसा) की संभावना और बढ़ रही है।

9/11 व उसके बाद के घटनाक्रम के बारे में बढ़ती चिन्ता के साथ इस बारे में बेहतर समझ बनाना और भी जरूरी हो गया है कि 9/11 को ठीक-ठीक क्या हुआ था। यह इस कारण भी जरूरी है कि 9/11 के हमले से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाए हैं। इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण सवाल समय-समय पर उठाए गए हैं जिनमें से कुछ सवालों का संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है।

9/11 आतंकवादी हमले के 20 वर्ष: पाक आईएसआई का हाथ होने के सबूतों के बाद भी क्यों आजतक डाला जा रहा पर्दा
Robert Clark
  • संयुक्त राज्य अमेरिका के पास विश्व की सबसे बड़ी गुप्तचर व्यवस्था है जिसे सबसे अधिक संसाधन मिलते हैं, सबसे आधुनिक साज-समान मिलता है व सबसे बढ़िया प्रशिक्षण उपलब्ध है। इसकी पहुंच विश्व के लगभग हर स्थान तक है। अतः यह बहुत ही आश्चर्यजनक बात है कि इतनी बड़ी आतंकवादी कार्यवाही को रोका न जा सका, विशेषकर इस स्थिति में जब कई पूर्व चेतावनियां प्राप्त हो चुकी थीं।

  • व्हाईट हाऊस (अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय) के आतंकवाद-विरोधी मुख्य अधिकारी रिचर्ड क्लार्क ने 9/11 हमले के कुछ बाद हाईजैक किए गए वायुयानों के यात्रियों की सूची देखकर कहा था - “मैं तो स्तब्ध रह गया... कि इसमें तो अल कायदा के कार्यकर्ताओं के नाम थे व एफबीआई को पता भी है कि यह नाम अल कायदा के कार्यकर्ताओं के नाम हैं।”

  • ब्रिटेन में लेबर पार्टी के सांसद व भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री माईकल मीशर ने अपनी रिपोर्ट में आगे सवाल उठाया है कि अमेरिकी सरकार आम लोगों से 9/11 संबंधी कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज क्यों छिपा रही है, विशेषकर वे दस्तावेज जो गुप्तचर एजेंसियों की आतंकवादी हमला रोकने की विफलता से जुड़े हैं।


  • साइबल एडमंडस को तुर्की व मध्य पूर्व की भाषाओं के अनुवादक के रूप में एफबीआई ने नियुक्त किया था। उन्होंने ऐसी गुप्तचर जानकारी को दबाने के प्रयासों का पर्दाफाश करने का प्रयास किया, जिससे 9/11 के कुछ दोषी व्यक्तियों का पता चल सकता था। इस कारण न केवल उनकी नौकरी चली गई अपितु उनको ऐसे व्यक्ति या देश का नाम न बताने व अदालत में बयान देने से रोकने संबंधी विशेष आदेश भी दिए गए। फिर भी कुछ वक्तव्यों से जाहिर होता है कि उनके पास इस आशय के प्रमाण हैं कि 9/11 के हमलों की पूर्व चेतावनियां मिली थीं। उनका ऐसा बयान भी पहले प्रकाशित हुआ था कि यदि यही खोज की गई तो उच्च स्तर पर अपराधिक मुकदमे चलेंगे व “वे इसे (ऐसे तथ्यों को) छिपाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।”

  • फ्रांस के एक समाचार पत्र ले फिगारो में 31 अक्टूबर 2001 को प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया कि दुबई स्थित एक अमेरिकी अस्पताल में इसी वर्ष जुलाई में बिन लादेन ने इलाज करवाया था। उसके अस्पताल में रहने के दौरान एक सीआईए अधिकारी भी उसे मिला। जहां एक ओर बिन लादेन को ‘मोस्ट वांटेड’ अपराधी घोषित किया जा रहा था, वहां दूसरी ओर दस दिन तक इस अस्पताल में उसकी उपस्थिति के दौरान उसे गिरफ्तार करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

  • इसी रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया, “अरब राजनयिक स्रोतों व फ्रांस के गुप्तचर स्रोतों के अनुसार सीआईए को अमेरिकी ठिकानों पर अमेरिका में व अमेरिका के बाहर आतंकवादी हमलों संबंधी बहुत विशिष्ट जानकारी दी गई थी।”

  • 9/11 के कुछ हाईजैकर पहले से उनके आतंकवादी होने के संदेह के कारण अमेरिकी एजेंसियों की निगरानी में थे पर इसके बावजूद वे काफी स्वतंत्रता से यात्राएं कर सके व अंत में अपनी बेहद हिंसक योजना को भी क्रियान्वित कर सके।

  • कई विशेषज्ञों ने यह राय दी है कि 9/11 जितना बड़ा आतंकवादी हमला किसी विदेशी सरकार या गुप्तचर एजेंसी की सक्रिय भागेदारी या समर्थन के बिना नहीं हो सकता था।

  • अमेरिका में इटेलीजेंस पर सीनेट सीलेक्ट कमेटी के अध्यक्ष सेनेटर बाब ग्राहम ने कहा, “मेरे ख्याल में बहुत विश्वसनीय प्रमाण हैं कि कम से कम कुछ आतंकवादियों को एक सर्वप्रभुता सम्पन्न विदेशी सरकार की मदद मिली थी, व यह मदद मात्र धन तक सीमित नहीं थी।”

  • पश्चिमी जर्मनी की गुप्तचर एजेंसी के भूतपूर्व समन्वयक होस्ट एमके ने कहा, “आतंकवादी चार हाईजैक किए वायुयानों का ऐसा आप्रेशन किसी सीक्रेट सर्विस के सहयोग के बिना नहीं कर सकते थे।”

  • आईएसआई के तत्कालीन प्रमुख अधिकारी लेफ्टीनेंट जनरल महमूद अहमद ने उमर शेख नामक उग्रवादी के माध्यम से 9/11 हमले से पहले इसके मुख्य हाईजैकर मोहम्मद अता को एक लाख डालर भिजवाए थे। जब अमेरिकी समाचार पत्र वाल स्ट्रीट जर्नल ने इसका पर्दाफाश किया तो अहमद को आईएसआई के प्रमुख अधिकारी के पद से हटा दिया गया।

  • टाईम्स ऑफ इंडिया ने अगस्त 1, 2003 को समाचार प्रकाशित किया- एफबीआई के एक उच्च आतंकवाद विरोधी अधिकारी (जान एस. पिस्टोल) ने अमेरिकी सीनेट की सरकारी मामलों की समिति को बताया कि जांचकर्ताओं ने 9/11 के हमले की धन-प्राप्ति के स्रोत को पाकिस्तान के वित्तीय खातों तक ढूंढ लिया है।


  • इस संदर्भ में यह भी काफी महत्वपूर्ण है कि 9/11 के हमले के समय आईएसआई प्रमुख महमूद अहमद स्वयं संयुक्त राज्य अमेरिका में थे। वह वहां 4 सितंबर को पहुंच गए। उन्होंने सितंबर 11 से पहले सीआईए व पेंटागन के उच्च अधिकारियों से बातचीत की। सितंबर 12 व 13 को उन्होंने उपविदेश मंत्री से बातचीत की।

  • वाल स्ट्रीट जनरल के रिपोर्टर डेनियल पर्ल का 2002 में पाकिस्तान में अपहरण करने के बाद उनकी क्रूरतापूर्ण तरीके से हत्या कर दी गई। गार्जियन समाचार पत्र (जुलाई 22, 2004) में छपा है-यह सुना गया है कि पर्ल आईएसआई-सीआईए संबंधों की छानबीन कर रहे थे।

  • इस हत्या के लिए उमर शेख को मौत की सजा सुनाई गई। यह वही उमर शेख है जिसके माध्यम से आईएसआई मुखिया ने 9/11 के हाईजैकरों को एक लाख डालर भिजवाए थे।

  • किन्तु अक्टूबर 22, 2003 को न्यूयार्क टाईम्स ने यह समाचार प्रकाशित किया - “अमेरिकी अधिकारियों ने बताया है कि डेनियल पर्ल की हत्या स्वयं खलीद शेख मुहम्मद ने की, जो पहले अल कायदा का आप्रेशनल कमांडर था।... अन्य अधिकारियों ने बताया कि उस पर अमेरिकी अदालत में मुकदमा चलाने की संभावना नहीं है क्योंकि इससे गोपनीय जानकारी सामने आ सकती है।”

  • 9/11 के हमले के शीघ्र बाद पता चल गया कि आईएसआई प्रमुख जनरल अहमद ने मुख्य हाईजैकर को एक लाख डालर भिजवाए थे। इतने बड़े आरोप से हड़कंप मच जाना चाहिए था। अमेरिका का पाकिस्तान के प्रति बहुत आक्रमक रुख होने की पूरी संभावना थी। कम से कम इस मामले में अहमद पर मुकदमा चलाने के लिए तो पाकिस्तान पर दबाव पड़ना ही चाहिए था। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। पाक-अमेरिका संबंधों की, उनकी गुप्तचर एजेंसियों की घनिष्ठता बनी रही।

  • पाकिस्तान के अणु बम के जनक डा. कादिर खान पर अणु शस्त्रों की जानकारी व उपकरणों का ‘सुपरबाजार’ जैसा चलाने का आरोप था व उन्होंने महत्वपूर्ण जानकारी लीबिया, ईरान व उत्तरी कोरिया जैसे देशों को दी थी जिनसे अमेरिका की खास शत्रुता रही है पर डॉ खान संबंधी यह तथ्य उजागर होने पर भी अमेरिका व पाकिस्तान की, उनके रक्षा व गुप्तचर विभागों की घनिष्ठता बनी रही।

  • स्पष्ट है कि 9/11 हमले के, इसके पहले व बाद के संबंधित घटनाक्रम में कई रहस्य छिपे हुए हैं व कई तथ्य हैं जो सरकारी तौर पर मान्य 9/11 के विवरण से मेल नहीं रखते हैं। अतः आज भी सच्चाई को सामले लाना महत्त्वपूर्ण बना हुआ है।

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