महिला सांसदों को भी नहीं मिलती पर्याप्त सुविधाएं, आधी आबादी की हालत पूरी दुनिया में एक जैसी
जापान की महिला सांसदों ने वहां के संसद भवन में अधिक संख्या में महिला शौचालयों की मांग की है। वहां के निचले सदन की 58 महिला सांसदों, जिनमें जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री साने टाकिची भी शामिल हैं, ने एक पत्र के जरिये अधिक महिला शौचालयों के मांग की है।

भारत समेत पूरी दुनिया में महिला सशक्तीकरण पर खूब चर्चा की जाती है और राजनीति में उनकी संख्या बढ़ाने पर भाषण दिए जाते हैं। पर, सतही हालात बिलकुल अलग हैं, हमारे देश में महिला सांसदों की संख्या इस दौर में पिछले चुनावों से भी कम हो गई है। जो गिनी-चुनी महिला सांसद संसद में हैं भी उन्होंने महिलाओं के सशक्तीकरण का शायद ही कभी कोई मुद्दा उठाया हो। प्रधानमंत्री मोदी हरेक मौके पर महिलाओं के मसीहा होने का स्वांग रचते हैं और दूसरी तरफ महिलाओं के वोट की कीमत उनके खातों में पहुंचाते हैं।
बड़े जोरशोर और प्रचार के साथ संसद और राज्य की विधानसभाओं में महिला आरक्षण का बिल पास कराया गया, और अब इसकी कोई चर्चा भी नहीं होती। बीजेपी के बलात्कार के आरोपी नेता आजाद घूमते हैं, नेता सार्वजनिक मंच से कभी जम्मू-कश्मीर की महिलाओं तो कभी बिहार की महिलाओं की कीमत तय करते हैं, महिलाओं पर ओछे वक्तव्य सार्वजनिक तौर पर देते हैं, बलात्कार और हत्या के बाद भी पकड़े नहीं जाते– पर हमारे प्रधानमंत्री जी और गृह मंत्री बिल्कुल खामोश रहते हैं। पर इन्हीं लोगों की जुबान विपक्षी राज्यों में ऐसी ही घटनाओं पर कैंची की तरह चलती है।
महिलाओं की स्थिति पूरी दुनिया में ऐसी ही है। महिलाओं की संख्या संसद और स्थानीय निकायों में बढ़ती जा रही है पर महिलाओं की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। हमारे देश में तो सत्ता से जुड़ी महिला सांसद ही सबसे पहले तमाम अपराध पीड़िताओं पर, उनके चरित्र पर और उनके कपड़ों पर निहायत ही भद्दे वक्तव्य देती हैं। महिलाओं की स्थिति और सुविधाओं से जुड़ी एक खबर जापान से भी आई है।
जापान की महिला सांसदों ने वहां के संसद भवन, जिसे डाइट कहते हैं, में अधिक संख्या में महिला शौचालयों की मांग की है। वहां के निचले सदन की 58 महिला सांसदों, जिनमें जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री साने टाकिची भी शामिल हैं, ने एक पत्र के माध्यम से अधिक महिला शौचालयों के मांग की है। इन सांसदों में प्रधानमंत्री के अतिरिक्त सभी पक्षी-विपक्षी दलों की महिलाएं शामिल हैं। जापान में परंपरागत तौर पर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है, पर पिछले चुनावों में निचले सदन में 73 महिलाएं चुनाव जीत कर आईं। संसद में अधिवेशन स्थल के नजदीक महिलाओं के लिए केवल एक शौचालय है, जिसमें महज दो चैम्बर हैं। जाहिर है, 73 महिला सांसदों के लिए यह सुविधा नगण्य है।
जापान में परंपरागत तौर पर राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व रहा है, पर पिछले चुनावों में यह स्थिति थोड़ी बदल गई। इन चुनावों में 73 महिला सांसदों की जीत के बाद संसद भवन के महिला संबंधी सुविधाओं की कमी की ओर ध्यान जाना शुरू हुआ और महिला शौचालय जैसी आवश्यक सुविधा का भी अभाव दिखा। महिला सांसदों ने अपना मांगपत्र निचले सदन में प्रशासन के लिए जिम्मेदार यसुकूजू हमादा को सौंपा है जिन्होंने इस पर जल्दी निर्णय लेने का आश्वासन दिया है। विपक्षी कान्स्टिटूशनल डेमक्रैटिक पार्टी की संसद सदस्य यसूको कॉमियामा ने बताया है कि संसद का जब अधिवेशन चलता है तब हरेक सत्र से पहले एकलौते महिला शौचालय के बाहर महिला सांसदों की लंबी कतार लग जाती है।
जापान का संसद भवन 1936 में बना था और तब वहां राजनीति में महिलाओं की भागीदारी प्रतिबंधित थी। वर्ष 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के पराजय के बाद महिलाओं को पहली बार मतदान का अधिकार दिया गया। वर्ष 2025 में जापान को पहली महिला प्रधानमंत्री, साने टाकिची, के तौर पर मिलीं। किसी भी विकसित और बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों की तुलना में वैश्विक जेन्डर गैप इंडेक्स में जापान सबसे नीचे रहता है, वर्ष 2025 में कुल 148 देशों में जापान का स्थान 118वां था। जापान में इस समय संसद के निचले सदन में कुल 465 सांसदों में से 72 महिला सांसद हैं, जबकि उच्च सदन में महिलाओं की स्थिति कुछ बेहतर है- इसमें कुल 248 सदस्यों में से 74 महिलाएं हैं। पिछले संसद में निचले सदन में महिलाओं की संख्या केवल 45 थी। जापान में व्यापार, उद्योग और मीडिया में भी महिलाओं की भागीदारी वैश्विक स्तर से कम है।
प्रधानमंत्री साने टाकिची ने महिलाओं की स्थिति बेहतर करने का ऐलान किया है, पर उनकी विचारधारा भी कुछ हद तक दकियानूसी है। उन्होंने शादी के बाद महिलाओं को अपने पति का सरनेम अपनाने वाले कानून का समर्थन किया है और हाल में ही राजशाही द्वारा केवल पुत्रों को ही उत्तराधिकारी घोषित करने की परंपरा का भी समर्थन किया है। हालांकि प्रधानमंत्री संसद में महिलाओं की 30 प्रतिशत भागीदारी की वकालत करती हैं और लैंगिक समानता के संदर्भ में यूरोप के देशों के स्तर तक पहुंचाने की बात करती हैं। दूसरी तरफ उनके 19 सदस्यीय मंत्रिमंडल में महज 2 महिलाएं हैं।
इन्टर-पार्लियामेंटरी यूनियन की रिपोर्ट, वुमन इन पार्लियामेंट 1995-2025 के अनुसार जापान में वर्ष 1995 में कुल सांसदों में से महज 2.7 प्रतिशत महिलाएं थीं, जबकि भारत में यह संख्या 7.2 प्रतिशत थी। पर, 2025 में यह स्थिति बदल गई- जापान में 15.7 प्रतिशत सांसद महिलाएं थीं जबकि भारत में इनकी संख्या 13.8 प्रतिशत ही है। एशिया के सभी देशों को मिलाकर महिला सांसदों का औसत 21.1 प्रतिशत है, यानि भारत और जापान दोनों ही देश इस औसत से भी बहुत नीचे हैं। महिला सांसदों की संख्या के अनुसार, जापान 103वें स्थान पर है जबकि भारत 136वें स्थान पर है।
इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1995 में वैश्विक स्तर पर महिला सांसदों की संख्या 11.3 प्रतिशत थी, पर वर्ष 2025 तक यह संख्या 27.2 प्रतिशत तक पहुंच गई। वर्ष 1995 में कोई देश ऐसा नहीं था जहां महिला सांसदों की संख्या 50 प्रतिशत या अधिक थी, पर 2025 में ऐसे देशों की संख्या 6 है। सबसे अधिक 63.8 प्रतिशत महिला सांसद चाड में हैं, इसके बाद क्यूबा में 55.7 प्रतिशत, निकारागुआ में 55 प्रतिशत, मेक्सिको में 50.2 प्रतिशत, एंडोरा में 50 प्रतिशत और यूनाइटेड अरब एमिरात में भी 50 प्रतिशत है।
दुनिया के 71 देशों में महिला सांसदों की संख्या 30 प्रतिशत से भी कम है, इनमें से 20 देशों में यह संख्या 10 प्रतिशत से भी कम है और तीन देशों में संसद में एक भी महिला सदस्य नहीं है। वर्ष 1995 में संसद में अध्यक्ष पद संभालने वाली 10.5 प्रतिशत महिलां थीं जबकि वर्ष 2025 तक यह संख्या 23.7 प्रतिशत तक पहुंच गई।
हमारा देश जेन्डर गैप इंडेक्स में कुल 148 देशों में 131वें स्थान पर है। यहां भाषणों से लैंगिक समानता को बढ़ाया जाता है। पर, जापान की घटना से इतना तो समझ में आता है कि महिलाओं के लिए सामान्य सुविधाओं की कमी हरेक स्तर पर और हरेक देश में है।
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