हर तख्ती कुछ कहती है, उसे कान लगाकर सुना जाए
डरा हुआ व्यक्ति, डरी हुई शासन व्यवस्था को भेदभावकारी तख्तियों का आसरा लेना पड़ता है!

दिल्ली लाल किला के आतंकवादी हमले के बाद बड़े ही उत्कृष्ट ज्ञान केन्द्र में एक तख्ती लगाई गई। भारतीय सांख्यिकी संस्था की स्थापना 1931 में हुई। महालानोनिस उसके संचालक हुए। चूंकि हर वृद्धि की आधारशिला में अंक निहित है, तो संस्था को आजाद भारत में बेहद गंभीरता से स्वायत्तता दी गई। गहन अनुसंधान केन्द्र के रूप में वह पोषित किया गया। बिहार चुनाव परिणाम की सुर्खियों तले यह दब गया कि परिसर की तख्ती किस ओर इंगित करती है। लोकतंत्र में कोई भी दल चुनाव में निर्वाचित हो, पर यदि मानवीयता समाप्त हो जाए तो राष्ट्र राज्य के आगे देश झुक जाता है, हार जाता है। हारे हुए देश में राष्ट्र राज्य का कोई भविष्य नहीं रह जाता। सनद रहे कि देश ज्यादा पुराना है, हजारों साल का राही।
आखिर उस तख्ती में क्या लिखा था, क्या लिखवाया गया? अल्पसंख्यक समुदाय के खास एक वर्ग और कुत्तों का प्रवेश निषेध बताता बोर्ड हमारी सामूहिक हार और गुलामी का प्रतीक है। आजाद कौम किसी का निषेध नहीं करती।
स्वराज के लिए खुद को होम करने वाले महात्मा यह मानते थे कि किसी आजाद मुल्क की पहचान के कुछ पैमाने हैं। उस मुल्क में जानवरों के साथ क्या सुलूक होता है, उनमें से एक है। गोया कि इन दिनों सीसीटीवी लगे मुहल्लों में घरेलू कामगारों की स्थिति तो उनके पालतू पशुओं से ज्यादा दोयम है। पर यह तख्ती अपनेआप में अपवाद नहीं है। कुछ ही दिनों पहले ऐसी कुछ और तख्तियां पढ़ने को मिलीं। उनमें से एक के शब्द थे- “चमड़े का सामान, महिलाएं, मांसाहारी और नीची जाति के लोगों का प्रवेश वर्जित है।”
बोर्ड बहुत कुछ कहते हैं। क्या आश्चर्य कि कांवड़ के समय मजहब सूचक बोर्ड लगाने को कहा जाता है। अक्सर मजहब के खुले भेद पर कम-से-कम थोड़ी बहस होती है। मगर आहार, वस्तुओं की तख्तियां उससे ज्यादा गहरे हजारों साल के वीभत्स भेद की ओर इशारा करती हैं। उसका कई बार संज्ञान तक नहीं लिया जाता। यह एहसास नहीं होता कि असल हमला हाशिये पर खड़े समुदाय पर है। पितृसत्ता के वाहन में सवार वर्ण व्यवस्था को पुनरस्थापित करने की कवायद।
इनमें से किसी बोर्ड पर कोई आपत्ति नहीं करता। प्रभुत्व सम्पन्न वर्ग तो बिल्कुल नहीं। आपत्ति दर्ज होती भी है तो वह केवल पीड़ित पक्ष की ओर से होती है। तो क्या सामाजिक समता मात्र उसी समुदाय की जरूरत है। तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग का व्यवहार ठीक वैसा देखा गया है जैसा कि सड़क हादसे के बाद घायल को तड़पता छोड़कर तेज रफ्तार से गाड़ी का कांच चढ़ाकर निकला जाता है।
ऐसी एक और तख्ती सैन्य परिसर में देखी गई। इसके पहले यह तो लिखा जाता था कि अनाधिकृत प्रवेश वर्जित है और ऐसा करने वाले को दंडित किया जाएगा। अब यह लिखा गया: अनाधिकृत प्रवेश पर गोली दागी जाएगी। अंग्रेजी में “ट्रेसपासर्स वुड बी शॉट” ।
कितने भयाक्रांत परिसर होंगे कि किसी को भी गोली मारना चाहेंगे। अक्सर डराने की कोशिश वही करते है, जो खुद डरे हुए हों। इस तरह कोई विश्व गुरु नहीं हो सकता। आजादी के तुरंत बाद सैन्य खर्च को सीमित रखने के लिए पहले प्रधानमंत्री की बड़ी आलोचना होती है। मगर क्या वह उस वक्त की सत्ता की निडरता का परिचायक नहीं? वह भी राष्ट्र के शैशव काल में यह दृष्टि स्वराज के कितने करीब है।
अब तो छप्पन इंच का सीना है, मगर भयभीत। इन सब बोर्ड पर सोचते समय 200 ईसा पूर्व की शिला तख्तियां याद हो आईं। शुरुआती दौर में अंग्रेज पुरातत्वविदों ने उनका अन्वेषण किया। भाषाविदों ने भाषा समझी और उस बिसर गए सम्राट की लोकमानस को फिर याद दिलाई। जाहिर है कि वह शिला तख्तियां लिखाई के पहले पहल प्रमाण हैं। वह जो पढ़ी जा सकी हैं, क्योंकि हड़प्पा की मुहरें पढ़ी नहीं जा सकी हैं। उस जमाने में शिलालेख राजाज्ञा से खुदवाए गए। सरकारी परिपत्र या बोर्ड के समतुल्य।
लेख से काफी कुछ पता चलता है। किसी में इलाज-उपचार की व्यवस्था, राहगीरों के लिए सरायखने, तो किसी में पशुओं के प्रति व्यवहार, कैदियों से सुलूक, शिक्षा , युद्धबंदी आदि कई विषय हैं। शिलालेख 12 के अनुसार “जो अपने मत की प्रशंसा कर, अन्य को कमतर बताने की कोशिश करते हैं। वे दरअसल अपने ही मत की हानि करते हैं। इसलिए समवय (समन्वय) सबसे अच्छी नीति है”।
यह देवनामपिय सम्राट अशोक के शिलालेख या बोर्ड है। कहते हैं कि वह पहले बेहद क्रूर शासक था। कलिंग की लड़ाई में हुए नरसंहार के बाद उसने रक्तपात को देख, बौद्ध मार्ग अपनाया। धम्म विजय को असल विस्तार माना। उसका प्रमाण भी है। उन्हीं के एक अन्य शिलालेख में उस युद्ध के बाद हुए हृदय संताप का ज़िक्र है। सम्राट अशोक का साम्राज्य बहुत फैला हुआ था। सुदूर दक्षिण के पाण्ड्य, चोल केरलपुत्ता को उनके शिलालेख सीमावर्ती बताते हैं। उत्तर पश्चिम में बैक्ट्रिया को पड़ोसी। सो काफी दूर तक संस्थापित शासन रहा होगा।
सवाल यह है कि वह खुद निर्भीक, आजाद कब हुए होंगे। जब खूनी क्षेत्र विस्तार कर रहे थे या तब जब समवय उनका सिद्धांत हुआ। जब विश्वगुरु बनाया, तब उनकी शासकीय तख्तियां क्या कह रही थीं।
यह कहा जा सकता है कि आज की तख्तियों को सरकार की मंजूरी नहीं है। पर उन्हें पाबंद भी नहीं किया गया है। जबकि इस सरकार को पाबंद करना बखूबी आता है। डरा हुआ व्यक्ति, डरी हुई शासन व्यवस्था को भेदभावकारी तख्तियों का आसरा लेना पड़ता है। आजाद मुल्क अपने ही लोगों में भेद नहीं करता। उन पर गोली चलाने का बहाना नहीं खोजता। विश्व गुरु होते समय याद रखा जाए कि सबसे कमजोर को किस तरह व्यवस्था में प्रवेश मिलता है। कलेक्टर नाम की तख्ती पढ़ते ही क्या हाथ जोड़कर गर्दन नीची करके तो नहीं जाते। कुर्सी पर बैठते हैं या खड़े रहते हैं। यह सब मात्र एक तख्ती से हो रहा है। इसको शासन का विधान कहकर महिमा मंडित किया जाता है, जबकि यह गुलामी की उद्घोषणा है। गुलाम मानसिकता में चुनाव के नतीजे मायने नहीं रखते। आजाद मुल्क में कोई भी जीते, जनतंत्र खड़ा होता है। गुलामी में लोकतंत्र रोज हारता है।
अशोक के शिलालेख यह भी बताते हैं कि राजशाही में हर कदम मेहरबानी है। राजा की देन, कोई हक नहीं। हर पल पूछना चाहिए कि यदि शासन की मेहरबानी हावी है, तो वह क्या तंत्र कहलाता है। चुनाव आयोग की तख्ती अब क्या पुष्ट कर रही है। हम अब जनप्रतिनिधि चुन रहे हैं या शासक? हर बोर्ड, परिपत्र आदेश तख्ती और तमगा कुछ कहता है। उसे कान लगाकर सुना जाए।
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