दलितों का वोट तो सबको चाहिए, लेकिन दलित क्या चाहते हैं इसे भी समझना होगा

उत्तर प्रदेश में करीब 65 दलित जातियां हैं और हर जिले में निरपवाद रूप से 20 से अधिक दलित जातियों की मौजूदगी है। लेकिन अच्छी खासी संख्या होने के बावजूद अधिकतर दलित भूमिहीन हैं। एक टुकड़ा जमीन की चाहत दलित मानस के केंद्र में है।

फोटोः सोशल मीडिया
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बद्री नारायण

उत्तर प्रदेश में करीब 65 दलित जातियां अनुसूचित जाति की श्रेणी में आती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में इनकी आबादी करीब 16 फीसदी से लेकर अधिकतम 40 फीसदी तक हो सकती है। हर जिले में निरपवाद रूप से 20 से अधिक दलित जातियों की मौजूदगी है। इनमें जाटव सबसे बड़ा सामाजिक समूह है, जो दलित आबादी का आधे से ज्यादा हिस्सा है। गांवों में पासी दूसरा बड़ा समुदाय है। लेकिन अच्छी खासी संख्या के बावजूद अधिकतर दलित भूमिहीन हैं। एक टुकड़ा जमीन की आकांक्षा दलित मानस के केंद्र में है।

दलितों के बीच में जमीन की आकांक्षा कोई भी भारत के दूसरे राज्यों में भी तलाश सकता है। कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के शासन के दौरान अपने प्रसिद्ध 20 सूत्री कार्यक्रम में दलितों को जमीन देने का वादा किया था, लेकिन इस वादे को अभी भी पूरा किया जाना है। दूसरा मुख्य कारक, जो कि दलितों की आकांक्षा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, वह है कि वे अपनी चिंताजनक स्थिति से बाहर निकलना और आजीविका हासिल करना चाहते हैं।

अधिकतर दलित समुदायों के पास परंपरागत जाति-आधारित व्यावसायिक हुनर था। बनसोर के पास बांस के कार्य का हुनर है। मुसहर महुआ के पत्ते से सुंदर पत्तल बनाना जानते हैं। डोम भी बांस आधारित शिल्प जानते हैं। इसी तरह बहुत सारे समुदायों के पास अपना कलात्मक कौशल है, जो परंपरागत समाज में उनकी आजीविका का स्रोत था।

आधुनिकता के कारण उनके परंपरागत व्यवसाय खत्म होने के कगार पर हैं और नई बाजार अर्थव्यवस्था में उन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में मात्र श्रमिक बनने के लिए हाशिये पर धकेल दिया गया है। बहुत सारे दलित समुदायों में अपने परंपरागत शिल्प व्यवसाय को आधुनिक रूप में पुनरुद्धार करने की तीव्र इच्छा है। इसके लिए खादी भंडार मॉडल एक रूप हो सकता है।

दलित समुदाय सदियों से भारतीय समाज की जाति व्यवस्था में सबसे ज्यादा पीड़ित रहे। बाबा साहेब आंबेडकर ने दलितों की मुक्ति के लिए जाति के विनाश का प्रस्ताव किया था। उन्होंने इसके लिए अंतरजातीय विवाह को एक तरीके के रूप में प्रोत्साहित करने की भी पेशकश की थी। इसलिए बहुत से शिक्षित और शहरी दलितों में यह आकांक्षा है कि सरकार को अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देना और प्रोत्साहित करना चाहिए।

दलित खासकर शिक्षित दलित भारतीय संविधान के प्रति बहुत ज्यादा हिफाजती हैं। वे संविधान के साथ भावनात्मक लगाव महसूस करते हैं, क्योंकि इसे आंबेडकर ने बनाया। दूसरा, संविधान उन्हें अत्याचारों और दमन से राहत देता है। दमन और अत्याचारों से मुक्ति के लिए वे संविधान को एक औजार के रूप में देखते हैं।

यही कारण है कि बहुत सारे शिक्षित दलित नई सरकार से, 2019 के बाद जो भी आए, आकांक्षा रखते हैं कि प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में प्रार्थना के समय संविधान की प्रस्तावना का सार्वजनिक पाठ जरूरी कर दिया जाए। वे चाहते हैं कि नई सरकार और राज्य को आरक्षण के प्रावधान में कोई भी कटौती नहीं करनी चाहिए। विभिन्न राज्यों में उच्च और मध्य जातियों द्वारा दलितों पर किए जाने वाले अत्याचारों पर दलितों का एक हिस्सा अपनी आक्रामक शिकायत दर्ज कराता है।

वे चाहते हैं कि इस तरह के अत्याचारों के खिलाफ राज्य मजबूत हस्तक्षेप करे। बहुत से दलितों की चाहत है कि राज्य और नई सरकार को ऐसी स्थिति बनानी चाहिए जिसमें उन्हें अदालतों से शीघ्र न्याय मिल सके। जैसा कि हम जानते हैं कि हाशिये के लोगों, गरीबों और दलितों के कमजोर हिस्से को अदालत से न्याय मिलने में बहुत ज्यादा वक्त लगता है।

उत्तर प्रदेश में 40 से अधिक दलित समुदाय हैं, जो अभी तक अपने समुदाय का नेता पैदा करने में सक्षम नहीं हैं। इन समुदायों की कोई राजनीतिक भागीदारी नहीं है। उनका अपना सांसद, विधायक नहीं है। इनमें से कई के पास अपनी जाति से प्रधान भी नहीं है। लोकतंत्र उन तक नहीं पहुंचता है, क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जो इस तरह के समुदायों के बीच लोकतंत्र के फलों को वितरित कर सके।

लिहाजा, इस तरह के समुदाय हमारी राजनीतिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक राज्य से चाहते हैं कि वह लोकतांत्रिक राजनीतिक क्षेत्र में उनके लिए जगह मुहैया कराए। यह जानना दिलचस्प है कि इन समुदायों में बहुत से मायावती और बीएसपी को वोट नहीं देते हैं। बीएसपी भी अभी तक उन तक नहीं पहुंची है। इनमें से बहुतों ने 2014 के आम चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में बीजेपी के उम्मीदवारों को वोट दिया था। इनमें से कुछ बीजेपी से संतुष्ट नहीं दिखाई देते हैं और नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में हैं। हम उन्हें अदृश्य और बहुत ही ज्यादा हाशिये के दलित समुदाय कहते हैं।

एक और तीव्र इच्छा जो मुझे दलितों के बीच महसूस हुई, वह है धार्मिक स्थान और धार्मिक समानता की चाहत। अगर कोई उत्तर प्रदेश के भीतरी हिस्सों और हिंदी क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में दलित टोलों में जाता है, तो यह देख सकता है कि दलित समुदाय अपने स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा पीपल या नीम के पेड़ के नीचे या चबूतरे पर करते हैं।

इन गांवों में दलित चाहते हैं कि उनके देवी-देवताओं के लिए एक निश्चित स्थान हो। उनके लिए मंदिर की जगह केवल धार्मिक जगह नहीं है, बल्कि सामाजिक रूप से इकट्ठा होने की है, जो उन्हें अपनी पहचान का अनुभव कराता है। दलित, हिंदू समुदाय के मुख्यधारा के देवी-देवताओं के मंदिर में भी प्रवेश चाहते हैं। कोई भी धार्मिक अलगाव उन्हें तकलीफ पहुंचाता है।

मैं चुनाव के समय में इन दलित इच्छाओं पर विमर्श इस उम्मीद से कर रहा हूं कि राजनीतिक दल इन इच्छाओं को अपने चुनावी घोषणापत्र या चुनावी एजेंडा में कुछ प्रतिनिधित्व देंगे। ये आकांक्षाएं गरीबी से निकली हैं और सरकारी मदद की योजनाएं जैसे पेंशन योजना आदि का इंतजार कर रही हैं। ये मांगें दलित समुदायों के एक व्यापक हिस्से की हैं। ये इनकी इच्छाएं हैं जिन्हें मैंने बस एकत्रित किया है। मुझे हिंदी के प्रसिद्ध कवि अरुण कमल की एक कविता की एक पंक्ति याद आ रही है-

सारा लोहा उनका, अपनी केवल धार।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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