तिब्बत और चीन को लेकर पंडित नेहरू पर टिप्पणी पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह की अज्ञानता का प्रमाण

हाल पूर्व सेनाध्यक्ष और मोदी सरकार में मंत्री जनरल वी के सिंह ने तिब्बत और चीन के संदर्भ में पंडित जवाहर लाल नेहरू पर जो टिप्पणी की है, वह उनकी इतिहास की अज्ञानता का प्रमाण है। वे सेनाध्यक्ष रहे हैं ऐसे में सामरिक मुद्दों पर उनकी नासमझी चिंताजनक है।

फोटो : सोशल मीडिया
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अरुण शर्मा

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संपर्क विभाग, गुरुग्राम की तरफ से आयोजित अखंड भारत संकल्प दिवस (इसका चाहे जो भी मतलब होता हो) के उपलक्ष्य में 14 अगस्त को आयोजित वेबिनार में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्यमंत्री जनरल (रिटायर्ड) वीके सिंह ने आरोप लगाया कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी अहिंसावादी छवि को चमकाने के चक्कर में चीन को तिब्बत सौंप दिया। इससे तिब्बत से सदियों पुराने हमारे रिश्ते बिगड़ गए। इस बारे में हिंदी अखबार दैनिक जागरण की खबर के मुताबिक, अन्य बातों के अलावा उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान केंद्र सरकार चीन के सामने मजबूती के साथ अपना पक्ष रख रही है।

कुछ ही साल पहले उन्होंने जिस राजनीतिक दल में प्रवेश पायाहै, उसके कर्तव्यनिष्ठ सदस्य के तौर पर दिए गए उनके बयान पर मुझे कुछ नहीं कहना है। नेहरू की छवि को बिगाड़ने की भाजपा-आरएसएस की सत्तर साल की विफल कोशिश में वह अपनी भागीदारी कर रहे थे। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि सिंह पूर्व जनरल और भारतीय सेना के प्रमुख रहे हैं, इसलिए मुझे लगा कि वह तिब्बत के सवाल को बेहतर समझते होंगे। लेकिन सिंह के भाषण में तथ्यात्मक गलतियां थीं।

सबसे पहले, जैसा कि सिंह ने दावा किया, तिब्बत कोई आजाद देश नहीं था। इसका किसी देश के साथ राजनयिक संबंध नहीं था, वह विशेषाधिकार जिसका सभी स्वायत्त और स्वतंत्र देश उपयोग करते हैं। तिब्बत का कोई अंतरराष्ट्रीय अस्तित्व नहीं था। 1911 में चीनी सत्ता के पराभव के बाद इसने छोटा-सा वस्तुतः स्वतंत्र दर्जा हासिल कर लिया था। उस वक्त भारत में ब्रिटिश शासन था और उसने ‘औपचारिक चीनी आधित्य के अंतर्गत’ तिब्बत की वस्तुतः स्वतंत्रता की पुष्टि करने की कोशिश की। 1943 में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव रखा कि दूसरे देशों के साथ राजनयिक प्रतिनिधित्व के आदान-प्रदान के तिब्बत के अधिकार की अनुशंसा की जानी चाहिए। लेकिन अमेरिकियों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दियाः ’अमेरिकी सरकार इस मत की है कि चीन सरकार ने लंबे समय से तिब्बत पर आधिपत्य का दावा किया है और चीनी संविधान चीनी गणतंत्र के क्षेत्र के घटक वाले क्षेत्रों में तिब्बत को शामिल करता है। इस सरकार ने किसी भी वक्त इन दावों को लेकर कभी भी सवाल नहीं उठाए।’ (इंडियाज चाइना वॉर में नेविले मैक्सवेल द्वारा उद्धृत, 1963)

नेहरू इस स्थिति से अवगत थे जिसे उन्होंने देश के सामने और संसद के बाहर भी बार-बार रखा। उन्होंने कहा थाः ’यह साफ था कि चीन तिब्बत पर अपनी सत्ता स्थापित करेगा। यह सैकड़ों वर्षों से चीन की नीति रही थी और अब जबकि मजबूत चीनी सरकार बन गई है, इस नीति को निस्संदेह अमल में ला दिया गया है। हम इसे किसी भी तरह नहीं रोक सकते थे और निस्संदेह हमारे पास ऐसा प्रयास करने का कोई वैधानिक औचित्य भी नहीं था। हम सिर्फ यह आशा कर सकते थे कि चीनी आधिपत्य के अंतर्गत तिब्बत को स्वायत्तता-जैसी चीज मिल जाए। (1 जुलाई, 1954 को नेहरू का मुख्यमंत्रियों को लिखा पत्र)

सिंह का यह बयान भी असत्य और भ्रामक है कि भारत ने तिब्बत में सेना की तीन कंपनियां रखी हुई थीं और जवाहरलाल नेहरू के कमजोर राजनीतिक संकल्प के कारण हम चीन के सामने खड़े नहीं हो सके। भारतीय सैन्य टुकड़ी निश्चित तौर पर तिब्बत में चीनियों के खिलाफ अपनी सुरक्षा के लिए तैनात नहीं थी। यहां यह स्पष्ट किया जा सकता है कि ब्रिटिश सरकार को यातुंग और गायन्टेज में अपने व्यापार अधिकारियों को छोटे सैन्य सुरक्षा रखने का अधिकार हासिल था। उन लोगों ने अपने व्यापारिक केंद्रों में संपर्क बनाए रखने के लिए टेलीग्राफ और फोन सेवाओं की भी व्यवस्था की थी। लेकिन ये अधिकार और सुविधाएं ब्रिटेन के चीन के साथ संबंधों के तहत हासिल थे। अपने स्वभाव के अनुरूप नेहरू ने इस बारे में भी बता दिया था। उन्होंने कहा थाः यह जरूर याद किया जाना चाहिए कि ’हमने तिब्बत में कुछ खास विशेषाधिकार हासिल किए थे जिसे ब्रिटेन ने वहां हासिल किया था। इस तरह, प्रभावी तौर पर, हम पुरानी ब्रिटिश सरकार की कुछ विस्तारवादी नीतियों के उत्तराधिकारी थे। हमारे लिए इन सभी विशेषाधिकारों को बनाए रखना संभव नहीं था क्योंकि कोई स्वतंत्र राष्ट्र इस स्थिति को स्वीकार नहीं करता। इसलिए, अपने व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिए तिब्बत के कुछ शहरों में हमारी सेना की छोटी टुकड़ियां थीं। हम वहां इन टुकड़ियों को बनाए रखने में संभवतः सफल नहीं हो सके। हमारा अन्य विशेषाधिकार व्यापार मामलों और संचार को लेकर था।’

जनरल सिंह की एक और टिप्पणी नेहरू को लेकर कृपणता वाली है और यह चीनियों के गुस्से की कीमत पर दलाई लामा को शरण देने के भारत के नेक भाव की अनदेखी भी करती है। जनरल सिंह का कहना है कि तिब्बती क्षेत्र में चीनियों की बढ़त के दौरान तिब्बत की सुरक्षा करने में नेहरू की अनिच्छा ने उनके साथ अपने संबंधों को कमजोर किया। यह कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर सिंह की अज्ञानता ही दिखाता है। जहां तक क्षेत्रीय अधिकारों की बात है, तिब्बती भारत के मित्र कतई नहीं थे। अक्टूबर, 1947 में उन लोगों ने लद्दाख से असम तक बहुत बड़े हिस्से को वापस करने के लिए भारत को औपचारिक तौर से कहा। वैसे, चीन से बड़े खतरे को देखते हुए उन लोगों ने इस मसले पर आगे जोर नहीं दिया। फरवरी, 1951 में ल्हासा में तिब्बती प्रशासन ने यह आरोप लगाते हुए तवांग में भारत की उपस्थिति का विरोध किया कि भारत सरकार इसे ’अपने आप कब्जा कर रही है जबकि यह उसका नहीं है।’ उन्होंने कहा कि इसका उन्हें ’गहरा पछतावा है और वे इसे कतई स्वीकार नहीं कर सकते।’ इससे भी आगे बढ़कर तिब्बतियों ने तवांग से अपनी सेना तत्काल वापस बुलाने की मांग की। नेहरू की सरकार ने तिब्बत के प्रतिरोध की अनदेखी की। भारत तवांग में बना रहा और वहां से तिब्बती प्रशासन को निकाल बाहर किया। इसके साथ ही, ब्रिटिश सरकार को गहरे तक चिंतित किए रहे कथित तिब्बत क्षेत्र के ‘खतरनाक खूंटे’ को अंततः हटा दिया गया और भारत की पूर्वोत्तर सीमा के तौर पर नक्शे की जगह जमीन पर मैकमोहन रेखा को बदल दिया गया। (नेविल मैक्सवेल, इंडियाज चाइनावार, पेज 69, 73)

जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा धक्का पहुंचाया है, वह यह है कि जनरल ने गलत ढंग से दावा किया है कि 7 नवंबर, 1950 को नेहरू को लिखे पत्र में सरदार पटेल ने उन्हें चेतावनी दी थी कि चीन दस से बारह साल के अंदर भारत पर हमला करेगा, जैसा उसने अक्टूबर, 1962 में किया भी और इस तरह पटेल सही साबित हुए। शुरू से आखिर तक सरदार के इस पत्र को पढ़ने पर मैंने पाया कि इस पत्र में कहीं भी लौह पुरुष ने वैसी भविष्यवाणी नहीं की है जैसा कि जनरल सिंह उन्हें कहते हुए बताते हैं। इस चिट्ठी में अपने उत्तरी से लेकर पूर्वोत्तर क्षेत्र तक खतरे के बारे में पटेल ने नेहरू के सामने आम संशय प्रकट किया था जिसके बारे में नेहरू भी जानते थे और इस पर पूरी तवज्जो दी गई। पटेल ने कहीं भी नहीं कहा कि भारत को तिब्बत के मुद्दे पर चीन से युद्ध करना चाहिए जैसा कि कई बार अर्थ निकाला जाता है।

नेहरू सही ही समझते थे कि तिब्बत के मसले पर चीन के साथ युद्ध वैधानिक तौर पर अनौचित्यपूर्ण तो होगा ही, साथ ही यह देश के लिए आर्थिक तौर पर विनाशकारी होगा। इसीलिए उन्होंने अमेरिकी राजदूत लॉय हेंडरसन के इस अस्पष्ट संकेत की अनदेखी कि अगर वह चाहें, तो विदेश मंत्रालय उनकी मदद कर प्रसन्नता अनुभव करेगा। (नेहरू का 1 नवंबर, 1950 को विजयालक्ष्मी को लिखा पत्र) एक लेखक के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रूमैन ने तिब्बत की रक्षा के लिए भारत को एयरक्राफ्ट भेजने का प्रस्ताव किया। कोरियाई युद्ध के दौरान चीन को भारत की तरफ से घेरना वाशिंगटन को पसंद हो सकता था; लेकिन अगर यह प्रस्ताव किया गया था, तो भारत ने इस तरह की चढ़ाई के खतरे और निष्फलता को जरूर ही देखा होगा और मनाकर दिया होगा। (नेविल मैक्सवेल, इडियाज चाइनावार, इस टिप्पणी पर पाद टिप्पणी कि क्या भारत ने तिब्बत मसले पर चीन के साथ युद्ध करने पर विचार किया था, पेज 71, 72) तिब्बत मसले पर चीन के साथ 1950 में युद्ध टालना नेहरू के सबसे चतुर निर्णयों में से एक था।

जनरल सिंह ने वेबिनार में यह भी टिप्पणी की कि वर्तमान सरकार चीनियों के खिलाफ दृढ़ता से खड़ी है और हमारे मसले को मजबूती से रख रही है। अगर वर्तमान प्रधानमंत्री 5 मई, 2020 से चीन शब्द जुबान पर लाने में भी अक्षम हैं, तो चीनियों के खिलाफ खड़े होने का क्या मतलब निकाला जा सकता है, तब पूर्व जनरल शायद सही हैं!

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