घातक है सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग, बना सकता है मनोरोगी

सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के कारण आज लोग वास्तविक समाज को छोड़ एक आभासी समाज का हिस्सा हो गए हैं। स्थिति ये है कि सोशल मीडिया पर लगातार एक दूसरे से जुड़े रहने वाले भी आमने-सामने मिलने पर बात नहीं कर पाते। मैसेज करने की आदत ने लोगों की भाषा ही बदल डाली है।

फोटोः सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

सोशल मीडिया के जरिये आज भले ही विश्व की आबादी का बड़ा हिस्सा इतिहास के किसी भी दौर की तुलना में, अधिक संख्या में एक दूसरे से जुड़ा है। लेकिन वास्तविकता यही है कि समाज में इसी सोशल मीडिया के चलते आज जितना बिखराव है उतना पहले किसी दौर में नहीं रहा। अब लोग एक दूसरे से मिलते नहीं बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से मैसेज करते हैं। लोग अपने समाज को छोड़कर एक आभासी समाज का हिस्सा हो गए हैं। हालात इतने खराब हैं कि एक दूसरे से लगातार मैसेज के माध्यम से जुड़े रहने वाले लोग भी आमने-सामने मिलने पर बात नहीं कर पाते। ऐसे में लोगों की बातें करने की आदत धीरे-धीरे कम हो रही है। यही नहीं मैसेज करने की आदत ने लोगों की भाषा ही बदल डाली है।

सोशल मीडिया का इतना व्यापक प्रभाव पड़ रहा है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। गौर से अपने आसपास के लोगों को देखें तो पता चलेगा कि आज के दौर में लोगों के विचार किसी विषय पर भले ही गलत हों पर उन्हें बदलना मुश्किल है। इसका स्पष्ट कारण है कि सोशल मीडिया पर लोग अपनी मर्जी से अपने विचारों के अनुरूप अपना ग्रुप तैयार करते हैं। ऐसे ग्रुप में सबके विचार एक जैसे ही होते हैं, अगर कोई आपके विचारों का विरोधी होता भी है तो आप उसे ब्लॉक कर सकते हैं या फिर उसके मैसेज को स्किप कर देते हैं।

आज के दौर में बहुत बड़े आंदोलन भी लगभग गायब हो चुके हैं। यह भी सोशल मीडिया की ही एक देन है। आंदोलन तभी हो पाते हैं जब बहुत सारे लोग, जिनके विचार एक जैसे हों, वे आपस में मिलें और एक दूसरे की बातें सुनें और समस्याओं से इतने प्रभावित हों कि सड़कों पर आंदोलन के लिए उतर जाएं। आजकल तो लोग किसी समस्या से प्रभावित ही नहीं होते और अगर बहुत गुस्सा करते भी हैं तो सोशल मीडिया पर एक-दो कमेंट लिखकर शांत हो जाते हैं। इन दिनों बड़े आंदोलन केवल किसानों और मजदूरों ने किए हैं। और अहम बात ये है कि इनमें से अधिकतर लोग सोशल मीडिया चलाने वाले स्मार्टफोनधारी नहीं, बल्कि सामान्य मोबाइल फोन वाले हैं।

वर्तमान में इंटरनेट चलाने वाली दुनिया की लगभग 51 प्रतिशत आबादी केवल अपने स्मार्टफोन से इंटरनेट का उपयोग करती है, जबकि 2025 तक ऐसा करने वाली आबादी की संख्या 73 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। इन आंकड़ों से भले ही हम और हमारी सरकारें खुश हो लें, लेकिन स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का यह दौर दुनिया को मानसिक तौर पर बीमार बना रहा है।

हाल में ही मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों की अगुवाई में एक दल ने अपने अध्ययन में देखा कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग करने वाले लोगों का व्यवहार नशे की गिरफ्त में पड़े लोगों जैसा होने लगा है। लंबे समय तक नशे की लत करने वालों में फैसला लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है, ऐसे लोग गलत फैसला लेकर भी अपनी गलतियों से नहीं सीखते और मानसिक तौर पर अस्थिर हो जाते हैं। जर्नल ऑफ बिहेवियर एडिक्शन के नए अंक में प्रकाशित इस शोधपत्र के अनुसार यही सारे लक्षण सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग करने वाले लोगों में भी पनप रहे हैं।

अब तो अनेक वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक यह भी बताने लगे हैं कि हमलोग अधिक चीजों को याद रखने की क्षमता खोते जा रहे हैं और ध्यान नहीं दे पाते। इन विशेषज्ञों के अनुसार अब हम किसी भी वस्तु या घटना को मस्तिष्क में नहीं रखते बल्कि उसे मैसेज या फोटो के माध्यम से संजोते हैं। अगर हम किसी ऐतिहासिक इमारत को देखने जाते हैं तो वहां के आंख से देखे दृश्य याद नहीं रखते बल्कि सोशल मीडिया पर फोटो भेजने में लग जाते हैं। इस आदत के चलते वहां की विशेषताएं हमें पता ही नहीं चलती, फिर कभी अपनी ही भेजी फोटो को देखकर चौंक जाते हैं कि उस जगह पर ऐसा भी था जो मैंने उस समय नहीं देखा। किसी पार्टी में हमने क्या खाया यह भी याद नहीं रहता और इसे भी फोटो देखकर याद करते हैं। जाहिर है कि हमारी स्मरण शक्ति कमजोर हो रही है और हम अपने मस्तिष्क को कुंद करते जा रहे हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को कम करता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगेन के विशेषज्ञों के अनुसार लोग सोशल मीडिया में ही अपने मित्र और शत्रु तलाश लेते हैं। बहुत से लोग सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के बाद हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। मनुष्य से मनुष्य की आत्मीयता प्रभावित करता है, याददाश्त कम करता है, नींद में बाधा पहुंचाता है, एकाग्रता भंग करता है और चिंता तथा अवसाद के कारण अनेक मनोरोगों और बीमारियों को जन्म देता है। अमेरिकन जर्नल ऑफ़ एपिडेमियोलॉजी में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार सोशल मीडिया का लगातार उपयोग करने वाले लोगों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

इसकी वजह से नींद भी प्रभावित होती है। विशेषज्ञों के अनुसार सोने के कम से कम एक घंटे पहले से सोशल मीडिया का उपयोग बंद कर देना चाहिए, नहीं तो सक्रिय मस्तिष्क या तनाव के साथ ही हम बिस्तर पर जाते हैं और नींद में व्यवधान पड़ता है। स्मार्टफोन के स्क्रीन की लाइट से मेलाटोनिन नामक हारमोन का उत्सर्जन प्रभावित होता है और हम चैन से सो नहीं पाते। सोशल मीडिया हमारा ध्यान भी प्रभावित करता है।

आज के दौर में, जब सोशल मीडिया का उपयोग और प्रभाव बढ़ता जा रहा है, ऐसे में इसके बुरे प्रभावों पर ध्यान देना ही होगा नहीं तो हरेक आदमी बीमार होगा और समाज नशेड़ी जैसा व्यवहार करेगा।

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