अतिपिछड़ी जातियों पर नजर, निशाने पर नीतीश कुमार, इसीलिए फागू चौहान को बीजेपी ने भेजा बिहार

मोदी सरकार द्वारा बतौर राज्यपाल बिहार भेजे गए फागू चौहान संवैधानिक पद की गरिमा और राजनीतिक शुचिता को परे रखकर खुलेआम सार्वजनिक मंचों से अपने समाज के लोगों से बीजेपी का समर्थन करने का आह्वान करना कई सवाल खड़े करता है।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया

सत्यपाल मलिक अकेले राज्यपाल नहीं हैं जो जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार के प्रतिनिधि तो हैं ही, पर अपने ‘भाग्य विधाता’ के बारे में भी कम चिंतित नहीं रहते हैं। बिहार के मौजूदा राज्यपाल फागू चौहान इसी कड़ी में बड़ा नाम बनकर सामने आए हैं। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल वहां की स्थिति को लेकर विपक्षी दलों-नेताओं की टिपप्णियों से इस हद तक पीड़ित हैं कि विपक्ष को जनता से ‘जूते पड़ने’ की आशंका अभी से जाहिर कर रहे हैं। बिहार के मौजूदा राज्यपाल फागू चौहान भी उनसे कतई पीछे नहीं हैं या रहना नहीं चाहते। हां, थोड़ा सा अंतर के साथ।

हाल ही में फागू चौहान को बिहार का राज्यपाल बनाए जाने से उत्साहित सूबे के नोनिया-बेलदार और बिंद समाज की ओर से उनका सार्वजनिक अभिनंदन किया गया। अपने अभिनंदन के उत्तर में राज्यपाल ने इन समाजिक समूहों के लोगों से कहा कि जिसने (अर्थात् नरेंद्र मोदी ने) ‘इस समाज को यह सम्मान दिया (अर्थात् राज्यपाल बनाया), समाज को उसे नहीं भूलना चाहिए ।’ राज्यपाल ने यह आह्वान यह सफाई देते हुए किया- ‘मैं संवैधानिक पद पर हूं, राजनीतिक भाषण दूंगा तो लोग मुझे कहेंगे बीजेपी का प्रवक्ता हूं।’ बिहार विधानसभा का चुनाव एक साल बाद ही होना है। ऐसे में इस आह्वान का क्या निहितार्थ है, यह बताने की जरूरत नहीं है!

फागू चौहान बिहार के बगलगीर पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के हैं और अतिपिछड़ी जाति- नोनिया समुदाय से आते हैं। तब के दलित मजदूर किसान पार्टी (दमकिपा) से अपनी राजनीति की शुरुआत कर अनेक दलों से होते हुए वह बीजेपी में आए। बिहार के राज्यपाल पद पर आसीन होने से पहले तक वह उत्तर प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के सदस्य और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष थे। बीजेपी (और आरआरएस भी) के दिग्गज नेता लालजी टंडन के स्थान पर अगस्त में उन्हें बिहार भेजा गया है। सो, बिहार में उनकी यह धमाकेदार ओपनिंग हुई है।

इस सम्मान समारोह ने बिहार में एनडीए की आंतरिक राजनीति में नए हलचल को भी जन्म दिया है। मुख्यमंत्री और जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार और राज्यपाल फागू चौहान पुराने परिचित हैं- दोनों ने अपने संसदीय जीवन की शुरुआत चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली दमकिपा से ही की थी। यह बात फागू चौहान के राज्यपाल नियुक्त होते ही बिहार के राजनीतिक हलके में फैल गई। शपथ ग्रहण समारोह के बाद की अनौपचारिक चाय-पार्टी में यह दोनों नेताओं की जुबानी सार्वजनिक भी हो गई।

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इसके बाद नोनिया और इससे जुड़े सामाजिक समूहों- बेलदार और बिंद समाज के जेडीयू नेताओं ने उनके एक सम्मान समारोह की पार्टी नेतृत्व की अनौपचारिक सहमति से आयोजन की तैयारी शुरू कर दी। मगर, इसे बीजेपी के इन्हीं सामाजिक समूहों के नेताओं ने हाइजैक कर लिया। मंच पर मौजूद राजनेताओं की जमात इसे साबित भी कर रही थी। हालांकि, इन्हीं समाज के जेडीयू के गणेश भारती, डॉ. भारती मेहता आदि मंच पर और मंच के पीछे जरूर सक्रिय दिखे। लेकिन बिहार सरकार में बीजेपी कोटे के कैबिनेट मंत्री ब्रजकिशोर बिंद और पूर्व मंत्री रेणु देवी सहित अनेक नेता इस पर छाये रहे। बीजेपी को इन नेताओं की सक्रियता का कितना राजनीतिक लाभ मिलेगा और यह लाभ वोट में किस हद तक तब्दील होगा, यह कहना कठिन है। पर इससे बीजेपी में उत्साह और जेडीयू में चिंता तो है ही।

फागू चौहान को बिहार में बतौर राज्यपाल भेजा जाना और सार्वजनिक मंच से उनका अपने समाज के लोगों का बीजेपी को समर्थन करने का आह्वान करना दरअसल चुनावी रणनीति का हिस्सा है। हालांकि यह और ऐसा आह्वान संवैधानिक पद की गरिमा और उससे जुड़ी राजनीतिक शुचिता के अनुकूल नहीं है। पर बीजेपी भी यह बात खुलेआम मानने लगी है कि चुनावी राजनीति में कुछ भी वर्जित नहीं है और न होना चाहिए।

दरअसल अविभाजित बिहार में अतिपिछड़ी जातियों की आबादी लगभग 32 प्रतिशत थी, जो विभाजित बिहार में 21.2 फीसदी रह गई है। इनमें नोनिया, बिंद और बेलदार (और इनसे मिलती-जुलती तियर जाति भी) की मिलीजुली आबादी कोई 2.5 प्रतिशत है। हालांकि ये जातियां सूबे के विभिन्न हिस्सों में फैली हैं, पर रोहतास, औरंगाबाद, नवादा, मुजफ्फरपुर, जमुई, भागलपुर, पश्चिम चंपारण आदि जिलों के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में इनकी संख्या काबिलेगौर है।

हालांकि, केवल इनके बूते किसी प्रत्याशी की जीत-हार नहीं हो सकती, तथापि चुनावी नतीजों को तो इन जातियों के मतदाता प्रभावित कर ही सकते हैं और करते भी हैं। सो, सत्ता की शिखर पर पहुंचे या वहां पहुंचने की उत्कट महत्वाकांक्षा को पूरा करने की चेष्टा में प्राण-पण से जुटे किसी राजनीतिक दल के लिए इन सामाजिक समूहों का साथ महत्वपूर्ण है। ऐसा माना जा रहा है कि फागू चौहान को बिहार लाकर बीजेपी (और उसका मातृ संगठन आरएसएस भी) इसी मकसद को पूरा करना चाहती है।

बिहार के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में वैश्य की कुछ बड़ी उपजातियों को अपवाद मान लिया जाए, तो अतिपिछड़ों का आम समर्थन नीतीश कुमार को दिखता है। नीतीश कुमार ने इनके राजनीतिक और आर्थिक सशक्तीकरण के लिए अपने शासन काल के पहले दौर (नवंबर, 2005-नवंबर 2010) में राजनीति के ख्याल से उल्लेखनीय और दूरगामी महत्व के कई कदम उठाए। इसका लाभ उन्हें 2009 के संसदीय चुनावों के बाद संपन्न लगभग सभी विधानसभा और लोकसभा चुनावों (2014 के संसदीय चुनावों को छोड़कर) में मिला है।

इसका लाभ उन दलों को भी मिलता रहा है जो उनके साथ रहे हैं। 2015 के विधानसभा चुनावों में एनडीए की हार के लिए बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व इस सामाजिक राजनीति को बड़ा कारण मानता है। इसीलिए हाल ही में संपन्न संसदीय चुनावों में बीजेपी नेतृत्व ने सीटों की हानि सहकर भी नीतीश कुमार को तरजीह दी। हालांकि, बीजेपी 2010-2011 से बिहार की अतिपिछड़ी आबादी के बीच काम कर रही है। इसमें आरएसएस भी अपने तईं लगा हुआ है। इसी राजनीति के तहत नौ-दस साल से पार्टी की तरफ से कर्पूरी जयंती अभियान के रूप में मनाया जा रहा है।

साथ ही बिहार बीजेपी में अतिपिछड़े सामाजिक समूहों से आए नेताओं को महत्वपूर्ण जगह दी जा रही है। फिर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के शिखर पर होने का लाभ भी मिलता दिख रहा है। फिर भी, सूबे की अतिपिछड़ी जातियों में बीजेपी नेतृत्व ‘और कुछ करने’ की जरूरत महसूस करता है। इसी जरूरत के तहत मुजफ्फरपुर के डॉ. भगवान लाल साहनी को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है। यह भी अब साफ हो गया है कि फागू चौहान का राज्यपाल होना बीजेपी की इसी जरूरत की अभिव्यक्ति है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिपिछड़ा नेता बीजेपी की इस जरूरत को क्या पूरा कर पाएंगे? यह यक्ष प्रश्न है और इसका उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है- शायद फागू चौहान के पास भी नहीं। वस्तुतः बीजेपी के लिए बिहार के अतिपिछड़ा सामाजिक समूहों में राजनीतिक पैठ एक चुनौती बनी हुई है- विशेषतौर पर नीतीश कुमार के कारण।

बीजेपी नेतृत्व का मानना है कि ताकतवर ऊंची जातियां- भूमिहार और ब्राह्मण अपनी राजनीतिक विकल्पहीनता में उससे विमुख नहीं हो सकती। लालू प्रसाद के परिवार में संकट से राष्ट्रीय जनता दल की परेशानी निरंतर बढ़ती जा रही है। इसका असर उनके यादव समर्थक समूह पर पड़ने लगा है- संसदीय चुनावों में यह दिखा है। लालू परिवार का आंतरिक संकट जितना बढ़ेगा, बीजेपी को इस सामाजिक समूह में सेंधमारी में उतनी ही सुविधा होगी। कुशवाहा और अतिपिछड़ा समाज उसके लिए चुनौती है।

बीजेपी नेतृत्व फागू चौहान के माध्यम से अतिपिछड़ा समाज में सेंधमारी की बड़ी उम्मीद लगाए है। नोनिया, बेलदार, बिंद, तीयर ही नहीं, कुछ बड़ी और ताकतवर (धनबली व आक्रामक) अतिपिछड़ी जातियों को छोड़कर फागू चौहान के राज्यपाल बनने से अतिपिछड़ी जातियों के सामाजिक कार्यकर्ताओं की जमात, जो चुनावों में माहौल बनाने में बड़ी भूमिका अदा करते हैं, बीजेपी के इस निर्णय को ‘सकारात्मक’ नजर से देखते हैं- राजभवन में अपना आदमी आ गया है। ‘अपना आदमी’ के इस भाव को राजभवन भी प्रक्षेपित करना चाहता है, कर भी रहा है। अब यह बीजेपी के राजनीतिक कौशल पर निर्भर करता है कि वह ‘राजभवन में अपना आदमी’ के इस संदेश का कितना लाभ हासिल करती है। इस संदर्भ में बीजेपी की सक्रियता और जो करे, नीतीश कुमार की पेशानी पर बल तो पैदा कर ही देगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Published: 9 Sep 2019, 8:12 PM
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