हार के कगार पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, सेना के साथ अपने ही सांसदों की बगावत से भी हैं परेशान

भारत के साथ रिश्ते भी पाकिस्तानी राजनीति में अहम होते हैं। सेना की पहल पर व्यापारिक रिश्तों को इमरान गड्ड-मड्ड कर चुके हैं। फिर भी सैन्य-स्तर पर दोनों देशों बीच बैकरूम संपर्क काम कर रहा है। ऐसे में इमरान सरकार बच भी गई, तब भी उसे आगे ढोना आसान नहीं होगा।

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प्रमोद जोशी

पाकिस्तान के राजनीतिक-संग्राम में इमरान खान करीब-करीब हार चुके हैं, पर वह हार मानने को तैयार नहीं हैं। वैसे, उन्होंने दावा किया है कि उनके पास अपने विरोधियों को ‘हैरत’ में डालने वाली कुछ चीजें हैं। 23 मार्च को ‘पाकिस्तान-दिवस’ मनाया गया जिसमें पहली बार 57 इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों के अलावा चीन के विदेश मंत्री वांग यी भी शामिल हुए। इमरान के पास कौन-सी जादू कि पुड़िया है जिससे वह अपने विरोधियों को हैरत में डालेंगे? नंबर-गेम वह हार चुके हैं। हो सकता है कि इस दौरान सुप्रीम कोर्ट की कोई रूलिंग आ जाए या समय से पहले चुनाव की घोषणा हो जाए जिसका संकेत गृहमंत्री शेख रशीद ने दिया है। इमरान जीतें या हारें, पाकिस्तान अब एक बड़े बदलाव के द्वार पर खड़ा है।

एक बात ध्यान में रखने की है कि अभी पाकिस्तान में संपन्न इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के 48वें शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए 57 देशों के विदेशमंत्री पाकिस्तान आए। चीन के विदेशमंत्री वांग यी इसमें शामिल हुए जिन्हें पाकिस्तान ने विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। संभवतः वह भारत भी आएंगे। इस मौके पर उनकी उपस्थिति भी महत्वपूर्ण है।

तहरीके तालिबान और बलोच उग्रवादी संगठनों की गतिविधियां बढ़ रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि फौजी प्रतिष्ठान की राजनीतिक भूमिका बदलती दिखाई पड़ रही है। इमरान खान ने जोश में आकर अपने प्रतिस्पर्धियों को कानूनी दांवपेंच में फंसा जरूर लिया लेकिन अब वह खुद इसमें फंस गए हैं। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के अध्यक्ष और तीन बार के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के छोटे भाई शहबाज शरीफ ने कहा है कि फौजी प्रतिष्ठान राजनीतिक संकट में किसी का पक्ष नहीं ले रहा है।

भारी पड़ रही है इमरान को आक्रामकता

विरोधी दलों ने मिलकर इमरान सरकार पर हल्ला बोला है। उधर, इमरान भी आक्रामक हैं। उनके बयानों से सेना नाखुश है। सेना की तटस्थता को लेकर उन्होंने कहा है, इंसान पक्ष लेते हैं और ‘केवल जानवर तटस्थ होते हैं।’ लगता है कि फौजी प्रतिष्ठान इमरान से नाखुश है। अमेरिका भी इमरान के नेतृत्व से नाराज है। इमरान खान ने एक से ज्यादा बार कहा है कि हम अमेरिका के गुलाम नहीं हैं।

हाल में ईयू के राजदूतों ने यूक्रेन की लड़ाई में पाकिस्तान से समर्थन मांगने के लिए एक पत्र लिखा था जिस पर इमरान ने कुछ कड़वी बातें कही हैं। यह भी कहा जा रहा है कि यूक्रेन के युद्ध के मौके पर इमरान खान को रूस की यात्रा पर नहीं जाना चाहिए था। पश्चिमी देशों की उनसे नाराजगी बढ़ गई है।


भारत के साथ रिश्ते भी पाकिस्तान की राजनीति में महत्वपूर्ण होते हैं। पिछले साल पाकिस्तानी सेना ने दोनों देशों के बीच व्यापार की पहल की थी, पर इमरान खान ने पहले उसे स्वीकार करके और फिर ‘यू-टर्न’ लेकर सारे मामले को गड्ड-मड्ड कर दिया। पिछले साल फरवरी में नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी रुकने के बाद से शांति बनी हुई है। हाल में भारत की एक मिसाइल दुर्घटनावश पाकिस्तान में गिरने के बावजूद तनाव नहीं बढ़ा। इससे लगता है कि सैन्य-स्तर पर बैकरूम संपर्क बेहतर काम कर रहा है।

अब आगे क्या होगा?

सरकार बची रही, तब भी उसे आगे ढोना आसान नहीं होगा। यदि वह गिरी, तब क्या होगा? सवा साल के लिए क्या नई सरकार बनेगी या चुनाव होंगे? नई सरकार की आंतरिक और विदेश-नीति से जुड़े तमाम सवाल हैं। सदन में क्या होगा और मतदान कब होगा, इसे लेकर अनिश्चय है। कुछ अनिश्चय संवैधानिक स्थिति को लेकर हैं। सत्तारूढ़ तहरीके इंसाफ पार्टी के कुछ बागी सांसद सरकार के खिलाफ वोट देना चाहते हैं। उन्हें सरकार के खिलाफ वोट देने का अधिकार है या नहीं, इसे लेकर बहस है और एक मामला सुप्रीम कोर्ट में गया है। संभव है कि इस बीच कुछ और मामले अदालत में जाएं।

क्या पीटीआई और पीडीएम में झड़प होगी?

इमरान खान की पार्टी तहरीके इंसाफ ने 27 मार्च को इस्लामाबाद में विशाल रैली निकालने का एलान किया है। उसी रोज विरोधी ‘पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट’ की विशाल रैली भी इस्लामाबाद में प्रवेश करेगी। क्या दोनों रैलियों में आमने-सामने की भिड़ंत होगी? देश में विस्फोटक स्थिति बन रही है।

पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नून और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के करीब 100 सांसदों ने 8 मार्च को नेशनल असेंबली सचिवालय को अविश्वास प्रस्ताव दिया था। संवैधानिक व्यवस्था के तहत यह सत्र 22 मार्च या उससे पहले शुरू हो जाना चाहिए था, पर 22 मार्च से संसद भवन में इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) का 48वां शिखर सम्मेलन शुरू हुआ है, इस वजह से अविश्वास प्रस्ताव पर विचार पीछे खिसका दिया गया है।


कानूनी पेंच के बीच क्या कार्यकाल पूरा करेंगे इमरान?

सत्र को तीन दिन टालना क्या न्यायसंगत है? बहरहाल, इस प्रस्ताव को सदन औपचारिक रूप से विचारार्थ स्वीकार कर लेगा, तो तीन से सात दिन के भीतर मतदान कराया जाएगा। और टालने की कोशिश की गई, तो मामला अदालत में जाएगा। बागी सांसदों के मताधिकार को लेकर भी अदालती हस्तक्षेप संभव है।

342 सदस्यों वाले सदन में प्रस्ताव को पास कराने के लिए 172 वोटों की जरूरत होगी। इमरान की पार्टी के सदन में 155 सदस्य हैं। उनकी पार्टी सरकार चलाने के लिए अभी तक छह राजनीतिक दलों के 23 सदस्यों का समर्थन ले रही थी। अब उनकी अपनी पार्टी के करीब दो दर्जन सदस्य बागी हो गए हैं। इमरान सरकार को अभी तीन साल आठ महीने हुए हैं। लगता है कि पांच साल का पूरा कार्यकाल इसके नसीब में भी नहीं है। विडंबना है कि पाकिस्तान में किसी भी चुने हुए प्रधानमंत्री ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है।

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