फडणवीस को रह-रह कर सताती है कुर्सी की याद, 'मी पुनहा यें' के जवाब में अब लोग 'ते पुनहा येतिल' कह उड़ाते हैं मजाक

फडणवीस जिस तरह महाराष्ट्र बीजेपी में अपने को सबसे ऊंचे कद का नेता होने का दिखावा करते हैं, वह उनकी अपरिपक्वता तो दिखाती ही है, इस रूप में उन्हें आदर दिए जाने की उनकी उत्कट इच्छा भी प्रदर्शित करती है।

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सुजाता आनंदन

लगता है महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस नहीं जानते कि उन्हें अपना मुंह कब बंद ही रखना चाहिए। 2019 में राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने तीन ऐसे शब्द कहे जिस वजह से उसी साल अक्तूबर में मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद से ये उन पर मजाक का मुद्दा बन गए हैं। उन महीनों में प्रचार के दौरान पूरे महाराष्ट्र में उन्होंने कहाः मी पुनहा यें (मैं (सत्ता में) पुनः आऊंगा)। जबसे फडणवीस की सत्ता से विदाई हुई है, वह जब कहीं जाते हैं, तो लोग व्यंग्यपूर्वक उनके कार्यक्रम या संगठन के बारे में कहते हैः ते पुनहा येतिल (वह फिर आएंगे)।

फडणवीस में जिस तरह आत्मश्लाघा या गर्वोक्ति है, वह राज्य में किसी पार्टी में किसी स्तर पर नहीं है। शरद पवार रूखे और लगभग हास-परिहास से दूर रहने वाले माने जाते हैं। फिर भी, उन्होंने एक बार व्यंग्य में कहा कि ‘लोगों को चुनने को लेकर अनिश्चितता को लेकर निश्चित मत बनाना मतदाताओं के अहम को चिढ़ाने वाला ही होता है और शायद यह भी एक वजह थी कि मतदाताओं ने निश्चय किया कि फडणवीस को खुरची (कुर्सी या सत्ता) न मिले।’

फडणवीस को वह खुरची न मिली, फिर ऐसा लगता है कि वह यकीन करते हैं कि वह उस पर ही बैठे हैं। अक्तूबर के तीसरे हफ्ते में उन्होंने तब अपने को ही मजाक का विषय बना लिया जब पार्टी के एक कार्यक्रम में उन्होंने कह डाला कि उन्हें उनके समर्थक इतना महत्व देते हैं कि उन्हें बराबर यह लगता रहता है कि वह अब भी मुख्यमंत्री हैं और उन्होंने कभी यह पद छोड़ा ही नहीं।

मुंगेरी लाल के हसीन सपने

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने इस पर फौरन ही प्रतिक्रिया दी। अपनी पार्टी की वार्षिक दशहरा रैली में ठाकरे ने कहा कि ‘सत्ता में अपनी वापसी के हवा महल की जगह अगर उन्होंने (फडणवीस ने) जमीन पर लोगों के काम पर ध्यान केन्द्रित किया होता, तो वह सचमुच सत्ता में लौट गए होते।’ शरद पवार तीन बार मुख्यमंत्री रहे। पहली बार उन्होंने 1978 में यह पद संभाला। अंतिम बार उन्होंने 1995 में यह पद छोड़ा। उन्होंने भी फडणवीस पर टिप्पणी की। उन्होंने कहाः ‘यह अद्भुत ही है कि वह (फडणवीस) अब भी यकीन करते हैं कि वह मुख्यमंत्री हैं। चार बार मुझे विभिन्न कारणों से यह पद छोड़ना पड़ा, फिर भी एक बार भी मुझे यह अनुभव नहीं हुआ कि मैं अब भी मुख्यमंत्री हूं!’

लेकिन उनके दूसरे आलोचकों ने इसे थोड़ा गंभीरता से लिया। एक ने तो पूछा भी कि ‘वह मुख्यमंत्री बने रहने की बात पर यकीन क्यों करते हैं? क्या इसलिए कि वह अपने कुछ ऐसे नौकरशाहों के जरिये अब भी सरकारी दस्तावेजों तक पहुंच बनाए हुए हैं जिन्हें उन्होंने अपने समय में महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया था और वर्तमान शासन ने उन्हें वहां से हटाया नहीं है?’


क्या पुलिस-प्रशासन में होगा बड़ा फेरबदल!

इस तरह की चर्चा ने ही पुलिस-प्रशासन में बड़े पैमाने पर तबादले की सुगबुगाहट को जन्म दिया है। वैसे, पवार पुराने जमाने की राजनीति करने वाले जाने जाते हैं। उनका मानना रहा है कि नौकरशाही किसी भी सरकार के प्रति वफादार होती है, न कि किसी व्यक्ति या किसी राजनीतिक पार्टी की। लेकिन उनके समर्थक यह बात उन्हें मान लेने पर जोर दे रहे हैं कि चीजें काफी कुछ बदल गई हैं। वे बताते हैं कि कोविड के आरंभिक काल मार्च, 2020 में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार को तत्कालीन नगर आयुक्त ने ही नीचा दिखाया था। उनकी नियुक्ति फडणवीस के समय हुई थी और उनके मुख्य सचिव बनने की संभावना थी। एमवीए ने जब उन्हें हटाकर दूसरे को इस पर नियुक्त किया, तो संकट पर तेजी से नियंत्रण पा लिया गया।

परमबीर सिंह के झमेले में भी एमवीए को काफी कुछ झेलना पड़ा है जबकि महत्वपूर्ण स्थानों को उड़ाने के लिए जिलेटिन लदे कार पार्क होने की जानकारी राज्य सरकार से पहले फडणवीस को मिल गई लगती है। भीमा कोरेगांव मामले के समय परमबीर सिंह पुणे के पुलिस आयुक्त थे। उस समय भी उनकी भूमिका पर सवाल उठे थे। लेकिन उन्हें मुंबई पुलिस आयुक्त बना दिया गया और इस कांड में जो बवाल हुआ, वह सबके सामने है। जब उन्हें इस पद से हटाया गया, तब मामला शांत हुआ। इसीलिए नौकरशाही में बड़े फेरबदल की मांग सही लगती है।

वैसे, फडणवीस जिस तरह महाराष्ट्र बीजेपी में अपने को सबसे ऊंचे कद का नेता होने का दिखावा करते हैं, वह उनकी अपरिपक्वता तो दिखाती ही है, इस रूप में उन्हें आदर दिए जाने की उनकी उत्कट इच्छा भी प्रदर्शित करती है। पिछले दो साल के दौरान उन्होंने ठाकरे को मुख्यमंत्री-पद से हटाने के लिए राजभवन तक के दुरुपयोग समेत सब कुछ किया है। अब तक कुछ भी सफल नहीं हुआ है। बीजेपी ने केन्द्रीय एजेंसियों का विपक्षी नेताओं के खिलाफ उपयोग किया। इसके बावजूद किसी भी पार्टी- शिव सेना, कांग्रेस या एनसीपी के एक भी विधायक ने पाला बदल नहीं किया है। इससे बीजेपी को भी निराशा हुई है। इसी वजह से अभी दशहरा रैली में मुख्यमंत्री ठाकरे ने मुंगेरीलाल कहकर न सिर्फ फडणवीस का मजाक उड़ाया बल्कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह- दोनों को अपनी सरकार गिराने की चुनौती दी। उन्होंने यह तक कहा कि ‘मेरे बारे में कोशिश कर देखो और देख लो कि क्या होता है।’

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