खरी-खरी: किसानों ने राह दिखाई है, अब विपक्ष को भी पकड़नी होगी एकजुट होकर आंदोलन की राह

विपक्ष का काम केवल रैलियों से नहीं चलने वाला है। किसानों के समान विपक्ष को भी बड़े आंदोलन छेड़ने होंगे। यदि एकजुट होकर विपक्ष अभी भी खड़ा हो जाए तो बीजेपी की राजनीति को तोड़ा जा सकता है। परंतु यह संघर्ष डर एवं आधे-अधूरे नारों से सफल होने वाला नहीं है।

फोटो : Getty Images
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ज़फ़र आग़ा

पिछले साल इसी फरवरी के महीने में देश की राजधानी का उत्तर-पूर्वी हिस्सा भीषण सांप्रदायिक दंगों से धधक रहा था। उस हिस्से में बीजेपी नेता कपिल मिश्रा के एक भाषण के बाद ऐसे दंगे भड़क उठे कि बस पूछिए मत कि दिल्ली का क्या हाल हुआ। हद तो यह है कि उस समय अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दिल्ली के दौरे पर थे और उनकी उपस्थिति में राजधानी जल रही थी। दुकानों में आग लगी थी, घरों पर दंगाइयों के हमले हो रहे थे और दिल्ली की ‘बेचारी’ पुलिस हाथ पर हाथ धरे तमाशा देख रही थी। तीन दिनों तक लोग मरते रहे और दंगे चलते रहे लेकिन ‘बेचारी’ पुलिस कुछ भी नहीं कर सकी। दंगे जब खत्म हुए तो हमेशा की तरह पकड़-धकड़, पुलिस रपट और पुलिस द्वारा ‘देशद्रोह’ की गाथा आरंभ हो गई। इस सप्ताह उसे महज एक वर्ष होने को आया है लेकिन देश की राजधानी उन दंगों को भूल गई। मानो पिछली फरवरी इसी दिल्ली में कुछ हुआ नहीं था। सब कुछ सामान्य, सब ठीक; जिनके परिजन मरे, जिनके घर-बार लुटे, वे जीवन आरंभ करने में फिर से लग गए। दिल्ली फरवरी का आतंक भूल गई।

दिल्ली ही क्या, यह देश न जाने कितने सांप्रदायिक दंगे भूल चुका है। अरे, जब गुजरात का 2002 का नरसंहार किसी को याद नहीं, तो फिर और किसी दंगे का रोना क्या कीजिए। और तो और, गुजरात दंगों ने नरेंद्र मोदी को आधुनिक भारत का सर्वश्रेष्ठ ‘हिंदू नेता’ बना दिया। जाहिर है, गुजरात के दंगे न होते तो मोदी जी देश के प्रधानमंत्री न बन पाते। परंतु गांधी के इस गंगा-जमुनी देश में यह कैसी प्रथा चली कि देश में हिंदू-मुसलमान के बीच ऐसी दीवार खड़ी हो गई जैसी कि 1947 के बंटवारे ने भी नहीं खड़ी की थी।

आखिर, यह क्या हुआ कि इसी गांधीवादी देश में ‘मॉब लिंचिंग’ पर भीड़ ने ताली बजाई। वह देश जो सदा हर धर्म के लिए अपना दामन फैलाए रहता था, उस देश में दो समुदायों के बीच ऐसा मनमुटाव हुआ कि दोनों के बीच अब ऐसी खाई पैदा हो गई कि जो भरने का ही नाम नहीं लेती। यह वह देश है जिसके ग्रंथ ‘सर्वधर्म समभाव’ का पाठ संसार को पढ़ाते थे। जब दुनिया ‘सेक्युलरिज्म’ की परिभाषा ढूंढ रही थी तो उससे सैंकड़ों वर्ष पहले यहां एक ही समय में मंदिर की घंटियां बजती और साथ में मुल्ला पास की मस्जिद में अजान देता था और हिंदू-मुसलमान अपने-अपने पूजा स्थलों पर अपने भगवान की पूजा और याचना कर शांतिपूर्वक घर चले जाते। आज उसी देश में मस्जिद गिराई जाती है और लोग गर्व से ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाते हैं।

कुछ तो ऐसा जरूर है कि जो इस देश में बदल गया। तब ही तो दिल्ली में एक वर्ष पहले हुए दंगों पर आंसू बहाने वाला कोई नहीं। सत्य तो यह है कि केवल कुछ नहीं बल्कि बहुत कुछ बदल गया। परंतु वह ऐसा क्या है कि 1947 के भीषण दंगे यह देश भूलकर फिर मिल-जुलकर आगे चल पड़ा था परंतु अब जो दो समुदायों की खाई है, वह भरती ही नहीं है। मेरे इस प्रश्न का उत्तर महान पत्रकार कुलदीप नय्यर ने अपने निधन से करीब एक वर्ष पहले दिया था। जब 2014 में सरकार बदली तो वह बहुत निराश थे। उनको यह आभास हो रहा था कि अब देश में सांप्रदायिकता का सैलाब आने वाला है। मैंने कुलदीप नय्यर से कहा कि आपने तो बंटवारा देखा है, जब वह तूफान थम गया तो यह भी बीत जाएगा। आप इतने निराश क्यों हैं! कुलदीप जी ने एक गहरी सांस ली और बोले, ‘तुम समझ नहीं रहे हो। उस समय गांधी एवं जवाहरलाल जैसे लोग सांप्रदायिकता से लड़ने वाले थे। अब तो चारों ओर सन्नाटा है।’

मुझको कुलदीप नय्यर की यह भविष्यवाणी समझ नहीं आई थी। आज के भारतवर्ष की स्थिति यही है कि ‘चारों ओर सन्नाटा है।’ एक राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की आवाज इस सन्नाटे को चीरती है और फिर गहरा सन्नाटा छा जाता है। ऐसे में यदि कोई आवाज सुनाई देती है तो वह भी कपिल मिश्रा-जैसों की ही सुनाई देती है। कोई मुलायम सिंह, अखिलेश यादव अथवा मायावती-जैसे मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेता भी यह हिम्मत नहीं जुटा पाते कि वे दिल्ली के दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा कर सकें।

यह वही दिल्ली है जहां बंटवारे के बाद महरौली के सूफी संत हजरत बख्तियार काकी की मजार पर कव्वाली बंद हो गई थी। जब गांधी जी को यह पता चला तो 1948 में अपनी हत्या से केवल दस-बारह दिन पहले वह स्वयं उस मजार पर गए और कव्वाली शुरू करवाई। फिर किसी दंगाई कि यह मजाल नहीं हुई कि वह उस मजार को आंख उठाकर देखता। परंतु कभी गर्व से ‘मौलाना मुलायम’ कहलवाने वाला नेता भी आज दिल्ली के दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। नेता डरते हैं कि यदि वे मुस्लिम पक्ष में खड़ेहो गए तो उन पर हिंदू विरोधी होने का लांछन लग जाएगा। बस, फिर चुनाव तो डूब ही जाएगा।

सन 1947 और 2021 के भारत में यही अंतर है। आज राजनीति का दायरा केवल चुनाव तक सीमित हो गया है। जब राजनीति केवल समुदायों एवं जात-पात का समीकरण बन जाए तो फिर निश्चय ही देश का वही हश्र होता है जो आज है। मंडल के बाद उत्तर भारत इसी समुदाय एवं जात-पात के समीकरण के जंजाल में ऐसा फंसा कि पूछिए मत। मंडलवादी नेताओं ने जाति एवं समुदाय के समीकरण पर ‘पहचान’ की राजनीति की ऐसी प्रथा आरंभ की जिसकी मिसाल नहीं मिलती। नरेंद्र मोदी ने उसी ‘पहचान’ की राजनीति के तंत्र को एक बड़ा एवं नया स्वरूप दे दिया। मोदी ने समुदाय और जाति के समीकरणों को तोड़कर हिंदुत्व के आधार पर एक राष्ट्रव्यापी हिंदू समीकरण का रूप दे दिया और देश में एक नए हिंदू वोट बैंक की प्रथा आरंभ कर दी।

मोदी भी ‘पहचान’ (आइडेन्टिटी) की ही राजनीतिकर रहे हैं। परंतु इस राजनीति में ‘हिंदू वोट बैंक’ बनाए रखने के लिए निरंतर एक ‘मुस्लिम शत्रु’ की आवश्यकता बनी रहती है। क्योंकि यदि ‘मुस्लिम शत्रु’ का भय टूट गया तो हिंदू फिर जात में टूट जाएगा और साथ ही हिंदुत्व का तिलिस्म भी फूट जाएगा। अतः इस राजनीति को सफल बनाए रखने के लिए कभी मॉब लिंचिंग, तो कभी दिल्ली दंगे और कभी ‘लव जिहाद’ जैसे तंत्र आवश्यक हैं। ये सारे तंत्र यदि सत्तापक्ष के हाथों में हों और उस पर गोदी मीडिया का तड़का भी हो तो फिर इसका जादू ऐसा सिर चढ़कर बोलता है कि जिसका कोई जवाब नहीं है। आप मानें या न मानें, भारत इस समय काफी हद तक हिंदुत्ववादी हो रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि लोकसभा में तीन सौ से अधिक सीटें प्राप्त कर बीजेपी के पास अभी भी देश का केवल 38 प्रतिशत वोट ही है। परंतु सत्ता के सारे तंत्रों की सहायता से बीजेपी ने इस हिंदुत्व की धमक को देशव्यापी गूंज बना दिया है।

लोकसभा के पिछले चुनावों के आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत अभी भी हिंदुत्व से लड़ रहा है। लगभग 62 प्रतिशत मतदाताओं ने बीजेपी को स्वीकार नहीं किया था। इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि यदि विपक्ष एकजुट हो तो बीजेपी को परास्त किया जा सकता है। दूसरा बड़ा राजनीतिक पाठ यह है कि विपक्ष‘ पहचान’ की राजनीति से सफल नहीं हो सकता है। क्योंकि ‘पहचानों के समीकरण’ को तोड़कर सबसे बड़ी पहचान का एक राष्ट्रव्यापी वोट बैंक बना लिया गया है जो समुदाय एवं जातीय पहचान से बड़ा वोट बैंक है। स्पष्ट है कि विपक्ष को इस हिंदू वोट बैंक को तोड़कर एक नई राजनीति करनी होगी। वह राजनीति डर एवं भय की राजनीति नहीं हो सकती है। उसके लिए राहुल गांधी जैसा साहसी होना अनिवार्य है। यदि संपूर्ण विपक्ष उसी साहस से किसानों के साथ खड़ा हो जैसा राहुल और प्रियंका ने दिखाया है, तब तो काम चल सकता है।

दिल्ली दंगों के एक वर्ष बाद भारतीय राजनीति एक नए मोड़ पर तो है। किसान आंदोलन ने ‘पहचान’ की राजनीति को तोड़कर एक नया मार्ग दिखाया है। परंतु हिंदुत्व का नशा अभी पूरी तरह टूटा नहीं है। फिर, देश की व्यवस्था एवं सत्ता का संपूर्ण तंत्रअभी भी संपूर्ण रूप से बीजेपी के साथ है। ऐसे में बड़े संघर्ष की आवश्यकता है। अब विपक्ष का काम केवल रैलियों से नहीं चलने वाला है। किसानों के समान विपक्ष को भी बड़े आंदोलन छेड़ने होंगे। यदि एकजुट होकर विपक्ष अभी भी खड़ा हो जाए तो बीजेपी की राजनीति को तोड़ा जा सकता है। परंतु यह संघर्ष डर एवं आधे-अधूरे नारों से सफल होने वाला नहीं है।

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