कश्मीरः बीजेपी अपने फैसले पर नहीं चाहती कोई चर्चा, इसलिए PSA से फारुक, उमर और महबूबा की जुबां पर लगाया ताला

दिलचस्प है कि जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा छीने जाने और दो केंद्रशासित प्रदेश में विभक्त करने के बाद पीएसए उन चंद कानूनों में है, जिसे मोदी सरकार ने जस का तस रखा हुआ है। शेख अब्दुल्ला सरकार ने 1978 में लकड़ी तस्करों पर अंकुश लगाने के लिए यह कानून बनाया था।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया

जम्मू और कश्मीर के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों और अन्य कश्मीरी नेताओं पर क्रूर सार्वजनिक सुरक्षा कानून (पीएसए) लगाने का आधार बेहद बेतुका और विचित्र है। हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला को पीएसए के तहत हिरासत में रखने के आदेश दिए गए। पिछले सप्ताह तीन अन्य नेताओं, पीडीपी के नईम अख्तर और सरताज मदनी तथा नेशनल कांफ्रेंस के अली मोहम्मद सागर के खिलाफ पीएसए लगाया गया था। फारुक अब्दुल्ला भी पिछले साल अगस्त से ही नजरबंद हैं और उनके खिलाफ भी पीएसए लगा दिया गया है।

डोजियर के मुताबिक उमर अब्दुल्ला में काबलियत है कि वे लोगों को प्रभावित कर सकें और उन्हें वोट डालने के लिए प्रेरित कर सकें। उन पर सोशल मीडिया के जरिये लोगों को उकसाने का भी आरोप है। महबूबा मुफ्ती को ‘डैडीज गर्ल’ कहकर संबोधित किया गया है और उनके खिलाफ देश विरोधी बयान देने और गैरकानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत प्रतिबंधित जमाते इस्लामी जैसे संगठनों का समर्थन करने का आरोप है। उनकी पार्टी के कलम-दावात की फोटो वाले हरे झंडे को ‘कट्टर’ माना गया है।

14 अगस्तको हिरासत में लिए जाने से थोड़ी ही देर पहले उमर अब्दुल्ला ने लोगों से अपील की थी कि कश्मीर में आगे जो भी हो, वे हर कीमत पर शांति बनाए रखें। महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला, दोनों ने बीजेपी के साथ मिलकर सत्ता में भागीदारी की है। वाजपेयी सरकार में उमर अब्दुल्ला विदेश राज्यमंत्री रहे, जबकि महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर में 2016-2018 के बीच पीडीपी-बीजेपी सरकार का नेतृत्व किया।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब पीएसए के तहत लगाए गए आरोप अस्पष्ट, बेतुके और कानून के नजिरये से खरे नहीं उतरते हों। हां, यह पहली बार जरूर है, जब मुख्यधारा के नेताओं को चुन-चुनकर उनके खिलाफ यह कानून लगाया गया है। पीएसए ऐसा क्रूर और बेरहम कानून है जिसका पहले भी धड़ल्ले से दुरुपयोग किया गया है। यह सरकार को अधिकार देता है कि ऐसे व्यक्तियों को हिरासत में ले ले, जिनकी गतिविधियां उसे संदिग्ध लगें या जिनसे सार्वजनिक व्यवस्था के प्रभावित होने का उसे अंदेशा हो।

यह सरकार को इस बात की भी इजाजत देता है कि बिना आरोप या मुकदमे या बिना किसी ठोस सबूत के और हिरासत में रखने का कारण बताए बिना किसी को भी हिरासत में रख सके। पीएसए के तहत किसी व्यक्ति को अधिकतम दो साल के लिए हिरासत में रखा जा सकता है। इस कानून में 24 खंड हैं, जिनमें तमाम बेरहम प्रावधान हैं। सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की आशंका की स्थिति में तीन माह तक किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा हिरासत में रखा जा सकता है और इसे छह माह तक बढ़ाया जा सकता है। राज्य की सुरक्षा के लिए खतरे की स्थिति में किसी व्यक्ति को दो साल तक हिरासत में रखने का प्रावधान है।

दिलचस्प तथ्य है कि जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा छीने जाने और इसे केंद्रशासित दो प्रदेशों में विभक्त करने के बाद पीएसए पूर्व राज्य के उन चंद कानूनों में है जिसे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जस का तस रखने का फैसला लिया। इस कानून को शेख अब्दुल्ला की सरकार ने साल 1978 में बनाया था और इसका उद्देश्य लकड़ी तस्करों पर अंकुश लगाना था। लेकिन जम्मू-कश्मीर में दशकों से इस कानून का इस्तेमाल विरोधी नेताओं से बदला लेने के लिए किया जाता रहा है।

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव को आरटीआई के तहत यह जानकारी मिली कि मार्च, 2016 से अगस्त, 2017 के बीच जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में पीएसए निरस्त करने की 941 याचिकाएं डाली गईं, जिनमें से अदालत ने 764 को खारिज भी कर दिया। लेकिन किसी व्यक्ति को लगातार हिरासत में रखने के लिए प्रशासन बार-बार पीएसए लगा देता रहा। 2016 में जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज को पीएसए के तहत गिरफ्तार किया गया। डोजियर के मुताबिक उनके खिलाफ आरोप था कि वह सड़क पर खड़े होकर लड़कों को पत्थरबाजी के लिए उकसा रहे थे। आखिरकार कई महीने बाद हाईकोर्ट ने पीएसए के तहत उनकी हिरासत को खारिज कर दिया।

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट बार काउंसिल के अध्यक्ष मियां कयूम, जिनकी उम्र सत्तर से अधिक है, को 5 अगस्त को पीएसए के तहत गिरफ्तार किया गया और उन्हें आगरा की जेल में डाल दिया गया। जनवरी बीतते-बीतते उनकी तबियत बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें तिहाड़ जेल में शिफ्ट कर दिया गया। पीएसए के तहत उनकी गिरफ्तारी को इस आधार पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई कि उन पर लगाए गए आरोप अस्पष्ट, आधारहीन हैं और इसमें कोई भी ठोस कारण नहीं बताया गया है। अदालत ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के प्रशासनिक फैसले की समीक्षा करने के लिहाज से अदालत उचित फोरम नहीं है। इस पर विचार करने के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार के गृह विभाग का सलाहकार बोर्ड ही उचित फोरम है।

जिस तरह मुख्यधारा के नेताओं सहित आम लोगों के खिलाफ पीएसए लागू किया जा रहा है, उसमें एक पैटर्न साफ दिखता है। लोगों को तभी रिहा किया जा रहा है, जब वे इस आशय के बाण्ड पर दस्तखत कर दें कि वे जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के केंद्र सरकार के फैसले की आलोचना नहीं करेंगे। इससे साफ है कि सरकार चाहती है कि अनुच्छेद 370 पर सरकार के फैसले पर उंगली उठाने वाली किसी भी चर्चा को आपराधिक बना दिया जाए।

पीएसए के तहत जिस तरह लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है, उससे साफ अंदाजा लगता है कि सरकार जम्मू-कश्मीर में किस तरह का नियंत्रण चाहती है। कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों को पीएसए के तहत हिरासत में रखने की तरफदारी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में करते हुए कहा कि इन नेताओं ने जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया है, वे हमें मंजूर नहीं। यह स्पष्ट चेतावनी है कि सरकार अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके जिसे चाहे अपराधी करार दे सकती है। पीएसए ऐसा कानून है जिसका इस्तेमाल तमाम राजनीतिक दलों ने समय-समय पर अपने विरोधियों के प्रति खुन्नस निकालने के लिए किया और अब यही कानून उन्हीं लोगों पर पतले धागे से बंधे तलवार की तरह लटक रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि हाल के वर्षों में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, दोनों ही इस कानून को रद्द करने की बात कर रहे थे, लेकिन मौका मिलने के बाद भी किसी ने ऐसा नहीं किया। आज कश्मीर बेशक पीएसए की प्रयोगशाला हो सकती है, लेकिन जब राजनीति को निर्देशित करने का मूलमंत्र ‘ताकतवर ही सही है’ हो जाए तो पीएसए हो या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लोगों को सबक सिखाने के लिए ताकत का इस्तेमाल किसी भी हद तक किया जा सकता है।

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