फास्ट डिलीवरी, स्लो मेहनताना : गिग वर्कर्स की अनिश्चित जिंदगी

वर्गीकरण के लिहाज से ऐसे लोग जिस भी खाने में आते हों, उन्हें कर्मचारियों के सभी बुनियादी अधिकार तो मिलने ही चाहिए।

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अजीत रानाडे

कुछ साल पहले की बात है। मुंबई के बांद्रा में ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के दफ्तर के बाहर हजारों ओला और उबर ड्राइवरों ने प्रदर्शन किया था। उनकी कोई बहुत बड़ी मांग नहीं थीः बेहतर किराया, सही कमीशन, काम के मानवीय घंटे और मनमाने जुर्माने से कुछ सुरक्षा। सरकारी जवाब चौंकाने वाला था। बताया जाता है कि कमिश्नर ने तब उनसे कहा कि उनके अधिकार क्षेत्र में यह मामला नहीं आता क्योंकि वे ‘कर्मचारी’ नहीं बल्कि ‘बिजनेस पार्टनर’ थे। साथ ही कहा कि अगर वे पुराने जमाने के टैक्सी परमिट धारक होते, तो शायद वह उनकी मदद कर पाते, क्योंकि ऐसे लोगों के लिए नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं। 

वह पल आंखें खोलने वाला था, न सिर्फ कैब ड्राइवरों के लिए बल्कि उन लाखों मजदूरों के लिए भी जिन्हें अचानक पता चला कि काम से जुड़े सारे जोखिम उठाने के बावजूद उन्हें काम की कोई सुरक्षा नहीं। जिसे हम ‘गिग इकॉनमी’ कहते हैं, उसे अक्सर ऐप्स और एल्गोरिदम से पैदा एक नई श्रेणी के तौर पर देखा जाता है, लेकिन असल में यह एक पुरानी भारतीय श्रेणी है जो डिजिटल बाने में सामने आई है। 

लगभग दो दशक पहले असंगठित क्षेत्र पर अर्जुन सेनगुप्ता समिति ने एक चौंकाने वाला सच सामने रखा: असंगठित क्षेत्र के तकरीबन 64 फीसद मजदूर स्वनियोजित थे, और इसलिए उनका कोई नियोक्ता नहीं था। ऐसा इसलिए क्योंकि वे थोड़े-थोड़े समय के लिए कई लोगों के लिए काम करते थे। वे स्वनियोजित, कैज़ुअल, पीस-रेट पर काम करने वाले मजदूर थे- जैसे कंस्ट्रक्शन मजदूर, घर पर काम करने वाले, सड़क किनारे ठेला लगाने वाले। आज के गिग वर्कर उन्हीं के टेक्नोलॉजिकल वंशज हैं।

तो अब गिग वर्कर इतने संगठित तरीके से विरोध क्यों कर रहे हैं? इसलिए कि प्लेटफॉर्म-आधारित काम की व्यापकता ने निर्भरता की प्रकृति को बदल दिया है। कैब ड्राइवरों को ही लें। मुंबई में हाल के प्रदर्शनों में लगभग 90 फीसद ऐप-आधारित कैब सड़कों से हट गईं, जिसमें ड्राइवरों ने काली-पीली टैक्सियों के बराबर किराया, कमीशन की सीमा तय करने, वेलफेयर बोर्ड और राज्य-स्तरीय गिग वर्कर कानून की मांग की। फूड-डिलीवरी वर्कर, वेयरहाउस पिकर और इंस्टेंट-कॉमर्स राइडर्स में भी ऐसा ही गुस्सा है। देशव्यापी हड़तालों में न्यूनतम मासिक आय, काम के तय घंटे और सामाजिक सुरक्षा की मांग की गई।


इस क्षोभ की जड़ में एक सीधी-सी असमानता है। प्लेटफॉर्म जोर देते हैं कि काम करने वाले मजदूर स्वतंत्र उद्यमी और बिजनेस सहयोगी हैं। फिर भी, प्लेटफॉर्म कीमतें तय करते हैं, काम बांटते हैं, जुर्माना लगाते हैं, काम रोक देते हैं, पैरामीटर बदलते हैं और अपारदर्शी एल्गोरिदम के जरिये नियमों को लगातार बदलते रहते हैं। इस बीच, लोग अपना खुद का पैसा लगाते हैं- गाड़ी, ईंधन, स्मार्टफोन, बीमा- और खुद ही नुकसान का सारा जोखिम उठाते हैं। उन्हें नियोक्ता की ओर से दुर्घटना बीमा भी नहीं मिलता, जो कार्यस्थल पर चोट लगने पर मिलने वाले कवर जैसा होता। इस असमानता को उद्यमिता नहीं कहा जा सकता; यह बड़े की ओर से छोटे की तरफ जोखिम को गलत तरीके से ट्रांसफर करना है।

प्लेटफॉर्म सीईओ जानी-पहचानी-सी सफाई देते हैं कि रोजगार न होने से तो बेहतर है कि अनिश्चित रोजगार हो; ज्यादा रेगुलेशन से इनोवेशन खत्म हो जाएगा। भारत को नौकरियों की जरूरत है और इसमें शक नहीं कि प्लेटफॉर्म ने काम तक पहुंच को बढ़ाया है। लेकिन एक ऐसा श्रम बाजार जो मजदूरों को बुनियादी सुरक्षा से वंचित करके और उन्हें ज्यादा असुरक्षित बनाकर रोजगार पैदा करता है, वह विकास का टिकाऊ मॉडल नहीं।

पारंपरिक रूप से मजदूर आंदोलन फैक्टरियों और पहचाने जा सकने वाले मालिकों को केंद्र में रखकर होते थे। गिग वर्कर्स के पास ये दोनों ही नहीं हैं। वे सचमुच में, बिना नियोक्ता के हैं। यही वजह है कि उनका सामूहिक एक्शन मायने रखता है, और कई मायनों में यह जरूरी भी था। 

जब डिलीवरी वर्कर एक साथ काम पर नहीं आते या कैब ड्राइवर हड़ताल करते हैं, तो वे एक ऐसी सच्चाई सामने लाते हैं जिसे समझने में कानून धीमा रहा है: ठेके के लेबल से कहीं ज्यादा आर्थिक निर्भरता मायने रखती है। कोर्ट और रेगुलेटर अब यह समझने लगे हैं। बिना लाइसेंस काम करने वाले कैब एग्रीगेटर पर जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणियां कीं तो वे जितनी यात्रियों की सुरक्षा के बारे में थीं, उतनी ही वर्कर की असुरक्षा के बारे में थीं।

दुनिया भर में हालात बदल रहे हैं। यूके की सुप्रीम कोर्ट ने उबर ड्राइवरों को ‘वर्कर’ के तौर पर वर्गीकृत किया; जिन्हें न्यूनतम वेतन और सवेतन छुट्टी का हक है। स्पेन का राइडर कानून फूड-डिलीवरी राइडर्स को कर्मचारी मानता है। कई देशों ने बीच की एक श्रेणी बनाई है - न तो पूरे कर्मचारी और न सिर्फ कॉन्ट्रैक्टर - लेकिन इन्होंने भी न्यूनतम अधिकारों को कानूनी तौर पर लागू किया है। अंतरराष्ट्रीय उदाहरण एक बात पर एकमत हैं: लचीलेपन का मतलब वर्कर के लिए अधिकारों की कमी नहीं होनी चाहिए।


सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 ने पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को एक अलग श्रेणी के रूप में मान्यता दी लेकिन इस संदर्भ में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। राज्य द्वारा तैयार की गई सोशल सिक्योरिटी स्कीम के लिए योग्यता और प्रस्तावित शर्तें- किसी एग्रीगेटर के साथ 90 दिन का काम या कई प्लेटफॉर्म पर 120 दिन का काम- स्वागत योग्य हैं क्योंकि इससे ये लोग बीमा और हेल्थ कवर जैसे सुविधाओं के लिए योग्य होते हैं। ई-श्रम, वेलफेयर बोर्ड और कंट्रीब्यूटरी फंड-जैसे प्लेटफॉर्म टर्नओवर पर लेवी- के जरिये रजिस्ट्रेशन एक सेफ्टी नेट बना सकता है।

जिस मामले में यह कोड पीछे रह जाता है, वह है सबसे महत्वपूर्ण लेबर अधिकार: न्यूनतम वेतन, काम के घंटों की सीमा, सामूहिक तोलमोल की ताकत, मनमाने ढंग से हटाए जाने के खिलाफ मजबूत सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा काफी हद तक विवेकाधीन और स्कीम-आधारित बनी हुई है। ज्यादातर वर्कर्स के लिए, जिनकी कमाई रोजाना बदलती रहती है और जिनके काम कभी भी रोके जा सकते हैं, यह एक बहुत कमजोर सुरक्षा है।

हाल के विरोध प्रदर्शनों की अहमियत यह है कि वे भारत के संरचनात्मक बदलाव के बारे में क्या संकेत देते हैं। ऐसा नहीं है कि प्लेटफॉर्म ने अनौपचारिक रोजगार का ट्रेंड शुरू नहीं किया, बल्कि उन्होंने इसे और बढ़ाया। जरूरत इसे ज्यादा से ज्यादा औपचारिक बनाने की है। 

अगर भारत में काम का भविष्य तेजी से प्लेटफॉर्म-आधारित होता जा रहा है, तो औपचारिक बनाने का मतलब यह नहीं हो सकता कि सभी के पास मानक रोजगार यानी नौकरियां हों। इसका मतलब यह होना चाहिए कि सभी वर्कर को, चाहे वे किसी भी श्रेणी में आते हों- कर्मचारी, बिजनेस सहयोगी या फिर स्वनियोजित ठेकेदार- न्यूनतम वेतन मानक, सुरक्षा, बीमा का लाभ मिले। 

जरूरी है कि बाजारों को नियमों में बांधा जाए, ताकि गरिमा के साथ इनोवेशन हो। अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी ने बहुत पहले तर्क दिया था कि सुरक्षारहित विकास से असुरक्षा और नाराजगी पैदा होती है। उस चेतावनी की गूंज आज साफ सुनाई दे रही है। 

नीति बनाने वालों के लिए चुनौती गिग इकॉनमी को सभ्य बनाना है। अगर भारत इस संतुलन को बना पाता है, तो गिग इकॉनमी स्थायी असुरक्षा और अनिश्चितता की बंद गली बनने के बजाय, ज्यादा औपचारिक, समावेशी श्रम बाजार का पुल बन सकती है। यही असली इनोवेशन होगा।

·         अजीत रानाडे जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। सौजन्य: द बिलियन प्रेस

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