खरी-खरीः पहले कोरोना ने पैदा की बेरोजगारी और भुखमरी, अब आत्महत्याएं ले लेंगी महामारी का रूप?

बेरोजगारी ने तो कोरोना से भी बड़ी महामारी का रूप ले चुकी है। भारत ही नहीं, संसार की अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न है। हमारे भारतीय युवा दुनियाभर में कोने-कोने में अपने हुनर से रोजगार ढूंढ लेते हैं। लेकिन हर देश में कोरोना ने आदमी तो खाए ही, रोजगार भी खा गया।

फोटो: सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

हम और आप एक ऐसे युग में जी रहे हैं जिसकी कल्पना किसी ने कभी सपने में भी नहीं की थी। यह कोरोना वायरस युग है। इस युग में चारों ओर अंधकार ही है और साथ में हर व्यक्ति के सिर पर अनिश्चितता की तलवार लटक रही है। मैं अभी यह लेख लिख रहा हूं, मुझे पता नहीं कल मुझको कोरोना वायरस जकड़ ले और चार दिनों पश्चात इसी बीमारी में मेरे प्राण भी जा सकते हैं। पूरी मानवता एक ऐसे अंधकार में है जिसका सवेरा अभी तो कहीं नजर नहीं आ रहा है। भला बताइए, दुनिया के सबसे दौलतमंद और सशक्त देश अमेरिका में प्रतिदिन पचास हजार से अधिक व्यक्ति कोरोना महामारी के शिकार हो रहे हैं। स्वयं भारत कोरोना तालिका में संसार में तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। ऐसी महामारी के युग में नेताओं की कुछ अजीब सोच है। अमेरिका में जहां कोरोना महामारी का प्रकोप अपनी चरम सीमा पर है, वहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात पर अड़े हैं कि अमेरिका में बच्चों के स्कूल खुलने चाहिए। भला बताइए, ट्रंप- जैसा जिद्दी व्यक्ति ऐसी महामारी की परिस्थितियों में स्कूल खुलवाकर बच्चों की जान खतरे में डालने पर तुला है।

भारत में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। बीजेपी सरकार की तो मूल नीति ही यही है कि हर चिंता को एक अवसर में बदल दो। और यह सरकार भाग्यवान भी है कि इसको चिंताओं को अवसर में बदलने के मौके भी खूब मिलते हैं। जब भारत कोरोना महामारी से पीड़ित होकर संसार में तीसरे नंबर पर पहुंच गया तो लद्दाख में चीनी फौज ने घुसकर सरकार को गलवान घाटी की चिंता बख्श दी। बस हमारे प्रधानमंत्री को एक अवसर मिल गया। अब सारा देश ‘गो कोरोना- गो’ भूलकर ‘गो चीन- गो’ की माला जपने लगा। और क्यों न जपे! टीवी चैनल सरकार की सेवा में अर्पित हैं। अब टीवी चैनलों पर केवल चीन ही चीन है, मानो देश की संपूर्ण समस्याएं समाप्त हो चुकी हैं। बस, अब चीन के खिलाफ भारत की विजय के चर्चे हैं। ऐसा लगता है कि कोरोना की समस्या भारत से समाप्त।

पर समस्याएं तो समस्याएं ही होती हैं। यदि उनका समाधान न हो तो आप उनको लाख दबाइए, वे एकदम से सर उठा ही लेती हैं। जब टीवी चीन-चीन कर रहा था तो एक पत्रकार ने कोरोना वायरस से तंग आकर दिल्ली में एम्स-जैसे सरकारी अस्पताल में चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। इस प्रकार एक बार फिर देश को कोरोना की याद आ गई। अरे, आत्महत्यातों इन दिनों खिलवाड़ होती जा रही है। फिल्म अभिनेता, पत्रकार, आम आदमी जिसको देखो आत्महत्या कर रहा है। और हालात ही ऐसे हैं कि अक्सर लोग घबराकर आत्महत्या की राह लेने को तैयार हैं क्योंकि कोरोना महामारी की दोधारी तलवार सर पर लटक रही है। पहले तो इस बीमारी में प्राण गंवाने का खतरा। यदि आप इससे बच भी गए तो यह पता नहीं कि आपकी रोजी-रोटी बचेगी या नहीं। आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि पिछले तीन माह में पंद्रह करोड़ लोग बेरोजगार हो चुके हैं। आप जानते हैं कि अर्थशास्त्रियों को आंकड़े फॉर्मल सेक्टर के ही होते हैं। छोटे-मोटे काम-धंधों के आंकड़े महीनों की खोजबीन के पश्चात मिलते हैं। ये पंद्रह करोड़ बेरोजगार वे हैं जो फॉर्मल सेक्टर में थे। वे मजदूर-कारीगर जो पैदल चलकर अपने गांव-घर पहुंचे हैं और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं, वे किसी गिनती में नहीं हैं।

इसी प्रकार, मान लीजिए मेरी एक दुकान है। लॉकडाउन से पहले उसमें चार सेल्समेन थे। तीन महीने के बाद जब दुकान खुली तो मैंने चार में से तीन को बाहर कर दिया। इसी प्रकार दिल्ली जैसी महानगरी में दो-चार लोग ड्राइवरी का काम-धंधा करते थे। उनमें से आधे से ज्यादा लोग बाहर कर दिए गए। इन बेचारों के पास कितनी जमा पूंजी है कि घर बैठे खा लें। कुछ दिनों तक उधारबाजी से काम चल सकता है। फिर क्या। इस फिर क्या का जब कोई उत्तर लंबे समय तक नहीं मिलता और आंखों के सामने बीवी-बच्चे भूख से बिलकते दिखते हैं तो फिर अकसर आत्महत्या का ही रास्ता दिखाई पड़ता है जो अब समाज में आए दिन दिखाई पड़ रहा है।

उधर, बेरोजगारी है कि वह तो कोरोना से भी बड़ी महामारी का रूप ले चुकी है। भारत ही नहीं, सारे संसार की अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न है। हमारे भारतीय नौजवानों का यह कमाल है कि वे दुनियाभर में कोने-कोने में अपने हुनर से रोजगार ढूंढ लेते हैं। लेकिन हर देश में कोरोना ने आदमी तो खाए ही, रोजगार भी खा गया। इसकी चोट अब भारतीय प्रवासी कामगारों पर पड़ रही है। अभी कल की ही बात है। समाचार पत्रों में चर्चा थी कि केवल कुवैत-जैसा छोटा-सा देश आठ लाख भारतीय प्रवासी कामगारों की छुट्टी करने जा रहा है। उधर, डोनाल्ड ट्रंप रोज एच1बी वीजा रद्द करने की धमकी दे रहे हैं। अगर कहीं ऐसा हो गया तो लाखों आईटी कामगार अमेरिका से वापस भारत आ जाएंगे। ऐसे में, दुनियाभर से लौटे प्रवासी भारतीयों को इस माहौल में कोई रोजगार कहां मिलेगा। ऐसे माहौल में उनमें से कितने आत्महत्या करें, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।

फिर, देश में कौन-सा कारोबार है जो चौपट नहीं हो चुका है। एक समय था कि भारत में सिविल एविएशन सेक्टर में बहार थी। हवाई अड्डे रेलवे स्टेशनों के समान भीड़ से भरे रहते थे। अब हवाई अड्डों पर सन्नाटा पसरा हुआ है। और इस सेक्टर में लाखों लोगों की नौकरियां इस सन्नाटे की चपेट में आती जा रही हैं। यही हाल पर्यटन, होटल और रेस्टोरेंट इंडस्ट्री का है। ढाबे से लेकर पांच सितारा होटल तक सब सन्नाटे में हैं और बेरोजगारी का शिकार होते जा रहे हैं। अभी कल एक पत्रकार मित्र का फोन आया। बोले- बहुत अच्छी स्टोरी है, लेंगे? उनको पहाड़ों में घूमने का बड़ा शौक है। मैंने पूछा- पहले बताइए, शिमला-मनाली घूम आए? वह चमक कर बोले- घूम भी आए और बड़ी स्टोरी भी ले आए। मैंने पूछा- क्या स्टोरी है? वह बोले- पहाड़ों पर भुखमरी फैल रही है। मैंने पूछा-वह क्यों? बोले- पहाड़ों पर घूमने जाने वाले इसी गर्मी के मौसम में तो जाते हैं। तीन महीने के लॉकडाउन ने पहाड़ों में काम-धंधों का लॉकडाउन कर दिया। वहां तो होटल बंद, टैक्सी गायब, लोग बेरोजगार होकर निठल्ले घूम रहे हैं। मेरा एक मित्र ठीक-ठाक होटल चलाता था, अब सब्जी की दुकान चला रहा है।

यही हाल है इनफॉर्मल सेक्टर का। जनाब, कहीं भी बाजार चले जाइए, दुकानें तो खुल गई हैं लेकिन ग्राहक कहीं दो-चार भी नहीं। सब्जी, फल, दाल, चावल, आटा- जैसे आवश्यक सामान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बिक रहा है। अरे, लोग कपड़े तक नहीं खरीद रहे हैं। बाजारों में रौनक नहीं, तो फिर न जाने कितनों के पेट की रौनक भी मारी गई समझिए। भारत का सबसे बड़ा व्यवसाय दुकानदारी ही तो है। जब दुकानदारी चौपट तो फिर अर्थव्यवस्था कैसे चले और रोजगार कहां से आए? बस, यूं समझिए कि बेरोजगारी की महामारी कोरोना महामारी से भी अधिक तेजी से फैल रही है। जितने लोग कोरोना में रोज बीमार पड़ रहे हैं, उससे अधिक बेरोजगारी का शिकार हो रहे हैं।

जी हां, एक अनिश्चितता है जो मानवता को चारों ओर से जकड़ती जा रही है। कब कोरोना का शिकार हो जाइए, कुछ पता नहीं। कब अच्छी-खासी लगी नौकरी चली जाए इसका भी कुछ पता नहीं। ऐसे में, जाएं तो जाएं कहां। जब यह गुत्थी किसी प्रकार नहीं सुलझ पाती तो फिर अकसर आत्महत्या का ही रास्ता सूझता है। भगवान बचाए इस बला से। परंतु आत्महत्या एक महामारी न बन जाए, बस यही प्रार्थना कीजिए।

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