चारा घोटालाः लालू यादव दोषी करार, लेकिन आखिर में शायद जीत उन्हीं की हो

बीजेपी की सोच के विपरीत जेल में बंद लालू यादव शायद और अधिक मजबूत दुश्मन में तब्दील हो सकते हैं। जगन्नाथ मिश्र का बरी होना उनके हमलों को और धार देगा।

फोटोः सोशल मीडिया
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उत्तम सेनगुप्ता

लालू प्रसाद यादव ने कहा था, “यह अभियान सिर्फ बीजेपी को फायदा पहुंचाएगा।” उस समय वह बिहार के मुख्यमंत्री थे और चारा घोटाला मामले में सीबीआई जांच के लिए एक याचिका पटना हाई कोर्ट में लंबित थी। इस मामले से चिंतित मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने अपने कुछ विश्वस्त अधिकारियों और इस लेखक को, जो तब पटना में दि टाइम्स ऑफ इंडिया का रेजिडेंट एडीटर था, इसके परिणामों पर चर्चा के लिए बुलाया था।

उस बैठक के दौरान अखबारों में इस मामले पर उच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई की खबरों और उसके साथ छपने वाली वित्तीय घोटाले की ओर इशारा करती खबरों से परेशान मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार के पक्ष को भी छापने की मांग की थी।

उस बैठक में सतर्कता विभाह के तत्कालीन निदेशक ने एक फाइल पेश किया और नेता विपक्ष की अध्यक्षता वाली विधान सभा की लोक लेखा समिति (पीएसी) द्वारा मुख्यमंत्री को संबोधित एक पत्र की ओर ध्यान दिलाया। यह पत्र 1993 में कभी लिखा गया था, जिसमें मुख्यमंत्री से पशुपालन घोटाले में पुलिस और सतर्कता विभाग को तब तक कोई कदम नहीं उठाने का आदेश देने के लिए कहा गया था, जब तक पीएसी इस मामले की जांच पूरी नहीं कर लेती। पत्र में सूचित किया गया था कि पीएसी ने पशुपालन विभाग की सभी फाइलों और दस्तावेजों को अपने कब्जे में ले लिया है।

तीन साल बाद पुलिस महानिदेशक और सतर्कता विभाग के महानिदेशक को आगे की कार्रवाई के लिए भेजे गए पत्र पर मुख्यमंत्री की नोटिंग को कोई भी देख सकता था। लालू प्रसाद यादव जो मुद्दा उठा रहे थे वह यह था कि उनकी सरकार ने पीएसी की वजह से पशुपालन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की थी। उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि जैसे ही उन्हें जनवरी, 1996 में घोटाले की जानकारी मिली, उन्होंने प्राथमिकी दर्ज करने और अपराधियों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया था।

वह सही कह रहे थे। 1996 के पहले तीन महीने में राज्य पुलिस ने 60 से ज्यादा अधिकारियों और आपूर्तिकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया था और झारखंड के अलग-अलग जिलों में एक दर्जन से ज्यादा मामले दर्ज किए थे, जो उस समय बिहार में थे।

लेकिन 1993 में जब पीएसी अध्यक्ष ने सीएम को पत्र लिखा, तो वह रांची एयरपोर्ट पर पैदा हुए एक नाटकीय दृश्य की वजह से महत्वपूर्ण था, जिसे मीडिया में बहुत कम जगह मिली थी। रांची स्थित हिंदी अखबार प्रभात खबर पहला और संभवतः एकमात्र अखबार था जिसने इस घटना की खबर छापी थी।

एक गुप्त सूचना पर कार्रवाई करते हुए आयकर विभाग ने कई पशुपालन अधिकारियों और उनके परिजनों को दिल्ली जाने वाले इंडियन एयरलाइंस के एक विमान से उतार लिया था। इंडियन एयरलाइंस के कर्मचारियों और वहां मौजूद पोर्टर ने अधिकारियों के परिजनों और पत्नियों को अपने हैंडबैग से नगद और जेवरात निकालते देखा था, क्योंकि उन्हें तलाशी, जब्ती और पूछाताछ के लिए वापस टर्मीनल ले जाया जा रहा था।

सत्तर के दशक में रांची में पशुपालन अधिकारियों की आलीशान जिंदगी और फिजुलखर्ची शहर भर में चर्चा का विषय हुआ करती थी। उन दिनों भी पशुपालन विभाग के अधिकारियों के परिवार की शादियों में बॉम्बे से कलाकरों का आकर डांस करना आम बात थी। शादी में आए मेहमान अक्सर मंहगे तोहफों के साथ लौटते थे। इसलिए विभाग में हमेशा भ्रष्टाचार को लेकर चर्चा रहती थी लेकिन इसको रोकने के लिए कभी कोई जांच या कार्रवाई नहीं हुई।

ऐसा प्रतीत होता है कि हवाईअड्डा की घटना के बाद पीएसी सक्रिय हो गई थी और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ आगे की जांच और दंडात्मक कार्रवाई में अड़ंगा लगा रही थी। लेकिन जैसा कि इस लेखक ने उस समय तर्क दिया था कि वह पत्र यह साबित करता है कि सरकार और मुख्यमंत्री को घोटाले की जानकारी थी और फिर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई थी।

यह भी संभव प्रतीत होता है कि लालू प्रसाद यादव को इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि किस तरह सार्वजनिक निधियों का गबन किया जा रहा है। इस मामले में निश्चित रूप से वह लाभार्थियों में से एक थे और घोटालेबाजों से चंदा और अन्य तरह के लाभ हासिल करते थे, लेकिन डॉ जगन्नाथ मिश्र के विपरीत लालू प्रसाद को आंकड़ों की समझ नहीं थी। वह कोई अर्थशास्त्री नहीं थे जैसा कि जगन्नाथ मिश्र ने खुद को बनाया था। और उन्होंने संभवतः मंत्रियों और अधिकारियों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा कर लिया था, जो कि उन्हें नुकसान पहुंचा सकता था।

लेकिन तथ्य यह है कि राज्य के वित्त मंत्री के रूप में अपने सामने मुंह बाए खड़े उन भयानक आंकड़ों पर ध्यान दिए बिना उन्होंने साल दर साल बजट पेश किया। ईमानदारी से कहा जाए तो किसी ने भी बजट दस्तावेजों के आंकड़ों पर गौर नहीं किया। ना ही विधायकों, ना ही अधिकारियों और मीडिया ने और ना तो कैग ने इन आकड़ों पर कभी कोई ध्यान दिया।

इसीलिए पशुपालन विभाग, जिसका आमतौर पर सालाना बजट 50 करोड़ रुपए होता था, वह हर साल इससे कहीं ज्यादा खर्च करता था। एक साल तो वास्तव में इसने 200 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर दिया था, लेकिन अगले ही साल 50 करोड़ रुपए के करीब के साधारण आवंटन की मांग की।

इस मामले के पूनरावलोकन में दिखेगा कि इसमें हर किस की सहभागिता थी। जैसा कि पटना हाई कोर्ट ने उस समय कहा था, “इस प्रकार की दिन दहाड़े डकैती बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के इतने दिन तक जारी नहीं रह सकता था।” और यही कारण है कि उसने उस राजनीतिक षड़यंत्र को उजागर करने के लिए सीबीआई जांच का आदेश दिया था, जिसकी वजह से चारा घोटाला हुआ।

यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि सार्वजनिक निधियों का गबन लालू यादव यादव के 1990 में मुख्यमंत्री बनने से कहीं पहले शुरू हो चुका था।

इस आलेख के लिखे जाने तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि अदालत ने पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को क्यों बरी कर दिया है? लेकिन निश्चित तौर पर ऐसा नहीं हो सकता था, क्योंकि जगन्नाथ मिश्र अब बीजेपी के साथ हैं? लालू प्रसाद जेल में रहें या बाहर हर स्थिति में वह एक शक्तिशाली, राजनीतिक ताकत बने रहेंगे। जगन्नाथ मिश्रा को निर्दोष घोषित किया जाना उनके इस दावे को अतिरिक्त धार देगा कि उन्हें गलत तरीके से प्रताड़ित किया गया है और उनके साथ भेदभाव किया गया है।

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Published: 23 Dec 2017, 9:24 PM