आकार पटेल : मोदी जी सब चंगा सी, लेकिन एक बार आंकड़ों को तो देख लें...

हाल में जो भी घोटाले या मुद्दे सामने आए हैं उनसे कुछ दिनों के लिए तो इन हालात को पर्दे के पीछे भेजा जा सकता है, लेकिन हकीकत फिर से हमारे सामने खड़ी होगी। तब तक जिंदगी ऐसे ही चलती रहेगी क्यों कि सरकार की नजर में तो सब चंगा सी...

फोटो : Getty Images
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आकार पटेल

अभी कुछ हफ़्ते पहले तक, भारत में और कुछ हद तक दुनिया में भी मीडिया पर जो मुद्दा हावी था, वह था भारत में महामारी के प्रबंधन का। जैसा कि राज्यों के मुख्यमंत्री बता रहे हैं, कोरोना वैक्सीन की सप्लाई में अभी भी कमी है, लेकिन फिलहाल यह मुद्दा कहीं पीछे छूट गया है। इसकी जगह एक और खबर ने अखबारों की सुर्खियों में जगह बना ली है, और वह है पेगासस, यानी इजरायली सॉफ्टवेयर जिसे सरकार ने कथित तौर पर पत्रकारों, राजनेताओं, यौन उत्पीड़न पीड़ितों और उनके रिश्तेदारों और सीबीआई अधिकारियों की जासूसी करने के लिए खरीदा और इस्तेमाल किया। सरकार को ये सब क्यों करना पड़ा हमें नहीं पता और शायद कभी पता भी नहीं चलेगा। भारत लोकतांत्रिक देश है लेकिन यह अब धुंधला चुका है। सरकार अब एक राजशाही की तरह चलती है और चुने हुए नेता को सवालों के जवाब देने या प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की जरूरत नहीं होती है। जो मीडिआ सच्चाई बताने की कोशिश करता है उस पर छापेमारी की जाती है।

लेकिन इस बार का लेख इस बारे में नहीं है। बल्कि उस मुद्दे के बारे में है जो मोदीयुग में हाशिए पर रहा है। और वह है कि आने वाले वक्त में यानी भविष्य में हमारा क्या होगा या हम भविष्य में कहां होंगे। जिस तरह पेगासस या कोविड पर सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है, वैसे ही इस बात का भी जवाब नहीं आया है कि आखिर हमारी अर्थव्यवस्था की स्थिति आज ऐसी क्यों है और आने वाले वक्त में कैसी होगी। लेकिन तथ्यों को छुपाया नहीं जा सकता। तथ्य और आंकड़े हमारे सामने हैं। इन्हें देखकर आप खुद तय कीजिए कि भारत आज कहा हैं और किस तरफ ले जाया जा रहा है।

महामारी से पहले ही देश के सबसे गरीब भारतीयों द्वारा भोजन पर खर्च में गिरावट आ चुकी थी। 2011-12 की तुलना में 2017-18 में भारतीयों का उपभोक्ता खर्च कम हो चुका था। इस पर सरकार की ओर से आंकड़े तो आए लेकिन जारी नहीं किए गए। मोदी के नेतृत्व में बेरोजगारी लगातार बढ़ी। मोदी के शासन में काम करने वाले भारतीयों की कुल संख्या 2013 में 44 करोड़ से घटकर 2016 में 41 करोड़ और 2017 में 40 करोड़ और फिर 2021 में 38 करोड़ हो गई। हालांकि कार्यबल 79 करोड़ से बढ़कर 106 करोड़ हो गया। नतीजतन, मोदी सरकार के कार्यकाल में भारतीय मध्यम वर्ग का विकास थम गया। आठ प्रमुख शहरों (अहमदाबाद, बैंगलोर, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता, मुंबई और पुणे) में आवासीय बिक्री 2012 में 3.3 लाख इकाइयां थी जो 2019 में 3.2 लाख पर ही स्थिर रही। वहीं 2020 में यह 1.5 लाख इकाई तक गिर गई।

यात्री वाहनों की बिक्री भी बीते करीब एक दशक से स्थिर ही है। 2012 में 27 लाख वहान बिके थे, जो 2019 और 2020 में भी 27 लाख ही रहे। दोपहिया वाहनों की बिक्री 2014 में 1.6 करोड़, 2019 में 1.7 करोड़ और 2020 में 1.5 करोड़ पर स्थिर रही। तिपहिया वाहनों की बिक्री 2012 में 5 लाख, 2015 में 5 लाख, 2016 में 5 लाख, 2019 में 6 लाख और 2020 में 2 लाख कमर्शियल वाहनों की बिक्री 2012 में 7.9 लाख, 2015 में 6 लाख, 2016 में 7 लाख, 7 लाख थी। 2019 में और 2020 में 5.6 लाख रही।


2014 में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स (एयर कंडीशनर, वाशिंग मशीन, टेलीविज़न सेट आदि) का कुल भारतीय बाजार 2020 तक 1,50,000 करोड़ रुपये होने का अनुमान था। लेकिन 2019 में यह 76,400 करोड़ रुपये और 2020 में 50,000 करोड़ रुपये तक ही पहुंच पाया।

कुल यात्री (रेल और हवाई यात्री मिलाकर) 2012 में 840 करोड़ से गिरकर 2019 में 826 करोड़ हो गए, और ध्यान रहे कि यह महामारी से पहले की बात है। चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग ने एक सूचकांक विकसित किया है जो तीन संकेतकों के माध्यम से वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि को मापता है: रेलवे कार्गो की मात्रा, बिजली की खपत और वितरित ऋण। 2014, 2015, 2016, 2017 और 2018 में रेलवे द्वारा कुल 1.1 बिलियन टन माल ढोया गया था। यह 2019 में 1.2 बिलियन टन और 2020 में 1.2 बिलियन था। 2017, 2018, 2019 में चार वर्षों के लिए बिजली उत्पादन 1.3 बिलियन यूनिट पर रहा और 2020 में जबकि भारत की जनसंख्या में 7 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई। उद्योग के लिए बैंक ऋण की वृद्धि 2013 में 15 प्रतिशत से गिरकर मार्च 2014 में 12 प्रतिशत, 2015 में 5 प्रतिशत, 2016 में 2.7 प्रतिशत, 2017 में शून्य से 1.7 प्रतिशत, 2018 में 0.7 प्रतिशत और 2019 में 6.9 प्रतिशत हो गई। मध्यम आकार के उद्योगों को ऋण की वृद्धि मार्च 2014 में शून्य से 0.5 प्रतिशत, 2015 में 0.4 प्रतिशत, 2016 में शून्य से 7.8 प्रतिशत, 2017 में शून्य से 8.7 प्रतिशत, 2018 में शून्य से 1.1 प्रतिशत और 2019 में 2.6 प्रतिशत थी। यह सब महामारी से पहले की बातें हैं। सूक्ष्म और लघु उद्योगों को ऋण मार्च 2016 में शून्य से 2.3 प्रतिशत बढ़ा, 2017 में शून्य से 0.5 प्रतिशत, 2018 में 0.9 प्रतिशत और 2019 में 0.7 प्रतिशत। मोदी से पहले, 2009 और 2013 के बीच, ऋण वितरण में (गैर-खाद्य ऋण) औसतन 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

यह सब मोदी सरकार के प्रदर्शन का नतीजा है। तो आखिर स्थिति यहां तक कैसे पहुंची? भविष्य क्या है आखिर हमारा? हम दुनिया से प्रतिस्पर्धा कैसे करेंगे और अगर यही स्थितियां रही तो करोड़ों लोगों को गरीबी से कैसे बाहर निकालेंगे?

हमें इसका जवाब नहीं पता, और सरकार की या तो ये सब मानने में दिलचस्पी ही नहीं है कि हालात क्या हो चुके हैं या फिर वह इन सबका जवाब देना ही नहीं चाहती कि वह इससे उबरने के लिए क्या कर रही है। हाल में जो भी घोटाले या मुद्दे सामने आए हैं उनसे कुछ दिनों के लिए तो इन हालात को पर्दे के पीछे भेजा जा सकता है, लेकिन हकीकत फिर से हमारे सामने खड़ी होगी। तब तक जिंदगी ऐसे ही चलती रहेगी क्यों कि सरकार की नजर में तो सब चंगा सी...

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