हिंदी और उर्दू बोलने वालों के पूर्वज एक ही हैं

यूरेशियाई क्षेत्र के चरवाहों का संबंध स्थानीय लोगों से हुआ, जो ईरान के किसान और स्थानीय आखेटकों की संताने थीं। अधिकतर कुलीन जो हिंदी या उर्दू जैसी भाषा बोलते हैं इन्हीं यूरेशियाई चरवाहों के वंशज हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया
user

महेन्द्र पांडे

भारतीय उपमहाद्वीप भाषा, जाति, संप्रदाय और वर्ण के आधार पर पूरी तरह बंटा हुआ है। यहां सभी लोग रहते तो हैं पर सामाजिक सौहार्द्र नहीं है। सारे धर्म या समुदाय के लोग एक दूसरे से अपने आप को श्रेष्ठ समझते हैं और स्वयं को यहां का मूल निवासी भी मानते हैं। शायद यहां के लोग यह नहीं जानते कि पूरे दक्षिण एशिया की आबादी के पूर्वज एक ही हैं। वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र से प्राप्त बहुत पुराने कंकालों से डीएनए अलग कर उसका अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है।

पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की आबादी के पुरखे पुराने यूरेशियन समुदाय से हैं - आखेटक, मध्य-पूर्वी खेती पर आश्रित समुदाय और केंद्रीय एशिया के गड़ेरिए या चरवाहे स्थानीय निवासी थे और पूरी जनसंख्या इन्हीं तीन समुदायों के परस्पर संबंध से हुई संतानोत्पत्ति की देन है। आश्चर्यजनक तो यह है कि यूरोप की पूरी आबादी भी ऐसे ही तीन समुदायों से पनपी है, तभी दक्षिण एशिया और यूरोप के इतिहास में बहुत समानताएं हैं। सबसे बड़ी समानता तो भाषा में है। प्रोटो-इंडो-यूरोपियन प्राचीन भाषा का स्वरुप एक था, जिससे अंग्रेजी, रूसी, जर्मन और हिंदी जैसी भाषाओं का जन्म हुआ था।

इस अध्ययन को अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ फिजिकल एन्थ्रोपोलॉजिस्ट्स के अप्रैल के प्रथम सप्ताह के अधिवेशन में प्रस्तुत किया गया। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ बायोमेडिकल गेनोमिक्स में वैज्ञानिक पार्थ मजुमदार ने भी कुछ वर्ष पहले लगभग ऐसा ही निष्कर्ष निकाला था। वर्तमान अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया की प्रिय मूरजानी, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के डेविड रीच और हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलेक्यूलर बायोलॉजी के कुमारसामी थान्ग्राज ने संयुक्त तौर पर किया है। इस अध्ययन दल ने कुल 362 कंकालों से डीएनए के नमूने एकत्र किये, कंकालों की आयु 1200 ईसा पूर्व से पहली शताब्दी तक थी। कुल 362 डीएनए नमूनों में से 65 नमूने पूर्वी पाकिस्तान से, 132 नमूने ईरान और केंद्रीय एशिया से और शेष 165 नमूने कजाकिस्तान और रूस से लिए गए थे। इन नमूनों के गहन अध्ययन से वैज्ञानिकों को इन लोगों के दक्षिण एशिया में आने और परस्पर संबंध के समय की जानकारी मिली।

ईसा पूर्व 4700 से 3000 के बीच ईरान के कृषकों ने दक्षिण एशिया के मूल निवासियों से परस्पर संबंध स्थापित किया। दक्षिण एशिया के मूल निवासी आखेटक थे और शिकार कर के ही अपनी जीविका चलाते थे। तुर्कमेनिस्तान और ईरान में मिले कंकालों से प्राप्त डीएनए के विश्लेषण से पता चलता है कि वहां के निवासियों के संबंध सिन्धु घाटी सभ्यता के समुदाय से थे। यह सभ्यता ईसा पूर्व 3300 में पनप रही थी। उत्तर और केंद्रीय भारत की अधिकतर आबादी इसी संबंध से पनपी। फिर 1300 ईसा पूर्व के आसपास जब सिन्धु घाटी सभ्यता का पतन होने लगा, तब उत्तर भारत में ईरान के किसानों और यहां के मूल निवासियों के परस्पर संबंध से पनपी आबादी का एक हिस्सा दक्षिण की तरफ पलायन कर गया और वहां के मूल निवासियों से परस्पर संबंध किया। इस तरह एक ऐसी आबादी पनपी जिसे अब द्रविड़ कहा जाता है।

इन सबके बीच यूरेशियाई क्षेत्र के चरवाहों का आगमन भी हुआ जिनका संबंध स्थानीय लोगों से स्थापित हुआ, जो ईरान के किसान और स्थानीय आखेटकों की संताने थीं। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, अधिकतर कुलीन जो हिंदी या उर्दू जैसी भाषा बोलते हैं इन्हीं यूरेशियाई चरवाहों के वंशज हैं।

प्रिय मूरजानी ने पहले भी भारत और पाकिस्तान के 73 समुदायों के 600 लोगों के डीएनए का अध्ययन कर यह बताया था कि आधुनिक भारत के सभी निवासी दो समुदायों- उत्तर भारत के मूल निवासियों और दक्षिण भारत के मूल निवासियों की संतानें है। उत्तर भारत के मूल निवासी केंद्रीय एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के समुदायों के मिले-जुले वंशज हैं।

लोकप्रिय
next