मृणाल पांडे का लेख: राम मंदिर की आधारशिला तो रख दी गई, क्या अब जनता के मुद्दों को निपटाने के लिए तैयार है सरकार?

जब मानव इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें साल 2020 कोविड महामारी का ही नहीं, भारत से इस्तांबूल तक लोकतांत्रिक देशों में धार्मिक स्थलों की ओट में खुलकर राजनीति करने और पुराने प्रोफेशनल मीडिया की तिल-तिल मौत के रूप में दर्ज होगा।

फोटो: सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

भारत के शासक बदल चुके हैं, यह चिंता की बात नहीं। लोकतंत्र का स्वभाव ही है कि समय-समय पर उसके शासक दल बदला करें। आज अगर एक ही दल का राज नहीं, तो भी ठीक, कई दलों के संगठन का हो, तो भी चलेगा। लेकिन चिंता तब होती है, जब अपने संविधान निर्माताओं के रचे सर्वधर्म समभा लोकतंत्र का मूल स्वभाव हमारी नजरों के सामने बदलने लगे। जब सब तरफ से उम्मीद टूट जाए, तो समझदार लेकिन कमजोर नागरिक न्यायपालिका की तरफ आस भरी निगाहों से देखते हैं। लेकिन सामान्य उत्पीड़ितों के लिए साक्ष्य होते हुए भी न्याय की दहलीज तक पहुंचना और वहां भरपूर सुनवाई होना भी इधर कठिन बन गया है। ऐसे में चांदी की शिलाओं से एक भव्य राम मंदिर की नींव रखने से भी राम राज्य खुद-ब-खुद चल कर द्वार तक आ जाएगा, इसकी उम्मीद कोई मंदबुद्धि ही करेगा।

सरकार ने अपनी नेकनीयती और दरियादिली से बहुसंख्यकों के दिल जीतने के लिए पिछले छ: बरसों में भरपूर प्रचार सहित कई कदम उठाए। अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन उनकी ही एक कड़ी है। पर जब 1992 से रथ यात्रा ने इस मुद्दे को लेकर जन प्रचार छेड़ा था, तब से अल्पसंख्यकों के दिलों में प्रशासनिक न्याय और सरकारी दंड विधान- दोनों को लेकर भय और आशंकाएं व्याप गई हैं। पिछले छ: सालों में सत्तापक्ष से अल्पसंख्यकों को बार-बार दिए गए क्रमिक समर्थन और केंद्रीय मंत्रिमंडल में दो मुसलमान नेताओं की मौजूदगी भी उनको आश्वस्त नहीं करती। बहुमत से सत्ता पर दोबारा आसीन सरकार ने भूमि पूजन से ठीक एक बरस पहले जब रातोंरात संसद में उभयपक्षी जिरह के बिना जम्मू-कश्मीर को तीन केंद्र शासित राज्यों में बांटकर वहां कर्फ्यू लागू करते हुए तमाम मजबूत स्थानीय नेताओं को नजरबंद कर दिया तो फिर तो अल्पसंख्यकों के बीच केंद्र का हिंदुत्व की तरफ झुकाव बहस का विषय ही नहीं रहा। फिर महामारी आई। यह बढ़ी। पर उसके बढ़ते सायों के बीच भीड़भाड़ से आशंकित डॉक्टरों ही नहीं, खुद शंकराचार्य द्वारा भी 5 अगस्त को सुमुहूर्त न होने की शंका जाहिर होने के बावजूद, कई पुजारियों, मंत्रियों, राज्यपालों, विधायकों के कोरोना संक्रमित होने बाद भी भव्य तामझाम सहित भूमिपूज न हुआ। और भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार देश के प्रधानमंत्री ने एक गैरसरकारी न्यास के आयोजन में सबसे आगे रह कर शिरकत की।

इस दौरान गत कई सालों से वैसे भी सरकार के लिए भाट- चारण बनकर ‘अहो रूपं अहो ध्वनि’ करते रहे मीडिया ने काफी हद तक नमक का मोल चुकाया। 5 अगस्त की सुबह हिंदी के बड़े अखबार कलेंडरी दिख रहे पहले पन्नेपर धनुर्धर राम की छवि लेकर अवतरित हुए। फिर दिन चढ़ते टीवी चैनलों ने काम संभाल लिया। इस बीच अंग्रेजी क्षेत्र के द्वारा हिंदी मीडिया की सरकार परस्ती और मंदिर की हिमायत की खिल्ली पर भी एक टिप्पणी होनी चाहिए। जैसा द्रौपदी ने मरणासन्न भीष्म से पूछा था, जब मेरा चीर हरण हो रहा था, उस समय आपका यह सारा विवेक, यह राजधर्म का ज्ञान कहां था जो आज आप पांडवों को दे रहे हैं? अंग्रेजी पर भी दोबारा नजर डाली जानी चाहिए। इसलिए नहीं कि हिंदी वालों की सरकार स्तुति को जायज ठहराया जा सके बल्कि इसलिए कि उनमें से कुछ लोग संविधान की लक्ष्मण रेखाओं के उल्लंघन और बहुसंख्य गुंडागर्दी के खिलाफ लिखते तो रहे हैं। पर सिर्फ अंग्रेजी में। अंग्रेजी के जंगल में उनका मोर नाचा तो किसने देखा? आज साबित हुआ कि किसी ने नहीं।

चलिए, हिंदी की गंगा महापापिनी और राजनीतिक रूप मैली हो चुकी है। तो भी हिंदी को पानी पी-पीकर कोसते आए अहिंदी भाषी इलाकों के देश-विदेश से पुरस्कृत समाजवेत्ता, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, नृवंशशास्त्री, पर्यावरणवेत्ता और रचनात्मक लेखक किस लिए अपनी मातृभाषा- बांग्ला, कन्नड़, मराठी या तमिल आदि के मीडिया में बढ़ती सांप्रदायिकता, बदहाल अर्थव्यवस्था और शिक्षा तथा स्वास्थ्य कल्याण क्षेत्र के खंडहर होने पर भी नहीं लिखते? भाषा के इलाके में कुदरत शून्य को तुरत भरती है। भाषाई मीडिया में इन विषयों पर जो वैचारिक शून्य इन महानुभावों की काहिली से बना, उसको 1992 से ही बीजेपी ने बहुत समझदारी से ईंट-दर-ईंट भरा है। आज मीडिया की छंटनियों, अंग्रेजी अखबारों के सिकुड़ते विज्ञापनों और कम होते पाठकों पर बिलखने वालों से हम पूछना चाहते हैं कि जब एकाधिक भाषाओं में अखबार रिसाले तथा चैनल चलाने वाले मुनाफाखोर मालिक, मनीजरी बोर्ड और विज्ञापनदाता कंपनियां भारतीय भाषाओं के उत्पादों की कीमत पर उनको चने के झाड़ पर चढ़ा रहे थे, तब क्या वे कभी अपने हाउस के भाषाई प्रकाशनों और संपादकों के लिए समान वेतन, संसाधन और कवरेज की सुविधाएं मुहैया कराने को उनके साथ खड़े हुए थे? इस लेखिका का चालीस बरस का अनुभव है, कतई नहीं। अब जब सारा मीडिया (जिसमें वे खुद भी खड़े हैं) सरकारी विज्ञापनों पर लगभग पूरी तरह आश्रित बन गया है, जिसे टिके रहना हो उसे नाक काट जेब में डालकर एक गैर प्रोफेशनल, अविश्वसनीय सरकारी जमूरे में बदलना ही होगा। उदाहरणों की कोई जरूरत नहीं।

जब मानव इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें साल 2020 कोविड महामारी का ही नहीं, भारत से इस्तांबूल तक लोकतांत्रिक देशों में धार्मिक स्थलों की ओट में खुलकर राजनीति करने और पुराने प्रोफेशनल मीडिया की तिल-तिल मौत के रूप में दर्ज होगा। हम मानें या नहीं, कोविड की विश्वमहामारी ने दुनियाभर में घरेलू राजनीति, विदेश नीति, ग्लोबल अर्थव्यवस्था और सहभागिता की पुरानी तस्वीर मिटा दी है। जो दुनिया उभर रही है, वह सोशल डिस्टेन्सिंग और डिजिटल संवाद पर टिकी है। यह दुनिया सिर्फ अपने घरेलू हित स्वार्थपरख कर नियम कायदे बनाएगी, तोड़ेगी। मंदिर-फंदिर के लफड़ों को आपस में लड़ने जा रहे पंडे-पुजारियों पर छोड़कर हमको भी अब हिम्मत से उन मुद्दों पर बात करनी होगी जो हमारे हितस्वार्थों से सीधे जुड़े हैं।

पहले दो मुद्दे हैं- देश में स्वास्थ्य कल्याण और शिक्षा के दो अहम क्षेत्रों पर कोविड के असर से निबटने के। भव्य भूमिपूजन पर करोड़ों की सरकारी राशि खर्च करने वाली सरकार से पूछना चाहिए कि मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रदेश से भी कोविड संक्रमण बढ़ने के साथ-साथ हिंसा और अपराधियों के बढ़ते हौसलों की खबरें लगातार क्यों आ रही हैं? थानों से हस्पतालों तक में अव्यवस्था घटाने और निगरानी तथा चिकित्सकीय सुविधाएं बढ़ाने पर अगर काम हो रहा है तो उसके प्रमाण कहां हैं? नई शिक्षा नीति पर हम पिछली बार लिख ही चुके हैं। यह मसौदा जो कोविड के आक्रमण से पहले बना, साफ मानता है कि प्राइमरी स्तर तक तो बच्चों की भरती होती है, पर मिडल स्कूल के बाद वह घट कर आधी रह जाती है। अब उसमें भी बड़ी गिरावट होगी क्योंकि अधिकतर शालाएं संक्रमण के डर से बंद हैं और कई बेरोजगार परिवारों के बच्चों के पास निजी स्कूलों में दी जा रही ऑनलाइन शिक्षा तक पहुंचने के लिए स्मार्टफोन खरीदने की क्षमता नहीं है। इन बच्चों का क्या होगा? सबसे दयनीय हालत तो कश्मीर घाटी की है। मुक्त भोगियों के अनुसार, वहां साल भर से जारी लॉकडाउन से अपूरणीय नुकसान हुआ है। छात्र घर बंद हैं, पर सरकार ऑनलाइन सुविधाएं देने की बजाय 2-जी से अधिक क्षमता के फोन देने पर सुरक्षा के सवाल खड़ेकर प्रतिबंध लगाए हुए है। नए राम राज्य की घोषणा और ‘भय बिनुहोय नप्रीति’ का मुहावरा सुनते हुए क्या इस निरक्षर हो चले देश में किसी को तुलसीदास की यह पंक्तिभी याद रही: ‘जासुराज अतिप्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी’।

अंत में राजनय। अपने शुरुआती दिनों में जब हमारे प्रधानमंत्री नेपाल से शुरू कर पाकिस्तान, अमेरिका, जापान तक हर जगह राष्ट्र प्रमुखों के साथ ॠतुराज की तरह रंगभरी गर्म जोशी से मिलते थे तो उनकी छवियां टीवी पर देख कर लोग गुलदाउदी की तरह गद्गद होते थे। लेकिन कोविडके काल में भारत समेत हर देश अंतर्मुखी बनकर पराई आंखों को चुभने वाला स्वदेशवादी धुआं फेंक रहा है। चीन ने तो सबसे पहले अपना सौम्य मुखौटा फेंककर खाने के दांत चियार दिए। और अब सीमा पर भारत को नीचा दिखाने का कोई मौका पाक क्या, नेपाल या बांग्लादेश भी नहीं छोड़ रहे। अमेरिका में भी यह चुनाव का नाजुक समय है। खुद को बाजी हारते देख कर गुजरात में भारी आतिथ्यपा चुके ट्रंप ने भी भारत की दोस्ती से मुंह फिरा लिया है। अमेरिकियों के लिए अमेरिकी नौकरियों के आरक्षण का ब्रह्मास्त्र छोड़ते हुए उनकी सरकार ने आईटी क्षेत्रसे एच 1 बी वीजा सुविधा के खात्मे का ऐलान कर दिया है। इससे हमारे प्रशिक्षित युवा वर्ग की निराशा और मोहभंग भी जरूर बढ़ेगा। अशिक्षितों को तो छोड़ ही दें।

क्या संसद से सड़क तक भारतीय कूटनीति की नई परिभाषा रचने पर खुल कर चर्चा नहीं होनी चाहिए? विश्व इतिहास की सचाइयों से स्वदेशी राजनीति में बदलावों को लेकर कोई चतुर सुजान शासक असावधान नहीं होता। सो, भूमि पूजन हुआ, सो हुआ। अब देश की सरकार को नए दूल्हा-दुलहिन की तरह मौर मुकुट ताख पर धर कर कामकाजी चोला पहिन गृहस्थ जीवन के साझा चौके में घुसना और नून-तेल-लकड़ी के सनातन मुद्दों से निबटना ही होगा।

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