खरी-खरीः गरीबों को मुफ्त राशन तो एक बहाना है, बिहार चुनाव असली निशाना है

प्रधानमंत्री मोदी नवंबर तक मुफ्त राशन देकर गरीबों को कोई राहत नहीं दे रहे हैं, वह तो इस बहाने बिहार में बीजेपी का चुनावी भविष्य बना रहे हैं। वह कहते हैं कि हर समस्या को अवसर में बदल देना चाहिए। और कोरोना संकट उन्हें बिहार चुनाव जीतने का एक अवसर दिख रहा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

पिछले एक माह में कोरोना वायरस महामारी का प्रकोप कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। देश-विदेश से इस संबंध में जो समाचार आ रहे हैं, वे सभी असंतोषजनक हैं। आप भारत की राजधानी को ही लीजिए, तो यहां स्थिति रोज-ब-रोज बिगड़ती जा रही है। स्वयं दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के अनुसार, “इस माह इस महामारी से दिल्ली में पांच लाख से भी ज्यादा लोग पीड़ित हो सकते हैं।”

महाराष्ट्र और तमिलनाडु-जैसे प्रदेशों की स्थिति भी और बिगड़ चुकी है। उत्तर प्रदेश जहां अभी तक सब कुछ नियंत्रण में था, तो वहां से भी अब चिंताजनक समाचार आ रहे हैं। विदेशों में भी महामारी की अब एक बड़ी लहर चल पड़ी है। अमेरिका में स्वयं सरकारी सूत्रों के अनुसार, जल्द ही वहां एक दिन में इस महामारी से एक लाख लोग प्रभावित हो सकते हैं।

लब्बोलुआब यह है कि कोरोना वायरस मानवता के लिए जितना गंभीर था, वह अब कुछ और बढ़ चुका है। यह भी स्पष्ट है कि इससे निपटने का अभी कोई सीधा उपाय पूरे संसार में कहीं नजर नहीं आ रहा है। यह महामारी एक दोधारी तलवार बन चुकी है। यदि इससे बचने के लिए स्वास्थ्य के स्तर पर ‘लॉकडाउन’ जैसे माध्यम का इस्तेमाल होता है तो आर्थिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न होती है।

यदि आप आर्थिक स्थिति से निपटने के लिए ‘अनलॉकिंग’ शरू करें तो बीमारी का प्रकोप और तेज होता है। ऐसी अवस्था में इन दोनों समस्याओं के समाधान के लिए किसी संतुलित हल की खोज अभी तक तो नहीं हो सकी है। भले ही दनिया के नेता इस संबंध में कितनी ही डींगें हांकें, कहीं कोई हल नजर नहीं आता है।

इससे लड़ने के लिए रामदेव की ‘कोरोनिल’ से लेकर दुनिया भर में अनेक दवाएं चर्चित होती हैं, लेकिन चौबीस घंटे के अंदर स्वयं डॉक्टर उनकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं। इस महामारी का एकमात्र इलाज, वैज्ञानिक मापदंडों के अनुसार, केवल ‘वैक्सीन’ ही हो सकता है। पर इसकी खोज में अभी भी कम-से-कम एक वर्ष का समय लग सकता है। स्पष्ट है कि कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिए सारा संसार और संपूर्ण मानवता अभी भी अंधकार में हाथ-पांव मार रही है। ऐसी दशा में जो बच गया, बहुत खूब और जो मारा गया, वह बेचारा, भगवान को प्यारा हुआ समझिए।

ऐसी संगीन स्थिति में हर देश की सरकार और उसके मुखिया पर बहत बड़ी जिम्मेवारी आ जाती है। भारत सौ करोड़ से भी अधिक घनी आबादी वाला देश है। हम इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि हमारे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था इस स्थिति से निपट सकने में कितनी सक्षम है। आज से कोई दो वर्ष पहले गोरखपुर के एक सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन के अभाव के कारण दर्जनों बच्चे मर गए थे। ऐसी अवस्था में यदि एक-एक शहर में हजारों और दिल्ली- जैसी महानगरी में एक दिन में कई लाख मरीज हो गए, तो उनका इलाज तो जाने दीजिए, उनको अस्पतालों में भर्ती नहीं किया जा सकेगा। स्वयं दिल्ली से अभी ये खबरें आ रही हैं कि मरीजों को जगह मिलना कठिन है।

देश इस समय स्वास्थ्य और आर्थिक- दोनों प्रकार की इमरजेंसी से जूझ रहा है। स्पष्ट है कि ऐसे समय में देश की निगाहें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगी हुई हैं। स्वयं प्रधानमंत्री को भी इस बात का एहसास है। वह अब तक इस महामारी के बीच राष्ट्र के नाम पांच या छह संदेश दे चुके हैं। वह बराबर देशवासियों को इस मामले में राय देते रहे हैं। दिया जलाओ, थाली बजाओ से लेकर कैसे गमछा बांधना है तक, वह हर बात समझाते हैं। फिर उनकी सरकार इस महामारी से निपटने के लिए क्या उपाय कर रही है, मोदी जी इससे भी अवगत कराते हैं। उन्होंने इस महामारी से निपटने के लिए कैसे 20 लाख करोड़ का अनुदान दिया है, इसकी घोषणा भी उन्होंने स्वयं किया था।

राष्ट्र के नाम अपने अंतिम संबोधन में उन्होंने देश की ‘अस्सी करोड़ जनता’ को आर्थिक परेशानी से बचाने के लिए क्या कदम उठाने हैं, उसका भी ऐलान किया। उनके अनुसार, सभी राशन कार्ड धारकों के घर में हर व्यक्ति को पांच किलो गेहूं अथवा चावल हर माह नवंबर तक सरकार की ओर से मुफ्त मिलता रहेगा। इसी के साथ प्रधानमंत्री ने यह भी घोषणा की कि अब उनकी सरकार ‘एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड’ स्कीम लागू करने जा रही है। अर्थात आपने राशन कार्ड किसी भी स्थान पर बनवाया हो लेकिन इस स्कीम के तहत आपका राशन कार्ड सारे देश में मान्य होगा।

प्रधानमंत्री का भाषण सुनते ही लगा कि वह देश के गरीबों के लिए गंभीरता से चिंतित हैं और उनकी समस्या का हल ढूंढने के लिए कितने भी पैसे खर्च करने के लिए तैयार हैं। परंतु हमने जब इस संबंध में आर्थिक मामलों के जानकारों को टटोला तो वे बोले- भाई, यह सब हवा-हवाई है। हमने पूछा वह कैसे, तो वे बोले- भाई, यह सब तो वह स्वयं और उनकी वित्त मंत्री पहले ही ऐलान कर चुकी हैं। हमने कहा कि भला यह कैसे हो सकता है कि राष्ट्र के नाम संबोधन में कोई बात नई हो ही नहीं। तो जानकारों ने बताया कि हां, केवल एक बात नई है। हमने पूछा वह क्या! तो बोले, पांच किलो अनाज हर व्यक्ति को हर माह मुफ्त नवंबर तक बांटने का फैसला नया है।

हमको यह प्रतीत हुआ कि सरकार को यह उम्मीद है कि नवंबर तक स्वास्थ्य एवं आर्थिक- दोनों समस्याएं हल हो जाएंगी और देश में एक बार फिर दूध और घी की नदियां बहने लगेंगी, इसीलिए गरीबों की सहायता नवंबर तक की जाएगी। जानकार बोले, तुम बिल्कुल बुद्धू हो। हमने पूछा- वह क्यों, तो वे बोले- अरे, नवंबर में बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं, अतः वोटर को खुश रखना है।

लीजिए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नवंबर तक मुफ्त राशन बांटकर गरीबों की समस्याओं का समाधान नहीं कर रहे हैं, वह तो इस बहाने बिहार में बीजेपी का चुनावी भविष्य बना रहे हैं। बात स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री को कोरोना महामारी से निपटने की इतनी चिंता नहीं है, जितनी बिहार का चुनाव जीतने की चिंता है। बात ठीक भी है, क्योंकि नरेंद्र मोदी रात-दिन केवल और केवल चुनाव जीतने की उधेड़बुन में लगे रहते हैं।

दरअसल, उनको चुनाव जीतने का चस्का लग चुका है। तब ही तो वह कहते हैं कि हर समस्या को एक अवसर में परिवर्तित कर देना चाहिए। यही कारण है कि कोरोना महामारी उनके लिए बिहार में चुनाव जीतने का एक अवसर बन चुकी है। अर्थात, मोदी जी ने सरकारी पैसे से मुफ्त अनाज बांटकर और चुनाव से पहले बिहार के गरीब व्यक्ति के बैंक खाते में कुछ पैसा डालकर गरीबों का वोट खरीदने का अवसर ढूंढ लिया है। और आप देखते रहिए, आने वाले चार महीनों में केंद्र सरकार का खजाना बिहार के वोटर को लुभाने के लिए खोल दिया जाएगा।

एक महामारी का राजनीतिकरण कैसे हो सकता है, यह कला कोई मोदी जी से सीख सकता है। इस प्रकार मोदी जी भले ही बिहार का चुनाव जीत जाएं लेकिन देश निःसंदेह कोरोना महामारी की जंग हार सकता है। क्योंकि जब केंद्र सरकार का उद्दे्श्य ही महामारी की आड़ में चुनाव जीतना हो तो फिर महामारी से निपटने के उपायों की तो छुट्टी हो गई।

अब इस महामारी का आर्थिक बजट बिहार में बहा दिया जाएगा। बिहार में मुफ्त अधिक-से-अधिक चुनावी प्रसाद बंटेगा। बैंक खातों में पैसे डाले जाएंगे। फिर चुनाव प्रचार के समय मोदी जी अपनी स्कीमों का बखान करेंगे। टीवी एंकर मोदी जी के गरीब प्रेम की गाथा सुनाएंगे। बाकी देश महामारी की चपेट में झुलसता हो तो झुलसे, बीजेपी की बला से। बिहार पर बीजेपी का कब्जा हो, मोदी जी का केवल यही लक्ष्य है। उनको गरीब से न कभी प्रेम था और न कभी हो सकता है।

Published: 3 Jul 2020, 8:59 PM
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