देश में खत्म हो चुकी है लिखने की आजादी
हमारे देश में वर्ष 2014 के बाद से बहुत सारे अधिकार विलुप्त हो चुके हैं या फिर विलुप्तिकरण की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। इन सभी अधिकारों में से अभिव्यक्ति की आजादी, सरकार से प्रश्न करने की आजादी एक ऐसा मुद्दा है जो देश से सबसे तेजी से गायब हुआ।

हमारे देश में वर्ष 2014 के बाद से बहुत सारे अधिकार विलुप्त हो चुके हैं या फिर विलुप्तिकरण की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। इन सभी अधिकारों में से अभिव्यक्ति की आजादी, सरकार से प्रश्न करने की आजादी एक ऐसा मुद्दा है जो देश से सबसे तेजी से गायब हुआ। यहां सत्ता के शीर्ष नेताओं का तथ्यहीन अनर्गल प्रलाप ही अभिव्यक्ति की परिभाषा है, शेष सभी आवाजें खामोश कर दी जाती हैं। बीजेपी नेता राहुल गांधी को गद्दार और देशद्रोही कहने को आजाद हैं, पर जब यही विशेषण प्रधानमंत्री पर न्योछावर किए जाते हैं तब यह अपराध हो जाता है।
सत्ता के झूठ पर ही यहां का मेनस्ट्रीम मीडिया और कुछ हद तह साहित्य भी पनप रहा है, अब तो यह मीडिया भी नहीं है, जनता तक झूठ और नफरत फैलाने की एक फैक्ट्री है– जिसमें नफरती समाचारों का बेतहाशा उत्पादन किया जाता है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर सरकार और पूंजीपतियों के वर्चस्व के कारण अफवाहों का बोलबाला है।
वर्ष 2014 के बाद से देश में बस एक ही अपराध माना जाता है– सत्ता से प्रश्न पूछना। अब पुलिस अपराधों पर एफआईआर दर्ज नहीं करती बल्कि सत्ता से प्रश्न पूछने वालों पर मिनटों में एफआईआर दर्ज करती है, नेहा राठौर और माद्री काकोटी का मामला सबके सामने है। सत्ता से प्रश्न पूछने वालों को सत्ता, समर्थक, पुलिस और मीडिया सभी देशद्रोही करार देते हैं और ऐसे मामले न्यायालय को भी नजर नहीं आते। केंद्र में मंत्री अनुराग ठाकुर, दिल्ली में मंत्री कपिल मिश्रा, के हिंसक बयान पर अदालतें खामोश रहती हैं जबकि उमर खालिद और मेधा पाटेकर को जमानत भी नहीं मिलती है।
हाल में प्रधानमंत्री के नॉर्वे और नीदरलैंड के दौरों पर मीडिया की आजादी पर वक्तव्य और प्रधानमंत्री मोदी से प्रश्न पूछने का परिणाम हम देख रहे हैं। नॉर्वे के बदले भारत में ऐसा हुआ होता तो अब तक अनेक चाटुकार “सनातन” संगठन उस पत्रकार की जीभ, हाथ, गर्दन और पैरों की खुलेआम बोली लगा चुके होते। दिनभर पूंजीवादी मीडिया चरित्र हनन और पाकिस्तान से संबंध में व्यस्त रहती पर यह सत्ता, पुलिस और न्यायालय को कभी नजर नहीं आता। वैसे भी न्यायालय ने तो जनता को कॉकरोच करार दिया है। कॉकरोच को तो सिर्फ काला हिट स्प्रे कर मारा जाता है।
सत्ता और न्यायालय ने अभिव्यक्ति को ही कैद कर दिया है, इसे असंवैधानिक और मोदी-द्रोही करार दिया है– अब देश खो गया है, बस मोदी जी रह गए हैं। सत्ता और न्यायालय की भाषा भी बिल्कुल एक हो गई है– मोदी जी ने हाल के कई भाषणों में कांग्रेस पार्टी को परजीवी कहा था, न्यायालय भी जनता को परजीवी बता रही है। मीडिया का मानसिक दीवालियापन तो देखिए– न्यायालय के कॉकरोच मीडिया में जाते हैं वाले वक्तव्य पर भी मीडिया तालियां पीट रहा है। सत्ता की अभिव्यक्ति तो लाजवाब है– कुछ नेता यह साबित करने में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं कि सबसे अधिक हिंसक और भड़काऊ वक्तव्य कौन दे सकता है, तो दूसरी तरफ अनेक महिला नेताओं समेत नेताओं का बड़ा तबका साबित कर रहा है कि देश का सबसे बड़ा बेवकूफ कौन है।
अभिव्यक्ति की आजादी के संदर्भ में हम कहां खड़े हैं, इसका जवाब पेन अमेरिका नामक संस्था द्वारा तैयार किए जाने वाले लेखकों पर खतरे से संबंधित डेटाबेस से मिलता है। इसके अनुसार दुनिया के 113 देशों में 1397 लेखक अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति के कारण मुकदमा/जेल/हमले/चरित्र हनन जैसे खतरे में हैं। वर्ष 2019 से लगातार उपलब्ध इस सूची में पहली बार लेखकों का आंकड़ा एक हजार को पार कर गया है और देशों की संख्या भी 100 से अधिक दर्ज की गई है।
पिछले वर्ष यह संख्या 83 देशों में 975 लेखक की थी– जाहिर है कि निष्पक्ष लेखकों पर खतरे का दायरा और पैमाना तेजी से बढ़ रहा है। इन 113 देशों में से सबसे अधिक लेखकों पर खतरे के संदर्भ में 62 लेखकों के साथ हमारा देश पांचवें स्थान पर है। इस सूची में सबसे आगे 172 लेखकों के साथ ईरान, दूसरे स्थान पर 121 लेखकों के साथ तुर्किए, तीसरे स्थान पर 116 लेखकों के साथ चीन (मेनलैंड), और 69 लेखकों के साथ सऊदी अरब चौथे स्थान पर है।
लेखकों, बुद्धिजीवियों और कलाकारों की अभिव्यक्ति की आवाज पर नजर रखने वाली संस्था, पेन अमेरिका (PEN America), पिछले 7 वर्षों से लिखने की आजादी इंडेक्स, यानि फ्रीडम टू राइट इंडेक्स, प्रकाशित करती है और इस इंडेक्स के हरेक संस्करण में इस सन्दर्भ में सबसे खतरनाक/खराब देशों में भारत शामिल रहता है। इस इंडेक्स का आधार हरेक देश में अपने काम या अपने लेखन या कला के लिए विशुद्ध राजनैतिक कारणों से गिरफ्तार किये गए लेखकों, बुद्धिजीवियों या कलाकारों की संख्या होती है। इस इंडेक्स का नया संस्करण मई 2026 में प्रकाशित किया गया है, जिसका आधार वर्ष 2025 के आंकड़े हैं, और हमारा देश इस इंडेक्स में जोर्डन और पाकिस्तान के साथ संयुक्त तौर पर 15वें स्थान पर है।
वर्ष 2025 में दुनिया के 44 देशों में कुल 401 लेखक/बुद्धिजीवी जेल में बंद थे, जबकि वर्ष 2024 में 40 देशों में कुल 375 लेखक/बुद्धिजीवी जेल में बंद थे। वर्ष 2025 में लेखकों का यह आंकड़ा पहली बार 400 को पार कर गया है। यह संख्या पिछले 7 वर्षों में, जबसे इस इंडेक्स को प्रकाशित किया जा रहा है, सर्वाधिक है और वर्ष 2019 के बाद से इस संख्या में 68 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2019 के पहले संस्करण में यह संख्या 238 और वर्ष 2023 में यह संख्या देशों में 339 थी।
पहले स्थान पर हमेशा की तरह चीन है, जहां कैद किये गए लेखकों की संख्या 119 है। पहली बार वर्ष 2023 में चीन में यह संख्या 100 से भी अधिक, 107 तक पहुंच गई थी और तब से लगातार चीन की यही स्थिति कायम है। दूसरे स्थान पर 53 ऐसे कैदियों के साथ ईरान है और तीसरे स्थान पर 27 कैदियों के साथ सऊदी अरब है। चौथे स्थान पर वियतनाम (24), पांचवें पर तुर्किये (22), छठे पर इजरायल (21), सातवें पर रूस (18), आठवें पर बेलारूस (17), नौवें स्थान पर मिस्र (13) और दसवें स्थान पर 10 कैद लेखकों के साथ म्यांमार है।
कैद किये गए लेखकों की पूरी संख्या में 15 प्रतिशत, यानि 62 महिलाएं भी हैं, यह संख्या वर्ष 2024 की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक है। कुल 18 देश ऐसे हैं, जहां महिला लेखिकाओं/कलाकारों को सत्ता के विरोध के कारण कैद किया गया है। राजनैतिक कारणों से लेखकों को जेल में डालने की घटनाएं साल-दर-साल बढ़ती जा रही हैं। वर्ष 2024 में 375, वर्ष 2023 में 339, वर्ष 2021 के लिए यह संख्या 277 है, वर्ष 2020 में संख्या 273 थी और वर्ष 2019 में यह संख्या 238 थी। सबसे अधिक 17 महिलाएं ईरान में कैद हैं, इसके बाद 12 महिला लेखिकाओं को कैद कर चीन दूसरे स्थान पर है। तीसरे स्थान पर इजरायल है, जहां 7 महिला लेखिकाएं कैद हैं। सऊदी अरब में 6 और रूस में 5 महिला लेखिका कैद की गई हैं।
भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार एशिया-प्रशांत क्षेत्र लेखकों के लिए सबसे खतरनाक है– इस क्षेत्र में 163 लेखक जेल में हैं और 449 लेखक खतरे में हैं। मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में 138 लेखक जेल में और 439 लेखक खतरे में हैं। यूरोप और मध्य एशिया में यह संख्या क्रमशः 77 और 311 है, सहारा-अफ्रीका में क्रमशः 12 और 81 जबकि उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में क्रमशः 11 और 117 है। वर्ष 2024 में वैश्विक स्तर पर 51 लेखकों की हत्या की गई, 14 को जबरन गायब कर दिया गया और 143 लेखकों को सत्ता के विरोध के बाद अपना देश छोड़ना पड़ा।
इस इंडेक्स के अनुसार, दुनियाभर में बंद 401 लेखकों में से सबसे अधिक 212 ऑनलाइन कमेंटेटर, 142 पत्रकार/संपादक, 130 साहित्यिक लेखक हैं, 83 एक्टिविस्ट, 81 बुद्धिजीवी हैं, 73 कवि हैं, 34 कलाकार, 37 गायक या गीतकार हैं, 17 अनुवादक हैं, 14 सम्पादक, 13 प्रकाशक और 5 रंगकर्मी हैं। हरेक वर्ष कवियों और अनुवादकों की सख्या बढ़ती जा रही है, जाहिर है फिर से कवितायें विद्रोह की आवाज बन रही हैं और ऐसा ईरान और चीन के कवियों ने स्पष्ट तौर पर दिखाया है। अनुवादक भी दूसरे देशों और भाषाओं के विद्रोह के स्वर को आम जनता तक पहुंचा रहे हैं।
हम इतिहास के उस दौर में खड़े हैं जहां मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी के सन्दर्भ में हम पाकिस्तान, रूस, चीन, बेलारूस, तुर्की, हंगरी, अफगानिस्तान, ईरान, सऊदी अरब, इजरायल को आदर्श मानकर उनकी नक़ल कर रहे हैं और स्वघोषित विश्वगुरु का डंका पीट रहे हैं। यह दरअसल देश के मेनस्ट्रीम मीडिया की जीत है, क्योंकि यह मीडिया ऐसा ही देश चाहता है और देश में ऐसी ही निरंकुश सत्ता चाहता है जिसके तलवे चाटना ही उसे समाचार नजर आता है।
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