आकार पटेल का लेख: कैसे बदली अच्छे दिन-विकास के वादे से लेकर सामाजिक ताने-बाने पर बुलडोज़र तक के मोदी शासन की राह

बीजेपी ने अपना फोकस अर्थव्यवस्था में सुधार से हटाकर सामाजिक ताने-बाने पर बुलडोजर चलाने पर कर लिया है। अब हमें नहीं सुनाई देता कि पीएम विनिर्माण क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी या श्रम बल की भागीदारी में कमी पर कुछ बोलते हों।

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आकार पटेल

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए सरकार की दो अलग-अलग शर्तों को दूसरे तरीके से भी अलग-अलग देखा जा सकता है। पहले कार्यकाल में आर्थिक सुधार की इच्छा थी। वहीं दूसरे कार्यकाल के दौरान वह इच्छा किसी और के पक्ष में गई प्रतीत होती है। आइए पहले 2014-19 के कार्यकाल पर नजर डालते हैं।

इस कार्यकाल में प्रधानमंत्री ने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में भारत की विनिर्माण हिस्सेदारी में सुधार करने का प्रयास किया। उन्होंने इसे मेक इन इंडिया (25 सितंबर 2014 को लॉन्च) नामक एक कार्यक्रम के माध्यम से करने की कोशिश की।

मेक इन इंडिया के तीन उद्देश्य थे। इससे देश की जडीपी मे विनिर्माण की हिस्सेदारी 16 से बढ़कर 25 फीसदी करना, इसे हासिल करने के लिए विनिर्माण को हर साल 12 फीसदी की दर से बढ़ाना (8 फीसदी जीडीपी की तुलना में) और विनिर्माण में 10 करोड़ नौकरियों का सृजन करना।

दूसरा आर्थिक सुधार किया गया नोटबंदी के रूप में और इस का लक्ष्य कालेधन को अर्थव्यवस्था से समाप्त करना और साथ ही इसके लाभ के रूप में नकली नोटों के धंधे और आतंकवाद को खत्म करना था। इसकी घोषणा 8 नवंबर 2016 को की गई थी। अगले साल 1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू किया गया। इसके पीछे मंशा पूरे भारत को एक बाजार बनाते हुए राज्यों और केंद्र को एक दूसरे के नजदीक लाना था। (प्रधानमंत्री के शब्दों में इसे सहकारी संघवाद कहा गया)

सरकार ने यह भी कहा कि वह विभिन्न प्रकार की वैश्विक रैंकिंग में अपनी स्थिति में सुधार करेगी, क्योंकि इसे विश्व बैंक के डूइंग बिजनेस इंडेक्स में भारत की अच्छी रैंकिंग से प्रोत्साहित किया गया था। इसके लिए जिम्मेदारी नीति आयोग को दी गई कि वह 32 सूचकांकों में भारत की प्रगति की निगरानी करेगा और इसके तरीके खोजेगा कि इन रैंकिंग में भारत की स्थिति को कैसे सुधारा जाए।


इन मोर्चों पर क्या स्थिति रही, इस बारे में तमाम रिपोर्टे सामने हैं। और हम इसे संक्षेप में ही बता सकते हैं क्योंकि इससे जुड़े सारे आंकड़े सरकारी हैं। जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा बढ़ने के बजाय नीचे आ गया, और आज यह 16 फीसदी से गिरकर 13 फीसदी पर आ गया। 2014 के बाद इसकी वृद्धि दर नकारात्मक रही। अशोका यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इकोनॉमिक डेटा एंड एनालिसिस के एक अध्ययन के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र में नौकरियां आधी रह गईं, जो 2021 में 5 करोड़ से 2.7 करोड़ हो गई। स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि कृषि क्षेत्र में अधिक लोग काम करने गए। इस क्षेत्र में जहां 2016 में 14 करोड़ लोगों ने काम किया वहीं 2021 में यह संख्या 15 करोड़ हो गई और फिर मार्च 2022 तक 1.5 करोड़ और बढ़ गई। बतादें कि कृषि क्षेत्र की नौकरियों की सामान्य रूप से बेरोजगारी माना जाता है।

नोटबंदी और जीएसटी का अर्थव्यवस्था और एमएसएमई क्षेत्र (छोटे और मझोले उद्योग धंधों) पर मैं पहले भी लिख चुका हूं और मेरी पिछली किताब में इस पर पूरा एक अध्याय है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि सरकारी आंकड़ों के ही अनुसाल जनवरी 2018 से जीडीपी ग्रोथ में कमी आना शुरु हो गई थी और जब देश पर महामारी का आक्रमण हुआ तो यह शून्य के पास पहुंच गई। बीते दो साल में भारत की अर्थव्यवस्खा सिर्फ 1.5 फीसदी के आसपास बढ़ी है।

मुझे लगता है कि जब इसके नतीजे आ गए तो सरकार और खासतौर से प्रधानमंत्री की इस सबमें रुचि खत्म ही हो गई। 2019 के चुनाव नतीजों के बाद से आर्थि मोर्चे पर किसी बड़े सुधार या मास्टरस्ट्रोक का ऐलान नहीं किया गया है। सरकार ने दूसरा ही रास्ता चुन लिया है जिसे सरकार के क्रियाकलापों से देखा-समझा जा सकता है।


कश्मीर अपनी संवैधानिक स्वायतता 5 अगस्त 2019 में खो चुका है (जो उसके पास कभी थी ही नहीं)। इससे पहले 30 जुलाई 2019 को तीन तलाक पर कानून बनाया गया जिसे सुप्रीम कोर्ट 2017 में ही अवैध घोषित करते हुए अपराध के रूप में चिह्नित कर चुका था। नागरिकता संशोधन विधेयक 19 दिसंबर 2019 को पास किया गया। 2 अगस्त 2019 को यूएपीए कानून में संशोधन कर सरकार को ऐसी शक्तियां दे दी गईं कि वह जिसे चाहे उसे आंतकवादी घोषित कर दे, भले ही वह व्यक्ति किसी घोषित आतंकी गुट से जुड़ा रहा हो या न रहा हो।

9 नवंबर 2019 को अयोध्या मामले का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आया। इसी दौरान उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया जहां बिना किसी मुकदमे या कानून प्रक्रिया का पालन किए ही बुलडोजरों का इस्तेमाल, खासतौर से मुस्लिमों के निर्माण पर किया गया। इसके बाद इस साल मध्य प्रदेश, दिल्ली और गुजरात ने भी यही रास्ता अपनाया।

हरियाणा ने दिसंबर 2021 में अप्रवासी मजदूरों को जुमे की नमाज सार्वजनिक पर पढ़ने के लिए दी गई अनुमति वापस ले लिया। हिजाब पर पाबंदी उन प्रतिबंधों में शुमार हो गई जिसमें बीफ पर पाबंदी, नवरात्रि पर मांस और अंडों की बिक्री और हिंदू त्योहारों और मंदिरों के आसपास मुस्लिम दुकानदारों से सामान खरीदने पर पाबंदी लगाई गई।

इसी दौरान विश्व हिंदू परिषद की अगुवाई में हिंदू भीड़ द्वारा ईसाइयों पर हमलों की घटनाओं में भी वृद्धि हुई। 2014 में ऐसी घटनाओं की संख्या 127 थी जो 2021 में बढ़कर 486 पहुंच गई। यह हमले ज्यादातर बीजेपी शासित राज्यों में हुए।

इसी अवधि में बीजेपी शासित राज्यों ने हिंदू-मुस्लिम के बीच शादी को अपराध घोषित कर दिया। इनमें कर्नाटक, उत्तराखंड. हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और गुजरात शामिल हैं।

ये सबकुछ वह तो बिल्कुल नहीं था जिसके दम पर बीजेपी ने 2014 की सत्ता हासिल की थी।


इस सबको देखकर कहा जा सकता है कि बीजेपी ने अपना फोकस अर्थव्यवस्था में सुधार से हटाकर प्राथमिक रूप से सामाजिक ताने-बाने पर कर लिया है। इन दिनों हमें नहीं सुनाई देता कि प्रधानमंत्री विनिर्माण क्षेत्र की जीडीप में हिस्सेदारी बढ़ाने की बात कर रहे हों, साथ ही इस पर भी कोई शब्द नहीं सुनने को मिलते की लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन यानी श्रम बल की भागीदारी क्यों कम हुई है या फिर 2019 के बाद से आखिर बेरोजगारी दर 6 फीसदी से ऊपर क्यों बनी हुई है।

आखिरी बात के रूप में हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि बीजेपी अर्थव्यवस्था में जो हासिल करने की कोशिश कर रही थी, उसमें वह नाकाम रही, लेकिन सामाजिक ताने-बाने और सद्भाव के मुद्दे पर वह जो चाहती है उसे हासिल करने में उसे काफी कामयाबी मिली है।

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