खरी-खरी: पुलिस मांगे सुरक्षा, वकील मांगे इंसाफ, देश में हर तरफ है अराजकता का राज

देश में चौतरफा अराजकता का माहौल है। पुलिस सुरक्षा मांग रही है, और वकील इंसाफ। बेरोजगारी आसमान छू रही है और अर्थव्यवस्था पाताल में। कश्मीर अब भी बेकाबू है, लेकिन मौजूदा सरकार सिर्फ अपने एजेंडा पर कायम है।

फोटो : Getty Images
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ज़फ़र आग़ा

प्रधानमंत्री विदेश यात्राओं पर और देश में अराजकता के आसार। जब कानून और व्यवस्था की निगरानी करने वाली पुलिस देश की राजधानी दिल्ली में हड़ताल पर हो, तो इसको अराजकता का माहौल नहीं तो और फिर क्या समझा जाएगा। आप भली भांति परिचित हैं कि इस सप्ताह दिल्ली में क्या हुआ। पहले वकीलों ने दिल्ली की एक निचली अदालत के परिसर में पुलिसकर्मियों को पार्किंग के मुद्दे पर पीटा। दूसरे रोज जब अदालतों में पुलिस तैनाती बढ़ा दी गई, तो वकीलों ने फिर पुलिस कर्मियों की पिटाई कर दी। साथ ही वकील पुलिस के खिलाफ दिल्ली की एक निचली अदालत में पहुंच गए जहां मुनसिफ ने पुलिस को जमकर फटकार लगाई और पुलिस कर्मियों को निलंबित करने का आदेश दिया। भरी अदालत में पुलिस अफसर ने अपने को इतना मजबूर समझा कि खबर के अनुसार वह अदालत के बाहर निकल कर रोने लगी।

जाहिर है कि दो दिन में जब पुलिस के सब्र का पैमाना छलकने लगा, तो दूसरे दिन पुलिस कर्मियों ने खुद पुलिस मुख्यालय का घेराव कर दिया। आखिर वह बेचारे क्या करते! स्वयं पुलिस के आला अधिकारी पुलिस कर्मियों की शिकायत पर कान धरने को राजी नहीं, उधर अदालत में उनको फटकार पड़ रही है और तीसरे जब वे अदालतों की सुरक्षा ड्यूटी पर जाते, तो उनको वकीलों की पिटाई का सामना करना पड़ता। अब ले-देकर उनके पास हड़ताल के सिवाय कोई चारा नहीं बचा। इसलिए, उन्होंने पुलिस मुख्यालय को घेर लिया।

अब जरा सोचिए, राजधानी दिल्ली की पुलिस हड़ताल पर। चोर- उचक्के, राहजन डकैत जो चाहें सो दिल्ली की सड़कों पर करें। वह तो कहिए किसी तरह व्यवस्था चलती रही और भला करें पुलिस वालों का कि रात होते ही उन्होंने अपना धरना वापस ले लिया, वरना पुलिस हड़ताल अगर दो-तीन दिन और चल जाती तो दिल्ली नगरी का पुलिस के बिना क्या हश्र होता इसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं।

यूं भी जब पुलिस हड़ताल पर नहीं थी, तो भी दिल्ली की सड़कों पर आए दिन दिन-दहाड़े किसी का पर्स छिन रहा है, तो किसी महिला की चेन खींच कर कोई भाग रहा है। दिल्ली पहले ही असुरक्षित है। लंबी पुलिस हड़ताल के बाद क्या होता, यह सब भली भांति समझते हैं।

अब आप बताइए, दिल्ली पुलिस सीधे गृहमंत्री अमित शाह की निगरानी में है। आपने कुछ सुना कि माननीय गृहमंत्री ने पुलिस की पिटाई पर संवेदना व्यक्त की है। वहां तो सरकार को वकीलों की ज्यादा चिंता थी। यह एक देशव्यापी वोट बैंक है। यूं भी इन दिनों मीडिया की तरह अधिकांश वकीलों का भी झुकाव बीजेपी की ओर है। अमित शाह बीजेपी के अध्यक्ष भी हैं। अब वह बीजेपी के वोट बैंक की चिंता करते या निष्पक्ष होकर पुलिस कर्मियों को इंसाफ दिलवाते। बस यही समस्या है बीजेपी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर नीचे तक सब वोट बैंक की राजनीति में व्यस्त हैं। किसी को देश और देश हित की चिंता नहीं है। यूं तो राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रीयता का बखान हर समय है, परंतु देश तथा देशवासियों की चिंता सरकार में किसी को नहीं। केवल हिंदुत्व एजेंडा कैसे लागू हो, इसकी चिंता है। उस एजेंडा को लागू करने से एक मजबूत हिंदू वोट कैसे तैयार रहे उसकी फिक्र हर समय मोदी और शाह को रहती है।

अब कश्मीर का ही मामला ले लीजिए। बीजेपी और संघ का पुराना एजेंडा था कि वहां से संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म कर कश्मीरियों को जो विशिष्ट अधिकार दिए गए थे वे समाप्त किए जाएं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरी बार सत्तासीन होने के केवल दो माह पश्चात पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 हटाकर सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक अधिकार समाप्त कर दिए। इस प्रकार संघ और बीजेपी का कश्मीर एजेंडा लागू हो गया। मीडिया सहित संपूर्ण सरकारी तंत्र और बीजेपी तथा संघ सहित सबने कुछ ऐसे अंदाज में शोर मचाना शुरू कर दिया जैसे कश्मीर में जो हुआ वह कश्मीरी मुसलमानों पर हिंदू भारत की विजय है। वह क्यों? क्योंकि इस प्रकार एक समृद्ध हिंदू वोट बैंक की राजनीति सफल रहेगी और हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को विजय प्राप्त होगी। तब ही तो दोनों राज्यों में रो पीटकर ही सही बीजेपी सफल हुई। यही कारण है कि बीजेपी को देश हित कम और वोट बैंक की चिंता अधिक है।

उधर कश्मीर का जो हाल है वह अब संसार पर खुलता जा रहा है। अनुच्छेद 370 खत्म हुए तीन माह का समय बीत चुका है। किसी को यह पता नहीं कि घाटी से कर्फ्यू हट गया या नहीं। शहरों में अभी भी सन्नाटा पसरा हुआ है। दुकानें बहुत कम समय के लिए खुलती हैं। बाजार सुनसान हैं। कुछ समय पहले आतंकवादियों ने कश्मीर घाटी में बाहर से आए मजदूरों और ट्रक ड्राइवर की हत्या कर दी। आतंकियों का खुला इशारा था कि वे कश्मीर घाटी में किसी प्रकार का कामकाज नहीं चलने देंगे। मजदूर नहीं, तो काम कैसे होगा। ट्रक ड्राइवर डर से घाटी में सामान नहीं ले जाएगा, तो खाना-पीना कैसे चलेगा। फिर आए दिन छोटे-मोटे सरकार विरोधी प्रदर्शन चल रहे हैं।

कश्मीर के अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार सहित तमाम नेता तथा उनकी पार्टियों के कार्यकर्ता तक सभी जेल में हैं। स्पष्ट है कि स्थिति वहां अत्यंत गंभीर है। फिर हम मानें या न मानें, कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय रडार पर रहता ही है। भले ही अधिकांश देशों ने अनुच्छेद 370 के मामले पर भारत को समर्थन दिया हो। लेकिन अमेरिका सहित अधिकांश देश मानवाधिकार के मुद्दे को लेकर कश्मीर पर अपनी चिंता व्यक्त कर चुके हैं।

अभी जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्कल भारत के दौरे पर आई थीं और वह कश्मीर की स्थिति पर हमारे देश में खड़ी होकर अपनी चिंता व्यक्त करके चली गईं। इस परिस्थिति में कौन-सा देश कब कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा बनाए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। उधर, सरकार में कश्मीर गुत्थी को अनुच्छेद 370 की समाप्ति के पश्चात सुलझाने की कोई चिंता नहीं दिखाई पड़ती है। हां, इस बात पर हर्ष और उल्लास जरूर है कि कश्मीर में संघ का एजेंडा लागू हो गया। साथ ही इससे देश में हिंदू वोट बैंक और सशक्त हो गया। फिर हरियाणा और महाराष्ट्र में बीजेपी जैसे-तैसे सफल भी हो गई। अब मोदी जी और अमित शाह को चिंता क्यों होगी।

यही हाल देश की अर्थव्यवस्था का है। जीडीपी रोज नीचे जा रही है। रोजगार कहीं बचा नहीं। बाजार सन्नाटे में हैं। दीवाली पर भी बाजारों में रौनक नहीं दिखाई पड़ी। किसानों की धान और तिलहन की फसलें अत्यधिक बरसात के कारण तबाह हो चुकी है। बैंकों में घोटाले आम होते जा रहे हैं। देश में अब आर्थिक मंदी ही नहीं अपितु एक आर्थिक अराजकता का वातावरण उत्पन्न हो रहा है। प्रधानमंत्री को छोटी-छोटी बातों की चिंता रहती है। स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक हर विषय पर प्रधानमंत्री मन की बात प्रोग्राम में चिंता व्यक्त करते हैं। देश आर्थिक मंदी से जूझ रहा है लेकिन प्रधानमंत्री ने अभी तक इस गंभीर संकट से निपटने के लिए देश को संबोधित नहीं किया है।

वित्त मंत्री का हाल तो पूछिए ही मत। वैसे भी बेचारी करें तो करें क्या। प्रधानमंत्री कार्यालय ने उनकी कोई हैसियत छोड़ी ही नहीं है। मोदी सरकार में हर नीति पीएमओ में ही तय होती है। नीति के स्तर पर वित्त मंत्री के भी हाथ बंधे हैं। अर्थव्यवस्था में फैसले पीएमओ के ही होते हैं। स्पष्ट है कि वित्त मंत्रालय बेबस है। ऐसे में देश में चल रही मंदी और कितना गंभीर रूप लेती है, हर किसी की समझ से बाहर है। सरकार में तो किसी को चिंता है ही नहीं। कारण यह है कि मोदी जी से लेकर नीचे तक हर किसी को यह विश्वास है कि हिंदू वोट बैंक के सहारे अपनी सरकार फिर बन जाएगी ही तो फिर काहे की चिंता।

बीजेपी को केवल अपने एजेंडों की राजनीति पर विश्वास है। उसका एकमात्र एजेंडा हिंदुत्व विचारधारा लागू करना है। इस प्रकार हिंदू वोट बैंक तो पक्का भी होताहै। अतः पुलिस हड़ताल करे, कश्मीर में स्थिति कितनी ही गंभीर हो अथवा देश की अर्थव्यवस्था भाड़ में जाए, मोदी और शाह की बला से। जब तक वोट बैंक की राजनीति सफल, बीजेपी सफल। अतः चिंता केवल इतनी है कि किस बात से हिंदू वोट बैंक सशक्त हो सकता है। बाकी सब भाड़ में जाए।

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