वक्त-बेवक्तः अकबर मामले में ढिठाई के लिए मोदी सरकार और बीजेपी को हिम्मत कहां से मिली ?

ढिठाई में एक हिंसक उल्लास शामिल है। यह पीड़ित के अपमान और उसकी तकलीफ से और बढ़ती है। पिछले चार सालों में अलग-अलग प्रकार की हिंसा में साधारण जन को शिरकत कराकर ताकत का अहसास कराने के साथ उसमें एक ढिठाई भी भरी गई है। हिंसा पर शर्मिन्दा होने की जरूरत नहीं, हिंसा के शिकार को ही शर्मिंदगी में डाल देना है।

फोटोः सोशल मीडिया
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अपूर्वानंद

ढिठाई, इस शब्द का इस्तेमाल करना हिंदीवालों को शुरू करना चाहिए। लेकिन तेजी से खुद को भूलती जानेवाली हिंदी ऐसा नहीं कर पाएगी। पिछले चार वर्षों में कई मौके आए, जब इस शब्द की याद आई, लेकिन यह किसी अखबार में कहीं दिखलाई नहीं पड़ा।

हाल में जब एक केन्द्रीय मंत्री पर यौन दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के आरोपों की झड़ी लग गई, तब सामान्य लोगों ने यह सोचा कि शायद लोक लज्जा के मारे मंत्री महोदय तुरत इस्तीफा देंगे। लेकिन हुआ ठीक उसका उलटा। मंत्री ने विदेश भ्रमण से लौटने के बाद आरोप लगाने वाली स्त्रियों पर हमला बोल दिया, कहा कि सारे आरोप उनपर राजनीतिक साजिश के तहत लगाए गए हैं और वे आरोप लगाने वाली महिलाओं पर मानहानि का मुकदमा करेंगे। आनन-फानन में एक बड़ी कानूनी फर्म के जरिये आरोप लगानेवाली पहली महिला पर उन्होंने मुकदमा दायर भी कर दिया।

मंत्री से इस्तीफे की उम्मीद लगाए लोग हतप्रभ रह गए। लेकिन मंत्री तो किसी संगठन के सदस्य हैं!बल्कि दो संगठनों के। एक संगठन, जो इस देश का सबसे बड़ा और ताकतवर संगठन है, यानी भारत सरकार और दूसरा जो दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल होने का दावा करता है, यानी भारतीय जनता पार्टी। आम तौर पर ऐसे अवसरों पर संगठनों से अपने सदस्यों के आचरण के लिए नैतिक जिम्मेवारी की उम्मीद की जाती है। आखिरकार पिछले दिनों जो आरोप लगे हैं यौन उत्पीड़न या दुर्व्यवहार के, वे कई क्षेत्रों में काम करने वालों पर लगे हैं। उनमें फिल्मकार, मीडिया कर्मी और दूसरे तरह के लोग भी हैं। उनमें से कइयों के संगठनों ने या तो उन्हें खुद से अलग कर दिया है, या उनपर जांच शुरू कर दी है। यही सभ्य प्रतिक्रिया है जिसकी उम्मीद इस सरकार और भारतीय जनता पार्टी से भी की जा रही थी। लेकिन दोनों ही संगठनों ने इस मसले पर मंत्री की हरकत से पल्ला झाड़ लिया।

आखिरकार मंत्री ने इस्तीफा दिया लेकिन तब जब 20 से अधिक महिलाओं ने सामने आकर मंत्री को सीधे चुनौती दी। उन सबने मंत्री को ललकारा कि वे उनसे अदालत में मिलने को तैयार हैं। इस तीखे हमले ने मंत्री की और सरकार तथा पार्टी की ढिठाई की कमर तोड़ दी।

इस इस्तीफे के लिए लोग प्रधानमंत्री को धन्यवाद देने लगेंगे। उनके दूसरे खोखले नारों की तरह बेटियों के नारे की दुहाई देने लगेंगे। लेकिन यह सब करने के पहले वे यह सोचें कि आखिरकार पहली प्रतिक्रिया इस सरकार और बीजेपी की ढिठाई की क्यों थी। इस ढिठाई के लिए उनको हिम्मत कहां से मिली होगी? क्योंकर उन्होंने सोचा होगा कि उनके इस ढीठ आचरण का विरोध नहीं बल्कि समर्थन ही ज्यादा होगा? इस आत्मविश्वास का स्रोत क्या है?

कुछ टिप्पणीकारों ने लिखा है कि इस एक क्षण में इस सरकार और दल की पोल खुल गई है और यह इसके नैतिक दिवालिएपन का सबूत है। वे कह रहे हैं कि यह इसके अवश्यम्भावी पतन की सूचना भी है।

क्या वाकई ऐसा है? अगर हम इस सरकार और इस दल के पिछले वर्षों के आचरण को देखें तो पाएंगे कि ढिठाई इसका पहला गुण है। किसी भी प्रकार के नैतिक संकोच से खुद को आज़ाद कर लेना और मात्र सत्ता को पाने और बनाए रखने को अपना अस्तित्व तर्क बना लेना और उसके लिए एक व्यवहारवादी समर्थन जुटाने का विश्वास, यह पिछले वर्षों में हमें दिखलाई पड़ा है।

यह ढिठाई नहीं तो और क्या है कि चुनाव के वायदों की ओर ध्यान दिलाए जाने पर दल का अध्यक्ष इत्मीनान से कह सकता है कि जिन्हें आप वायदा मान बैठे थे, वे चुनावी जुमले थे। कुछ को लगा कि जुबान फिसल गई। ऐसा नहीं था, यह हाल में मालूम पड़ा जब एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री ने टेलीविजन पर हंसते हुए कहा कि हमने तो वायदे बस यों ही कर दिए थे।

यह एक तरह से मतदाताओं की, खासकर अपने समर्थकों की ,उनका जो “सबका विकास” के नारे के चलते उनके साथ हुए थे, खुलेआम खिल्ली उड़ाना था। यह कहना कि हमने तुम्हें बेवकूफ बनाया है। क्या यह असावधानीवश हुआ या ऐसा करने के आत्मविश्वास का स्रोत कुछ और है?

इस पार्टी पर और सरकार पर और भी कई आरोप लगे हैं। इस तरह के आरोपों के जवाब में पिछली सरकार के कई मंत्रियों के इस्तीफे लिए गए थे। याद कीजिए, इस सरकार के गृह मंत्री ने शान से कहा था, यह सरकार और है, इसमें इस्तीफे नहीं होते। यानी? हम किसी नैतिक बाधा के शिकार नहीं!

क्यों यह विश्वास है कि इन बयानों से कोई राजनीतिक नुकसान नहीं होगा? क्योंकि इस दल और सरकार को यकीन है कि उसने एक ऐसी जनता गढ़ ली है जिसने खुद को इस दल और सरकार से एकमेक कर दिया है। ऐसी जनता गढ़ी जा सकती है। इसके दुनिया भर में ढेरों प्रमाण हैं कि नैतिक रूप से अक्षम्य दीखनेवाली सत्ताओं को अपार जनसमर्थन मिलता रहा है।

1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद देश को एक नैतिक सदमा-सा लगा था। धीरे-धीरे जनता को यह बताया गया कि इस कृत्य के लिए किसी अपराध बोध से ग्रस्त होने की विवशता नहीं, बल्कि इस कृत्य को उचित ठहराने में ही साहस है। उसी तरह 2002 में गुजरात में मुस्लिम विरोधी हिंसा के बाद एक अभियान चलाया गया उस हिंसा को जायज ठहराने का।

गुजरात जनसंहार को जिन्होंने गुजरात के लिए शर्म बताया, उन्हें गुजरात का दुश्मन करार दिया गया। यह संयोग नहीं था कि जब गुजरात के मुसलमानों के हिंसा के घाव हरे ही थे, राज्य के मुख्यमंत्री ने गुजरात गौरव यात्रा निकालने का निर्णय किया। गुजरात को शर्मिंदा होने की कोई मजबूरी नहीं, उसे खुद पर गौरव करना चाहिए। जो मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का जिक्र भी करते हैं, वे गुजरात की इज्जत पर दाग लगा रहे हैं, यह प्रचार मुख्यमंत्री ने खुद किया।

इस तरह गुजरात में यह माहौल बना कि एक सामान्य हिंदू हिंसा से इंकार करने से आगे बढ़ कर उसे यह कहकर उचित ठहराने लगा कि इसने गुजरात में अमन कायम कर दिया है।

इस हिंसा में औरतों के खिलाफ हिंसा शामिल थी। गुजरात के बाद मुजफ्फरनगर में भी यही देखा गया। इस हिंसा के कारण मुसलमानों को होनेवाली तकलीफ को देखना और उनसे सहानुभूति की जगह उस हिंसा के बाद उस हिंसा का जिक्र करने के कारण उनसे और नफरत बढ़ती गई। हिंसा में लिप्त लोगों में उसे लेकर एक बेपरवाही और फिर ढिठाई देखी गई। औरतों में भी मुसलमान औरतों के प्रति हमदर्दी की जगह और नफरत ही देखी गई।

यह सब कुछ ढिठाई की संस्कृति का प्रचार-प्रसार है। ढिठाई में एक हिंसक उल्लास भी शामिल है। यह उत्पीड़ित के अपमान और उसकी तकलीफ से और बढ़ती है।

पिछले चार सालों में अलग-अलग प्रकार की हिंसा के जरिए, जिसमें साधारण जन को शिरकत के सहारे ताकत का अहसास कराया गया है, उसमें एक ढिठाई भी भरी गई है। हिंसा पर शर्मिन्दा होने की जरूरत नहीं, हिंसा के शिकार को ही शर्मिंदगी में डाल देना है।

पिछले कुछ समय से भारतीय जनता के साथ यह मनोवैज्ञानिक प्रयोग भारतीय जनता पार्टी दूसरों के प्रति घृणा और हिंसा के अभ्यास के माध्यम से कर रही है। हमें इसकी चिंता करने की आवश्यकता है कि कहीं वह उस प्रयोग में वह सफल तो नहीं हो रही?

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