गांधी जयंती विशेष: जरूरी है चम्पारण सत्याग्रह को याद करना

बेहद महत्वपूर्ण था चम्पारण सत्याग्रह

चम्पारण में जब गांधी आए थे तो निपट अकेले थे और चम्पारण के राजकुमार शुक्ल को छोड़कर उन्होने बिहार के किसी भी व्यक्ति को अपने आने की सूचना देने की भी जरूरत नहीं महसूस की। गांधी इससे पहले चम्पारण तो क्या बिहार भी नहीं आए थे।

गांधी के चम्पारण सत्याग्रह को याद करना क्यों जरूरी है? यह एक बड़ा सवाल है। और इसे ठीक से समझा गया हो या मैंने समझ लिया हो, यह दावा करना मुश्किल है। पर इसे समझना जरूरी है, उसके बगैर हमारा नुकसान हो रहा है और हम जितनी जल्दी इसे समझेंगे, नुकसान कम करेंगे और खुद को तथा दुनिया को सही पटरी पर लाने में सफल होंगे। चम्पारण सत्याग्रह को ऊपर से देखने पर पर ऐसा लगता है कि यह किसान समस्या के समाधान के लिए था। कई बार ज्यादा बारीकी से गौर करने पर यह सांस्कृतिक और राजनैतिक सवाल भी लगता है, बल्कि सांस्कृतिक अपमान, औरतों की बदहाली, दलितों समेत कमजोर लोगों की दुर्गति के सवाल पर तो अभी तक ज्यादा लिखा-पढा भी नहीं गया है। फिर यह राजनैतिक आन्दोलन तो था ही - कई लोग राष्ट्रीय आन्दोलन और गांधी के राजनैतिक जीवन में चम्पारण सत्याग्रह की भूमिका को महत्वपूर्ण मानकर ही इसको आज इतना महत्व दे रहे हैं। एक तर्क पूरे उपनिवेशवाद विरोधी वैश्विक आन्दोलन में हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन की शुरुआत चम्पारण से होने की बात भी रेखांकित करता है। और शुद्ध गांधीवादी बिरादरी बुनियादी तालीम, खादी ग्रामोद्योग और युरोपीय मॉडल से इतर वैकल्पिक विकास के प्रयोग की शुरुआत के चलते चम्पारण सत्याग्रह को महत्वपूर्ण मानती है।

1917 के गांधी के कथनों और लेखन को देखने के बाद ये बातें टुकड़ों में तो सही लगती हैं, पर गांधी ने इसे परिभाषित करने की कोशिश नहीं की। कुछ समय बाद दक्षिण अफ्रीका के अपने जीवन के बारे में और फिर अपनी आत्मकथा लिखते हुए वे चम्पारण को बहुत स्नेह से याद करते हैं, पर आन्दोलन क्या था या किन बडे़ लक्ष्यों को लेकर चला, उस तरह की व्याख्या या समीक्षा की कोशिश उन्होंने नहीं की है। 1942 में जब लुई फिशर ने उनसे कई दिनों तक चला लम्बा इंटरव्यू लिया तब उन्होंने इतना ही कहा कि चम्पारण में रहने और वहां के लोगों के कष्ट देखने के बाद मुझे पहली बार लगा कि अंग्रेजों को भारत से निकाले बगैर काम नहीं चलेगा। चम्पारण के दस्तावेज और ब्यौरे देखने पर तो आपको गांधी किसानों से यही कहते दिखेंगे कि मुझसे कुछ भी मिलने वाला नहीं है। जो कुछ मिलेगा वह गोरे अधिकारियों और निलहों से ही मिलेगा, इसलिये उनके खिलाफ हिंसक होने की जरूरत तो नहीं ही है, दुर्भावना भी न रखें। गांधी के पहले चम्पारण के किसानों ने लड़ाई लड़ी थी, निलहों को जान से भी मारा था। पर गांधी ने जरा भी हिंसा नहीं होने दी और जहां कहीं हिंसक टकराव की आशंका लगी, निलहों या किसानों की तरफ की कोई भी गतिविधि हिंसा की तरफ बढ़ती लगी तो बहुत तत्परता से शीतल फाहा सा रखकर हिंसा को टाल दिया।

चम्पारण में जब गांधी आए थे तो निपट अकेले थे और चम्पारण के राजकुमार शुक्ल को छोड़कर उन्होने बिहार के किसी भी व्यक्ति को अपने आने की सूचना देने की भी जरूरत नहीं महसूस की। गांधी इससे पहले चम्पारण तो क्या बिहार भी नहीं आए थे और चम्पारण के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। उन्हें चम्पारण की बोली भोजपुरी तो नहीं ही, ठीक से हिन्दी भी नहीं आती थी। और उस कैथी लिपि को वे नहीं पढ़ सकते थे जिसमें भूमि के दस्तावेज थे। उन्हें न नील का पता था, न उन्होंने कभी नील का पौधा भी देखा था। मजहरुल हक साहब जैसे एकाध लोगों को छोड़कर वे किसी बिहारी को जानते भी न थे। उनको हक साहब के अलावा बिहार में दादा कृपलानी को तार देने की सूझी, वह भी राजकुमार शुक्ल की क्षमता पर शुरुआती शक के बाद।

पर गांधी के अन्दर भी वह चीज आ चुकी थी जिसने न सिर्फ चम्पारण आन्दोलन को खड़ा किया, बल्कि मुल्क और दुनिया की राजनीति और जीवन को नई दिशा दी। उन्होने यह बदलाव दक्षिण अफ्रीका में कर लिया था - यह जरूर है कि वहां ज्यादातर प्रयोग फीनीक्स और टालस्टॉय आश्रमों में हुये थे या सिर्फ वहां रह रहे हिन्दुस्तानी समाज के बीच। वैचारिक स्तर पर गांधी की राय इतनी साफ हो चुकी थी कि उन्होंने हिन्द स्वराज की रचना भी कर ली थी। पर सारे प्रयोगों, सारी वैचारिक तैयारियों को भारतीय समाज पर, जमीन पर उतारने की शुरुआत चम्पारण से हुई। और चम्पारण बदला, बिहार बदला, मुल्क की राजनीति में नए दौर की शुरुआत हुई, विश्वव्यापी उपनिवेशवाद की विदाई का दौर शुरू हुआ। जबरदस्त बदलाव गांधी में भी हुआ, इससे भी ज्यादा उन बिहारी और सहयोगी नेताओं में हुआ जो गांधी के आन्दोलन की रीढ़ बने और उन्होंने चम्पारण तथा गांधी को जितना दिया, गांधी और चम्पारण ने उससे कई गुना ज्यादा उन्हें दिया।

पर यह बात रेखांकित करनी जरूरी है कि यह काम उन्होंने अहिंसा से किया जो इसके पहले चम्पारण ही नहीं, इतिहास में भी नहीं मिलता। इसीलिये अगर हम अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ दुनिया की सबसे बड़ी बगावत 1857 को देखें तो उसका सबसे क्रूर अंत हुआ। और चम्पारण तक आने में 60 साल लगे जिसमें बार-बार छोटी हिंसक बगावतों और कांग्रेस जैसे संगठन के बनने जैसे कई स्तर के काम हुये। पर 1917 के चम्पारण के बाद मुल्क के अजाद होने और दुनिया से उपनिवेशवाद की विदाई का दौर शुरू होने में 30 साल ही लगे।

लेकिन इस नए अस्त्र का प्रयोग वही कर सकता है जो निर्भय हो, निस्वार्थ हो। गांधी ने चम्पारण में अपने उदाहरण से ये दोनों बातें स्थापित कीं। और फिर तो देर न लगी।

गांधी के इस आन्दोलन में न कहीं लाठी चली न बन्दूक, न किसी को लम्बा जेल भुगतना पड़ा, न जानलेवा अनशन करना हुआ, न चन्दा हुआ, न दिखावे का खर्च करना पड़ा। गांधी ने चम्पारण से एक भी पैसा चन्दा नहीं जुटाने दिया। और कहना न होगा कि आज स्थितियां चम्पारण से कई गुना ज्यादा खराब हैं और हमें ठीक एहसास भी नहीं है। चम्पारण के किसानों का बहुत शोषण होता था, बहुत जुर्म होते थे, पर यह नहीं हुआ कि अपनी पीड़ा के चलते लोगों ने खेती छोड़ी हो, आत्महत्या कर ली हो।

गांधी का चम्पारण प्रयोग कई मायनों में विशिष्ट है - सिर्फ हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन और ब्रिटिश उपनिवेशवाद की समाप्ति के पहले प्रयोग के रूप में ही नहीं। इसके इस रूप की चर्चा तो होती है, लेकिन पूरी तफसील और गम्भीरता का अभाव भी रहता हो। इसी आन्दोलन के दौरान गांधी ने रचनात्मक ही नही, सभ्यतागत विकल्प के अपने प्रयोग की विधिवत शुरुआत की।

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