गांधी 150: बापू का वह आखिरी इंटरव्यू, जिसमें उन्होंने कहा था - भविष्य किसने देखा है

मारग्रेट बुर्क-व्हाइट ने गांधी जी के साथ मुलाकातों में पाया था कि गांधी जी में समाज की पुनर्संरचना करने की कोई लालसा नहीं थी; वह सिर्फ व्यक्ति के हृदय की पुनर्संरचना करना चाहते थे। लेकिन गांधी जी हृदय में अंदरूनी बदलाव- चाहे वह गरीब आदमी हो या राजा- जबरिया नहीं, रूपांतरण के जरिये करना चाहते थे।

फोटो : सोशल मीडिया
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सलिल मिश्रा

पूरी दुनिया गांधी मार्ग के जरिए रास्ता तलाश रही है। लेकिन, अपने ही देश में लोकतंत्र पर जिस तरह से खतरे बढ़ते जा रहे हैं, उसमें महात्मा गांधी के संदेश पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। हमने अपने साप्ताहिक समाचार पत्र संडे नवजीवन के दो अंक गांधी जी पर केंद्रित करने का निर्णय लिया। इसी तरह नवजीवन वेबसाइट भी अगले दो सप्ताह तक गांधी जी के विचारों, उनके काम और गांधी जी के मूल्यों से संबंधित लेखों को प्रस्तुत करेगी। इसी कड़ी में हम आज प्रस्तुत कर रहे हैं आंबेडकर विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर सलिल मिश्रा का एक लेख, जो महात्मा गांधी के आखिरी इंटरव्यू पर आधारित है।

शहादत से कुछ ही घंटे पहले लाइफ पत्रिका की फोटोग्राफर मारग्रेट बुर्क-व्हाइट ने महात्मा गांधी से बातचीत की थी। वह मान रही थीं कि गांधी जी के जीवन में कई विरोधाभास हैं। उन्होंने तय किया हुआ था कि वह इन्हें लेकर सवाल पूछेंगी। उन्होंने पूछा भी कि ‘आपने बराबर कहा है कि आप 125 साल तक जीएंगे। आपको यह आशा किस वजह से है?’ गांधी जी के उत्तर ने उन्हें भौंचक्का कर दिया, ‘मैंने वह आशा छोड़ दी है... क्योंकि दुनिया में कई भयानक चीजें हो रही हैं। मैं अंधेरे और पागलपन में नहीं जीना चाहता।...’ लेकिन फिर, निराशा से उबरकर उन्होंने आशा भरी बात कही, ‘लेकिन अगर मेरी सेवाओं की जरूरत है... अगर मुझे मौका मिलता है, तो मैं 125 साल तक जीऊंगा।’

बुर्क-व्हाइट ने ट्रस्टीशिप पर उनके विचार और उसके औचित्य को लेकर सवाल पूछा, ‘भारतीय उद्योगपतियों में कौन ट्रस्टीशिप की लाइन पर काम कर रहे हैं?’ गांधीजी के कड़े और स्पष्ट उत्तर ने उन्हें फिर भौंचक्का कर दिया, ‘मैं जानता हूं, कोई भी नहीं।’ लेकिन वह आशावादी थे कि एक दिन उद्योगपति उनके विचारों की सच्चाई समझेंगे और उसके अनुरूप अपने को बदलेंगे। ‘यह कब तक होने की संभावना है?’ यह पूछने पर उन्होंने कहा, ‘भविष्य किसने देखा है।’

मारग्रेट बुर्क-व्हाइट ने गांधी जी के साथ मुलाकातों में पाया था कि गांधी जी में समाज की पुनर्संरचना करने की कोई लालसा नहीं थी; वह सिर्फ व्यक्ति के हृदय की पुनर्संरचना करना चाहते थे। लेकिन गांधी जी हृदय में अंदरूनी बदलाव- चाहे वह गरीब आदमी हो या राजा- जबरिया नहीं, रूपांतरण के जरिये करना चाहते थे। जैसा कि गांधी जी ने कहा, वह इसे हिटलर की तरह नहीं करना चाहते।

बुर्क-व्हाइटने एक ऐसा सवाल पूछा जो उनके दिमाग में काफी समय से था, ‘मैंने गांधीजी से पूछा कि वे एटम बम का सामना किस तरह करेंगे। क्या इससे भी वह अहिंसा से ही मुकाबला करेंगे?’ यह सवाल पूछते हुए उनके स्वर में ताज्जुब का भाव बिल्कुल साफ था। गांधी जी ने धीरे- धीरे और हर शब्द पर जोर देते हुए कहा, ‘अह, अह!.. इसका जवाब मैं किस तरह दूं?... मैं प्रार्थनापूर्ण कदम के जरिये इसका सामना करूंगा। मैं जमीन के अंदर नहीं चला जाऊंगा। मैं कहीं शरण लेने भी नहीं जाऊंगा। मैं खुले में आ जाऊंगा और पायलट देखे कि मेरे चेहरे पर उसके खिलाफ किसी प्रकार का द्वेष नहीं है... उतनी ऊंचाई से पायलट हमारे चेहरे नहीं देख पाएगा, यह मैं जानता हूं। लेकिन हमारे हृदय की यह हसरत कि वह हमें नुकसान पहुंचाने नहीं आएगा, उस तक पहुंचेगी और उसकी आंखें खुल जाएंगी।...

(युद्ध खत्म हो गया है) लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि जो विजयी हुए हैं, वे वास्तव में विजयी हैं या पीड़ित हैं... अपनी खुद की लिप्सा से... क्योंकि दुनिया में शांति नहीं है... यह अब भी और अधिक खौफनाक है। ’बुर्क-व्हाइट निकलने लगीं, तो उनके मन में यह सवाल था कि विदाई किस तरह ली जाए। जब वह प्रमुख उद्योगपति राम कृष्ण डालमिया से मिली थीं और चलते समय हाथ बढ़ाए थे, तो डालमिया ने हाथ मिलाने से मना कर दिया था और यह कहते हुए नमस्कार किया थाः ’यह महिलाओं के लिए नहीं है.. सिर्फ पति को ही महिला का हाथ छूना चाहिए।’ यह याद कर बुर्क-व्हाइट ने ’हाथ जोड़कर नमस्कार किया। लेकिन गांधी ने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और पश्चिमी फैशन के अनुरूप हाथ मिलाया। हमने गुड-बाय कहा और मैं निकल गई।’

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